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Indian Biscuit:बाजार में चमक!!! पहली बार ओमान पहुंची भारत के इस प्राचीन शहर की बिस्कुट, पीयूष गोयल ने दी जानकारी!!!

Indian Biscuit:भारत के समृद्ध इतिहास और सांस्कृतिक धरोहर की मिठास अब सात समंदर पार खाड़ी देशों (Gulf Countries) तक पहुंचने लगी है। दुनिया के सबसे पुराने और आध्यात्मिक शहरों में शुमार वाराणसी (काशी) की बिस्कुट ने अंतरराष्ट्रीय बाजार में एक नया इतिहास रच दिया है। भारत की इस प्राचीन नगरी में तैयार होने वाले विभिन्न प्रकार के बिस्कुटों की पहली खेप पहली बार ओमान भेजी गई है। केंद्रीय वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने आधिकारिक तौर पर इस महत्वपूर्ण व्यापारिक सफलता की पुष्टि की है।

व्यापारिक डील और पहली खेप

भारत और ओमान के बीच लगातार मजबूत होते द्विपक्षीय संबंधों के बीच यह एक बड़ी आर्थिक कामयाबी है। दोनों देशों के बीच हुए ‘व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौते’ (CEPA – Comprehensive Economic Partnership Agreement) के तहत इस निर्यात को अंजाम दिया गया है।

पहली खेप का आकार: शुरुआत के तौर पर वाराणसी से 40 मीट्रिक टन बिस्कुट ओमान भेजे गए हैं।

भविष्य का लक्ष्य: भारत और ओमान के बीच एक समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए गए हैं, जिसके तहत वित्तीय वर्ष 2026-27 में ओमान सहित पूरे ‘खाड़ी सहयोग परिषद’ (GCC – Gulf Cooperation Council) के देशों में कुल 700 मीट्रिक टन बिस्कुट निर्यात करने का बड़ा लक्ष्य रखा गया है।

शून्य-शुल्क (Duty-Free) का मिलेगा जबरदस्त फायदा

अंतरराष्ट्रीय बाजार में किसी भी नए उत्पाद के लिए अपनी जगह बनाना आसान नहीं होता, लेकिन भारतीय बिस्कुट को एक बहुत बड़ा फायदा मिला है। ओमान भेजी गई बिस्कुट की इस खेप को शून्य-शुल्क (कर-मुक्त) सुविधा का लाभ मिला है।

बाजार पर असर: टैक्स न लगने के कारण ओमान के बाजारों में इन बिस्कुटों की कीमत बेहद प्रतिस्पर्धी (Competitive Price) रखी जा सकेगी। कम कीमत और वाराणसी के पारंपरिक व बेहतरीन स्वाद के दम पर यह उम्मीद जताई जा रही है कि भारतीय बिस्कुट जल्द ही ओमान के स्थानीय स्टोरों में पहले से मौजूद अन्य अंतरराष्ट्रीय ब्रांड्स को कड़ी टक्कर देगी।

वाराणसी के स्वाद से महकेगा खाड़ी देश

गंगा के घाटों और अपनी आध्यात्मिक ऊर्जा के लिए दुनिया भर में प्रसिद्ध वाराणसी अब अपने स्वाद के लिए भी ग्लोबल स्तर पर पहचाना जाएगा। ओमान एक समृद्ध और विकसित देश है, जहां विभिन्न संस्कृतियों के लोग रहते हैं। ऐसे में वाराणसी के बिस्कुटों का वहां पहुंचना भारतीय खाद्य प्रसंस्करण (Food Processing) उद्योग के लिए एक बड़ी छलांग है।

अगर यह उत्पाद ओमान के लोगों का दिल जीतने में कामयाब रहता है, तो आने वाले समय में संपूर्ण खाड़ी देशों (जैसे यूएई, सऊदी अरब, कतर आदि) में भारतीय बिस्कुट के लिए एक बहुत बड़ा और परमानेंट बाजार तैयार हो जाएगा।

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Balidiha Dam:दीघा के पास छिपा है एक खूबसूरत रत्न!!!मानसून में घूमने जाएं ऑफबीट ‘बालीडीहा डैम’!!!

Balidiha Dam:मानसून के मौसम में घर पर मन टिकाना सच में मुश्किल हो जाता है। रिमझिम बारिश की बूंदें और सुहावना मौसम हमें किसी ऐसी जगह पर खींच ले जाता है जहां प्रकृति अपनी पूरी खूबसूरती के साथ बिखरी हो। क्या आप भी इस मानसून किसी ऐसी जगह जाने की सोच रहे हैं जहां पहाड़, डैम, जंगल और नदी सब एक साथ मिल जाएं?

सुनकर ही वहां जाने का मन कर रहा है ना? होना भी चाहिए, क्योंकि बालीडीहा डैम (Balidiha Dam) एक ऐसी ही जादुई जगह है। कोलकाता और दीघा के नजदीक बसी इस जगह को देखकर आप अपनी आंखों पर यकीन नहीं कर पाएंगे। आप यह सोचने पर मजबूर हो जाएंगे कि हमारे इतने पास इतनी खूबसूरत जगह मौजूद थी और आपको इसके बारे में पता ही नहीं था! चाहे वन-डे पिकनिक हो या दो दिनों का वीकेंड टूर, बालीडीहा आपको बिल्कुल निराश नहीं करेगा।

आइए विस्तार से जानते हैं इस खूबसूरत ऑफबीट डेस्टिनेशन के बारे में:

कहाँ स्थित है बालीडीहा डैम?

बालीडीहा डैम ओडिशा के सबसे खूबसूरत जिलों में से एक, मयूरभंज में स्थित है। यह मयूरभंज जिले के शामखुंटा ब्लॉक के अंतर्गत आता है और बारीपदा शहर से इसकी दूरी मात्र 20 किलोमीटर है। अगर आप प्रसिद्ध टूरिस्ट स्पॉट ‘दीघा’ जा रहे हैं, तो वहां से यह अनोखा रत्न लगभग 120-130 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यह जगह उन लोगों के लिए स्वर्ग जैसी है जो भीड़भाड़ से दूर शांति और सुकून की तलाश में हैं।

ब्रिटिश काल का इतिहास और प्राकृतिक सुंदरता

बालीडीहा डैम का इतिहास काफी पुराना है। इसका निर्माण ब्रिटिश काल के दौरान साल 1912 में किया गया था। मुख्य रूप से सिंचाई के उद्देश्य से बनाए गए इस जलाशय की जल भंडारण क्षमता लगभग 74 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैली हुई है।

 

प्रसिद्ध सिमलीपाल नेशनल पार्क के करीब होने के कारण, यह पूरा बांध घने जंगलों और ऊंची-ऊंची पहाड़ियों से घिरा हुआ है। चारों तरफ फैली हरियाली और शांत वातावरण इसे एक बेहतरीन पिकनिक स्पॉट बनाते हैं।

मानसून में क्यों खास है बालीडीहा?

यूं तो आप यहां साल के किसी भी महीने में आ सकते हैं, लेकिन मानसून के समय इसकी खूबसूरती दोगुनी हो जाती है।

पहाड़ी नजारे: जलाशय के पास एक ऊंची पहाड़ी की चोटी है, जहां से सुबह और शाम के समय पूरे बालीडीहा बांध का विहंगम दृश्य देखा जा सकता है।

फोटोग्राफी के लिए बेस्ट: पहाड़ों और जंगलों के बीच घिरे होने के कारण यह जगह रील्स बनाने और फोटोग्राफी के शौकीनों के लिए किसी जन्नत से कम नहीं है।

ठंडा और साफ पानी: यहां के साफ पानी में उतरकर नहाने का मजा ही कुछ और है। जो लोग पानी से कतराते हैं, वे भी यहां की लहरों को देखकर खुद को रोक नहीं पाते।

कैसे पहुँचें बालीडीहा डैम?

बालीडीहा डैम पहुंचना काफी आसान है। इसके लिए आपको सबसे पहले कोलकाता या अपने शहर से बस या ट्रेन के जरिए बारीपदा (Baripada) पहुंचना होगा। बारीपदा रेलवे स्टेशन और बस स्टैंड दोनों से ही इस जगह के लिए अच्छी कनेक्टिविटी है। बारीपदा पहुंचने के बाद आप वहां से स्थानीय ऑटो, टैक्सी या प्राइवेट कार किराए पर लेकर आसानी से बालीडीहा डैम पहुंच सकते हैं।

तो फिर देर किस बात की? इस मानसून अपने बैग पैक कीजिए और निकल पड़िए ओडिशा के इस छिपे हुए खजाने यानी बालीडीहा डैम की सैर पर।

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Khurshani Imli:600 साल पुराने सफर से ‘अनोखे सम्मान’ तक की पूरी कहानी!!!

Khurshani imli:भारत में इमली का नाम सुनते ही मुंह में पानी आ जाता है। चटनी से लेकर सांभर तक, हमारे व्यंजनों में इसका एक खास स्थान है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि भारत में एक ऐसी भी इमली पाई जाती है, जिसका इतिहास बेहद अनोखा है और हाल ही में उसे एक बड़ा सम्मान मिला है? हम बात कर रहे हैं ‘खुरसानी इमली’ (Khursani Tamarind) की, जो इन दिनों अपनी एक नई पहचान को लेकर चर्चा में है।

आइए जानते हैं विटामिन्स से भरपूर इस अनोखी इमली और इसके दिलचस्प इतिहास के बारे में:

600 साल पुराना है इतिहास

खुरसानी इमली का भारत से नाता सदियों पुराना है। इतिहास के पन्नों को पलटें तो पता चलता है कि लगभग 600 साल पहले, अफगान और अरब व्यापारियों के जरिए इस इमली के पेड़ भारत आए थे। विदेशी जमीन से आकर भारत की मिट्टी में रची-बसी यह इमली आज यहां की संस्कृति का एक अहम हिस्सा बन चुकी है।

आम पेड़ों से बिल्कुल अलग है ‘बाओबाब’

खुरसानी इमली जिस पेड़ पर उगती है, उसे बाओबाब (Baobab Tree) कहा जाता है। यह पेड़ हमारी आम इमली के पेड़ों जैसा बिल्कुल नहीं दिखता।

अनोखी बनावट: बाओबाब पेड़ का तना (गुल्ली) और इसकी शाखाएं बहुत मोटी होती हैं।

पानी का भंडार: इस पेड़ के तने की खासियत यह है कि यह अपने भीतर भारी मात्रा में पानी जमा करके रख सकता है, जिससे यह सूखे के दिनों में भी जीवित रहता है।

दिखावट: इसका अजीबोगरीब और विशाल आकार दूर से ही लोगों का ध्यान खींच लेता है। इसी पेड़ पर अनोखे स्वाद वाली खुरसानी इमली फलती है।

सेहत का खजाना: भरपूर विटामिन्स

स्वाद के साथ-साथ खुरसानी इमली सेहत के लिए भी किसी वरदान से कम नहीं है। इसमें:

भरपूर मात्रा में विटामिन और मिनरल्स पाए जाते हैं।

यह शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता (Immunity) को बढ़ाने में मददगार है।

पाचन तंत्र को दुरुस्त रखने के लिए भी इसे बेहद फायदेमंद माना जाता है।

आदिवासियों की आजीविका और अब मिला ‘अनोखा सम्मान’

अब तक खुरसानी इमली का बाजार बहुत सीमित था। स्थानीय आदिवासी समुदाय के लोग इसे जंगलों या रास्तों के किनारे बैठकर बेचा करते थे। इसके अलावा, इससे कई तरह के स्वादिष्ट स्थानीय पकवान और उत्पाद भी बनाए जाते थे, जो केवल एक विशेष क्षेत्र तक ही सीमित थे।

क्या बदला अब?

खुरसानी इमली को हाल ही में एक ‘अनोखा सम्मान’ (Geographical Indication – GI Tag या विशेष दर्जा) मिला है। इस सम्मान के मिलने से अब इस इमली को राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर एक नई पहचान मिलेगी।

बाजार में आएगा उछाल

इस विशेष सम्मान के बाद उम्मीद जताई जा रही है कि खुरसानी इमली की मांग में भारी तेजी आएगी। इससे न सिर्फ इसकी बिक्री में जबरदस्त उछाल (जोआर) आएगा, बल्कि इसे बेचने वाले स्थानीय आदिवासी भाई-बहनों और किसानों की आर्थिक स्थिति में भी बड़ा सुधार देखने को मिलेगा।

सदियों पहले विदेश से आकर भारत की शान बनी यह खुरसानी इमली आज सही मायनों में आत्मनिर्भरता और पहचान का नया प्रतीक बन चुकी है।

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Hydrogen train:में दौड़ने वाली है देश की पहली हाइड्रोजन ट्रेन!!! जानिए इसकी तकनीक और खासियतें!!!

Hydrogen Train:भारतीय रेलवे ने पर्यावरण के अनुकूल (eco-friendly) परिवहन की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम उठाया है। देश की पहली हाइड्रोजन संचालित ट्रेन (Hydrogen Train) को रेलवे बोर्ड से हरी झंडी मिल चुकी है। ‘आत्मनिर्भर भारत’ अभियान के तहत पूरी तरह से स्वदेशी तकनीक से बनी यह ट्रेन जल्द ही पटरियों पर दौड़ती नजर आएगी। भारतीय रेलवे का दावा है कि ब्रॉडगेज नेटवर्क पर यह दुनिया की सबसे लंबी और सबसे शक्तिशाली हाइड्रोजन ट्रेन होगी।

आइए जानते हैं भारत की इस अनूठी ट्रेन के रूट, तकनीक और इसकी खासियतों के बारे में।

किस रूट पर चलेगी यह ट्रेन?

इस आधुनिक ट्रेन के परिचालन के लिए हरियाणा के जींद-सोनीपत रूट को चुना गया है। भारतीय रेलवे इस रूट पर इसके सभी जरूरी ट्रायल रन (परीक्षण) पहले ही सफलतापूर्वक पूरे कर चुका है, जिसके बाद इसे अंतिम मंजूरी दी गई है।

जींद-सोनीपत रूट को ही क्यों चुना गया?

वर्तमान में भारतीय रेलवे का लगभग 99.2% ब्रॉडगेज नेटवर्क बिजली से चलता है (Electrified है)। इसलिए हाइड्रोजन ट्रेन को इलेक्ट्रिक ट्रेनों के विकल्प के रूप में नहीं, बल्कि उन दुर्गम और पहाड़ी इलाकों के लिए तैयार किया जा रहा है जहाँ ओवरहेड बिजली की लाइनें (OHE) बिछाना बेहद कठिन या असंभव होता है।

कैसे काम करती है यह ‘ग्रीन’ तकनीक?

आसान शब्दों में कहें तो यह ट्रेन चलते समय खुद ही अपने लिए बिजली पैदा करती है। इसमें पारंपरिक इंजनों की तरह डीजल की जरूरत नहीं होती।

हाइड्रोजन फ्यूल सेल तकनीक: ट्रेन में लगे फ्यूल सेल के अंदर हाइड्रोजन और ऑक्सीजन के बीच एक रासायनिक प्रक्रिया (Chemical Reaction) होती है।

शून्य प्रदूषण: इस प्रक्रिया के जरिए बिजली (Electricity) पैदा होती है जिससे ट्रेन चलती है। सबसे अच्छी बात यह है कि इससे कोई हानिकारक धुआं या कार्बन नहीं निकलता। उप-उत्पाद (By-product) के रूप में केवल पानी की भाप (Water Vapor) बाहर निकलती है, जो इसे 100% पर्यावरण के अनुकूल बनाती है।

ट्रेन की मुख्य विशेषताएं और क्षमता

इस स्वदेशी हाइड्रोजन ट्रेन में यात्रियों की सुविधा और रफ्तार दोनों का पूरा ध्यान रखा गया है:

विशेषता विवरण

कोच की संख्या कुल 10 कोच (8 यात्री कोच + 2 ड्राइविंग पावर कार)

पावर क्षमता 1,200 किलोवाट (kW) क्षमता का हाइड्रोजन फ्यूल सेल सिस्टम

रफ़्तार (Speed) कमर्शियल रन के दौरान 75 किमी/घंटा (ट्रायल के दौरान अधिकतम 120 किमी/घंटा)

रेंज (एक बार रिफ्यूलिंग पर) एक बार हाइड्रोजन भरने पर यह ट्रेन लगभग 250 किलोमीटर की दूरी तय कर सकती है

ट्रेन के अंदर ही हाइड्रोजन सिलेंडर, फ्यूल सेल, एडवांस बैटरी बैकअप और कंट्रोल सिस्टम के लिए एक विशेष और सुरक्षित जगह तैयार की गई है।

सुरक्षा के कड़े इंतजाम और स्वदेशी निर्माण

चूंकि हाइड्रोजन एक अत्यधिक ज्वलनशील गैस है, इसलिए इस ट्रेन में सुरक्षा का स्तर सबसे ऊंचा रखा गया है। ट्रेन के आगे की तरफ 27 और पीछे की तरफ 27 विशेष हाइड्रोजन सिलेंडर लगाए गए हैं। इसके साथ ही, देश में ही इसके लिए सुरक्षित हाइड्रोजन स्टोरेज और रिफ्यूलिंग स्टेशन भी विकसित किए गए हैं।

यह पूरी ट्रेन पूरी तरह ‘मेड इन इंडिया’ है। इसका डिजाइन लखनऊ के अनुसंधान डिजाइन और मानक संगठन (RDSO) ने तैयार किया है, जबकि इसका निर्माण चेन्नई की इंटीग्रल कोच फैक्ट्री (ICF) में किया गया है। जर्मनी, जापान, चीन और अमेरिका जैसे चुनिंदा देशों के बाद अब भारत भी इस तकनीक वाले देशों के एलीट क्लब में शामिल हो गया है।

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Sushruta statue:चिकित्सा जगत में भारत का गौरव!!! एडिनबर्ग के रॉयल कॉलेज में स्थापित हुई ‘प्लास्टिक सर्जरी के जनक’ महर्षि सुश्रुत की प्रतिमा!!!

Sushruta statue:वैश्विक मंच पर भारत की प्राचीन वैज्ञानिक और चिकित्सा विरासत को एक बार फिर से बहुत बड़ी अंतरराष्ट्रीय मान्यता मिली है। स्कॉटलैंड के एडिनबर्ग में स्थित दुनिया के सबसे प्राचीन और प्रतिष्ठित शल्य-चिकित्सा संस्थानों में से एक, ‘रॉयल कॉलेज ऑफ सर्जन्स’ में दुनिया के पहले सर्जन महर्षि सुश्रुत की प्रतिमा स्थापित की गई है। इस पहल को भारतीय चिकित्सा इतिहास के लिए एक ऐतिहासिक मील का पत्थर माना जा रहा है।

कौन थे महर्षि सुश्रुत?

महर्षि सुश्रुत को दुनिया का पहला शल्यचिकित्सक (सर्जन) और ‘प्लास्टिक सर्जरी का पिता’ (Father of Plastic Surgery) कहा जाता है। यद्यपि उनके कालखंड को लेकर इतिहासकारों में थोड़े मतभेद हैं, लेकिन व्यापक रूप से यह माना जाता है कि वह ईसा पूर्व छठी शताब्दी (लगभग 600 ईसा पूर्व) के दौरान काशी (वाराणसी) में सक्रिय थे।

उनके द्वारा रचित ग्रंथ ‘सुश्रुत संहिता’ प्राचीन भारतीय चिकित्सा विज्ञान का एक अनमोल खजाना है। इस ग्रंथ में:

जटिल शल्य-चिकित्सा (सर्जरी) के सिद्धांतों का विस्तार से वर्णन है।

मोतियाबिंद, पथरी और अंगों को जोड़ने जैसी प्रक्रियाओं की सटीक जानकारी दी गई है।

सबसे महत्वपूर्ण बात, इसमें ‘राइनोप्लास्टी’ (नाक की प्लास्टिक सर्जरी) की पूरी विधि बताई गई है, जिसका अनुसरण आधुनिक चिकित्सा विज्ञान आज भी करता है।

कैसे साकार हुआ यह प्रयास?

एडिनबर्ग में इस प्रतिमा को स्थापित करने का मुख्य श्रेय भारतीय मूल के ब्रिटिश सर्जन प्रोफेसर चंद्र चेरुवु को जाता है। उनके अथक प्रयासों के कारण ही इस महान प्राचीन भारतीय वैज्ञानिक को यह वैश्विक सम्मान मिल सका।

इस प्रतिमा की कुछ खास बातें इस प्रकार हैं:

निर्माण: लगभग 90 किलोग्राम वजनी इस भव्य ब्रॉन्ज (कांस्य) प्रतिमा को तमिलनाडु के कुशल मूर्तिकारों ने तैयार किया है।

ऐतिहासिक संबंध: स्कॉटलैंड में भारतीय दूतावास ने इस पहल की सराहना करते हुए प्रोफेसर चेरुवु का आभार व्यक्त किया। दूतावास ने सोशल मीडिया (X) पर लिखा कि यह आयोजन भारत की प्राचीन चिकित्सा परंपरा के साथ-साथ चिकित्सा के क्षेत्र में भारत और स्कॉटलैंड के ऐतिहासिक संबंधों का एक अनूठा उत्सव है।

वैश्विक स्तर पर महत्व

एडिनबर्ग का ‘रॉयल कॉलेज’ दुनिया भर में सर्जिकल शिक्षा और प्रशिक्षण के प्रसार के लिए जाना जाता है। ऐसे प्रतिष्ठित संस्थान के मुख्य परिसर में महर्षि सुश्रुत की प्रतिमा का लगना इस बात का अकाट्य प्रमाण है कि आधुनिक चिकित्सा विज्ञान की जड़ें कितनी गहराई से प्राचीन भारतीय ज्ञान से जुड़ी हुई हैं। यह आयोजन केवल एक मूर्ति की स्थापना नहीं है, बल्कि सदियों पुराने उस भारतीय विज्ञान का सम्मान है जिसने पूरी मानवता को जीने की एक नई राह दिखाई थी।

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PM Awas Yojana:पश्चिम बंगाल में PMAY के नियमों में बड़े बदलाव की तैयारी, अब ‘कोटा सिस्टम’ से मिल सकता है आसानी से घर!!!

PM Awas Yojona:यदि आप भी प्रधानमंत्री आवास योजना (PM Awas Yojana) का लाभ उठाने के लिए बार-बार आवेदन कर रहे हैं, लेकिन हर बार आपका आवेदन निरस्त हो जाता है, तो यह खबर आपके काम की है। पश्चिम बंगाल सरकार जल्द ही इस महत्वाकांक्षी योजना के नियमों में बड़ी ढील देने पर विचार कर रही है। इसके लिए राज्य प्रशासन (नवान्न) केंद्र सरकार के साथ बातचीत का रास्ता तलाश रहा है। उम्मीद है कि यदि दोनों पक्षों में सहमति बनती है, तो आने वाले दिनों में बड़ी संख्या में जरूरतमंदों को पक्का मकान मिल सकेगा।

क्या आसान होंगे प्रधानमंत्री आवास योजना के नियम?

वर्तमान नियमों के अनुसार, PMAY का लाभ केवल उन्हीं लोगों को मिलता है जिनके पास कोई पक्का मकान नहीं है। लेकिन इस कड़े नियम के कारण कई ऐसे योग्य परिवार भी लिस्ट से बाहर हो जाते हैं, जिनके मिट्टी के घरों पर एस्बेस्टस (Asbestos) या टिन की शीट (Corrugated Sheets) लगी होती है।

राज्य सरकार का मानना है कि केवल छत पर टिन या एस्बेस्टस होने मात्र से किसी का घर ‘पक्का मकान’ नहीं हो जाता। इस मुद्दे पर प्रशासन का रुख बेहद स्पष्ट है:

मजबूरी में छत मजबूत करना: भारी बारिश, चक्रवात और प्राकृतिक आपदाओं से बचने के लिए कई गरीब परिवार तिनका-तिनका जोड़कर अपनी छत को थोड़ा मजबूत कर लेते हैं।

अधिकारियों का तर्क: एक सरकारी अधिकारी के अनुसार, “कई बेहद गरीब परिवारों के घर की दीवारें मिट्टी की ही होती हैं, लेकिन वे मौसम की मार से बचने के लिए छत पर थोड़ा खर्च करते हैं। सिर्फ इस वजह से उन्हें योजना से वंचित रखना नाइंसाफी है।”

पुरानी सूची की दोबारा जांच: सूत्रों के मुताबिक, राज्य सरकार ने पिछले 5 वर्षों में दो चरणों के तहत लगभग 43 लाख लाभार्थियों को दी गई राशि की सूची को फिर से री-वेरिफाई (पुनर्जांच) करने का आदेश दिया है। इस छंटनी में कई अपात्र (अयोग्य) लोगों के नाम काटे जाने की संभावना है।

आवास योजना में लागू हो सकता है ‘कोटा’ सिस्टम

इस बार पश्चिम बंगाल में आवास योजना के तहत ‘कोटा सिस्टम’ लागू करने की सुगबुगाहट तेज है। इस व्यवस्था के अंतर्गत केंद्र सरकार द्वारा हर वित्तीय वर्ष में पश्चिम बंगाल के लिए एक निश्चित कोटा (Target) तय किया जाएगा कि उस वर्ष कितने लाभार्थियों को पक्के मकान के लिए फंड आवंटित किया जाना है।

इसी सिलसिले में केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने हाल ही में वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए प्रधानमंत्री आवास योजना-ग्रामीण (PMAY-G) के तहत एक बड़ा कदम उठाया है:

विवरण आंकड़े और संबंधित राज्य

कुल स्वीकृत राशि ₹10,021.42 करोड़

लाभान्वित राज्य (12 राज्य) असम, छत्तीसगढ़, गुजरात, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, झारखंड, कर्नाटक, केरल, पंजाब, राजस्थान, तमिलनाडु और उत्तर प्रदेश।

यदि केंद्र और राज्य के बीच आगामी बातचीत सफल रहती है, तो बंगाल के लाखों उन परिवारों की किस्मत खुल सकती है जो अब तक मामूली तकनीकी कारणों से इस योजना की दौड़ से बाहर थे।

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Hilsa Fish:की पहली सौगात!!!बाजारों में आई ताज़ा इलिश, जानें क्या है बड़े साइज की मछली का भाव!!!

Hilsa Fish:मानसून की शुरुआत के साथ ही मछली प्रेमियों के लिए एक बेहद अच्छी खबर सामने आई है। समुद्र और नदियों में मछली पकड़ने पर लगी सरकारी रोक हटने के बाद, बाजारों में इस सीजन की पहली इलिश (Hilsa) मछली दिखाई देने लगी है। 14 जून की आधी रात से ही दक्षिण 24 परगना के लगभग 3,000 ट्रॉलर्स गहरे समुद्र में मछली पकड़ने के लिए रवाना हो चुके हैं। इसके साथ ही, स्थानीय मछुआरे भी छोटी नावों (डिंगी) के सहारे नजदीकी नदी-नालों में उतर गए हैं, और उनके जालों में बंगाल की पसंदीदा इलिश मछली फंसने लगी है।

स्थानीय नदियों से हो रही है शुरुआती आपूर्ति

फिलहाल सुंदरबन के नजदीकी बाजारों में इलिश की बिक्री तेजी से शुरू हो गई है। मुड़ीगंगा, हांतनिया-दोआनिया और सप्तमुखी जैसी नदियों में मछुआरे हर दिन ज्वार (High Tide) के समय जाल बिछाते हैं और भाटा (Low Tide) आने से पहले उसे निकाल लेते हैं। इस साल उनके पारंपरिक ‘बिंदी जाल’ में अच्छी बनावट और आकर्षक साइज की इलिश मछलियां आ रही हैं, जिसने व्यापारियों के चेहरे पर खुशी ला दी है।

क्या है मौजूदा कीमत और साइज?

काकद्वीप पालबाजार के एक स्थानीय मछली विक्रेता के अनुसार, सीजन की यह पहली खेप मुख्य रूप से स्थानीय नदियों से आ रही है। शुरुआत होने के कारण बाजार में इसकी मांग जबरदस्त है। फिलहाल बाजार में आ रही इन मछलियों का वजन 350 से 400 ग्राम के बीच है, और यह ₹800 प्रति किलोग्राम की दर से बिक रही हैं।

गहरे समुद्र से ट्रॉलर्स के लौटने पर घटेंगे दाम!

मछुआरा संगठन का कहना है कि अभी बाजार में आ रही इलिश की मात्रा काफी सीमित है क्योंकि यह सिर्फ स्थानीय नदियों से आ रही है। असली रौनक तो तब बढ़ेगी जब गहरे समुद्र में गए बड़े ट्रॉलर्स मछलियों की भारी खेप लेकर तट पर लौटेंगे। उम्मीद जताई जा रही है कि आने वाले कुछ ही दिनों में, खासकर ‘जमाई षष्ठी’ के त्योहार से पहले, ये ट्रॉलर्स वापस आ जाएंगे।

संगठन के मुताबिक, ट्रॉलर्स के लौटते ही बाजार में इलिश की आमद (सप्लाई) काफी बढ़ जाएगी, जिससे ग्राहकों को बड़े साइज की मछलियों के कई विकल्प मिलेंगे और कीमतों में भी कमी आने की संभावना है। बहरहाल, सीजन की पहली ताज़ा इलिश को देखकर मछली प्रेमियों का उत्साह सातवें आसमान पर है और बाजारों में खरीदारों की भारी भीड़ उमड़ रही है।

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Mango:मियाज़ाकी से लेकर ‘एप्पल मैंगो’ तक!!! मुर्शिदाबाद के वासिम राजा के बागान में सिमटी है दुनिया भर के आमों की खुशबू!!!

Mango:मुर्शिदाबाद का एक छोटा सा गांव इन दिनों आम प्रेमियों और कौतूहल से भरे लोगों का पसंदीदा ठिकाना बना हुआ है। भगवानगोला-1 ब्लॉक के वर्षातिगोला गांव के रहने वाले वासिम राजा ने अपनी सिर्फ दो बीघा जमीन पर मानो पूरी दुनिया के बेहतरीन आमों का एक मेला सजा दिया है। उनके इस अनूठे बागान को देखकर रवींद्रनाथ टैगोर की वह प्रसिद्ध पंक्ति याद आती है— “बिबिधेर माझें मिलन महान” (विविधता में महान एकता)।

उनके इस छोटे से भूखंड पर जो दुर्लभ नजारा देखने को मिल रहा है, उसे शब्दों में बयां करना मुश्किल है। यहाँ जापान का विश्वप्रसिद्ध मियाज़ाकी, ऑस्ट्रेलिया का किंग ऑफ चाकापात, थाईलैंड का बनाना मैंगो और एप्पल मैंगो, चीन का चैंगमाई और बारी-4 जैसी इंटरनेशनल वैरायटी के आम पेड़ों पर लद चुके हैं। इसके अलावा मिस्र (Egypt) और बांग्लादेश की भी कई अनोखी प्रजातियों समेत कुल 18 विदेशी किस्मों के आम इस बागान की शोभा बढ़ा रहे हैं।

छत के गमले से शुरू हुआ दो बीघे का यह सफर

पेशा से ठेकेदार (Contractor) वासिम राजा के इस अनोखे सफर की कहानी बेहद दिलचस्प है। करीब 6 साल पहले वह बांग्लादेश में अपने एक रिश्तेदार के घर गए थे। वहाँ उन्होंने देखा कि उनके रिश्तेदार ने छत पर गमलों में ही दुनिया भर के कई दुर्लभ आम उगा रखे थे और उनमें बेहतरीन फल भी आए थे। हर आम का स्वाद और खुशबू एक-दूसरे से बिल्कुल जुदा थी। बस, यहीं से वासिम के मन में भी ऐसा ही कुछ करने का जुनून सवार हुआ।

बांग्लादेश से लौटते समय वह अपने साथ कुछ पौधों के ग्राफ्ट (चारे) लेकर आए और शुरुआत में उन्हें अपने घर के गमलों में लगाया। जब वहाँ कामयाबी मिली, तो उन्होंने अपने घर के पास खाली पड़ी ढाई बीघा जमीन में से दो बीघे पर इसका एक्सपेरिमेंट करने का फैसला किया।

एक अनूठा नजारा: आज वासिम के बागान में करीब 400 आम के पेड़ हैं। पेड़ों की डालियाँ आमों के बोझ से इतनी झुक गई हैं कि कई जगह वे जमीन को छू रही हैं।

धोखे और नुकसान के बाद भी नहीं हारी हिम्मत

इस मुकाम तक पहुँचना वासिम के लिए इतना आसान नहीं था। इस जुनून के चक्कर में उन्हें लाखों रुपये का नुकसान भी उठाना पड़ा और वह धोखाधड़ी का शिकार भी हुए।

धोखे का सामना: एक बार महंगे विदेशी पौधों के नाम पर उन्हें नकली या कम गुणवत्ता वाले पौधे बेच दिए गए। जब उन पेड़ों पर मनमुताबिक फल नहीं आए, तो वासिम ने भारी मन से लाखों रुपये के उन पेड़ों को कटवा दिया।

फिर से खड़े होना: हार मानने के बजाय उन्होंने अगले साल फिर से पैसे जुटाए और खुद प्रामाणिक जगहों (जैसे ऑस्ट्रेलिया और बांग्लादेश) से अच्छी गुणवत्ता वाले ओरिजिनल पौधे खरीदकर लाए। उनकी इस लगन का नतीजा आज सबके सामने है।

‘मैंगो फेस्टिवल’ के चैंपियन और उनका भविष्य का सपना

वासिम के इस अनोखे प्रयास को सरकारी स्तर पर भी सराहना मिली है। साल 2025 में भगवानगोला-1 ब्लॉक प्रशासन द्वारा आयोजित ‘आम उत्सव’ में वासिम राजा के बागान के आमों ने पहला स्थान (First Prize) हासिल किया था।

आमों के इस कमर्शियल दौर में भी वासिम की सोच बिल्कुल जुदा है।

मुफ्त में चखिए आम: वासिम अपने बागान के आमों को बेचते नहीं हैं। अगर कोई उनके बागान का आम खाने की इच्छा जताता है, तो वह उसे मुफ्त में खिलाते हैं।

बिज़नेस मॉडल (नर्सरी): वह चाहते हैं कि इन विदेशी और लजीज आमों का स्वाद हर आम इंसान तक पहुँचे। इसके लिए उन्होंने एक नर्सरी शुरू की है, जहाँ वह इन दुर्लभ आमों के पौधे तैयार कर लोगों को बेच रहे हैं। इन पौधों की कीमत प्रजाति के हिसाब से 1,000 रुपये से लेकर 3,000 रुपये तक है।

वासिम राजा का यह छोटा सा बागान आज न सिर्फ मुर्शिदाबाद बल्कि पूरे बंगाल के लिए गर्व का विषय बन चुका है, जहाँ कदम रखते ही महसूस होता है कि वाकई एक छोटी सी जगह पर ‘एक टुकड़ा दुनिया’ सिमट आई है।

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Organic Farming:ISRO की नौकरी छोड़ चुना जैविक खेती का रास्ता!!! खजूर उगाकर सालाना ₹15 लाख कमा रहे हैं दिवाकर!!!

Organic Farming :आज के दौर में जहां युवा खेती-किसानी से दूर भागकर कॉर्पोरेट नौकरियों की तलाश में हैं, वहीं कर्नाटक के दिवाकर चन्नाप्पा ने इसके बिल्कुल विपरीत राह चुनी। उन्होंने देश के सबसे प्रतिष्ठित संस्थान इलेक्ट्रॉनिक्स और अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) की एक सुरक्षित और आरामदायक नौकरी को अलविदा कह दिया। दिवाकर ने मिट्टी से जुड़ने का फैसला किया और आज वे ‘बारही’ (Barhi) प्रजाति के खजूर की जैविक खेती (Organic Farming) कर सालाना 15 लाख रुपये से अधिक की कमाई कर रहे हैं।

आइए जानते हैं कि कैसे एक वैज्ञानिक माहौल से निकलकर दिवाकर देश के किसानों के लिए एक बड़ी मिसाल बन गए।

जब ‘वन स्ट्रॉ रेवोल्यूशन’ किताब ने बदली जिंदगी की दिशा

कर्नाटक के सुग्गानहल्ली के रहने वाले दिवाकर चन्नाप्पा का जन्म एक किसान परिवार में हुआ था। उनके पिता रागी (फिंगर मिलेट), मक्का और अरहर जैसी पारंपरिक फसलें उगाते थे। हालांकि, पारंपरिक खेती में लगातार होते नुकसान को देखकर दिवाकर ने पढ़ाई पर ध्यान दिया। उन्होंने सोशल वर्क में पोस्ट-ग्रेजुएशन (MSW) किया और बाद में ISRO में शामिल हो गए। इसके साथ ही वे तुमकुर यूनिवर्सिटी में गेस्ट लेक्चरर के रूप में भी पढ़ाते थे।

सब कुछ सही चल रहा था, लेकिन दिवाकर का मन अपनी जड़ों से जुड़ा हुआ था। इसी बीच उनके हाथ जापानी किसान और दार्शनिक मासानोबु फुकुओका की प्रसिद्ध किताब ‘वन स्ट्रॉ रेवोल्यूशन’ (One Straw Revolution) लगी। इस किताब ने उनके सोचने का तरीका पूरी तरह बदल दिया और उनमें नेचुरल तथा ऑर्गेनिक फार्मिंग की अलख जगा दी। उन्होंने तय कर लिया कि अब वे नौकरी छोड़ पूरी तरह से खेती में उतरेंगे।

शुरुआत में परिवार का विरोध और खजूर का आइडिया

जब दिवाकर ने नौकरी छोड़ने का फैसला किया, तो उनके पिता और परिवार के अन्य सदस्य इसके खिलाफ थे। उनके पिता जानते थे कि खेती में कितनी अनिश्चितता होती है। लेकिन दिवाकर अपने फैसले पर अडिग रहे।

शुरुआत में उन्होंने कुछ पारंपरिक फसलें उगाईं, लेकिन वे कुछ ऐसा करना चाहते थे जो कम पानी में बेहतर मुनाफा दे सके। बेंगलुरु के एक कृषि मेले के दौरान उन्हें तमिलनाडु में होने वाली खजूर की खेती के बारे में पता चला। उन्होंने महसूस किया कि कर्नाटक की जलवायु और मिट्टी भी खजूर के लिए बिल्कुल उपयुक्त है।

मराली मन्निगे’ (मिट्टी की ओर वापसी): दिवाकर ने अपने इस सफर को एक बेहद खूबसूरत नाम दिया। उन्होंने अपने फार्म का नाम कन्नड़ में ‘मराली मन्निगे’ रखा, जिसका हिंदी अर्थ है—”माटी की ओर लौटना”।

2.5 एकड़ जमीन और ₹4.5 लाख का निवेश

साल 2009 में दिवाकर ने एक बड़ा जोखिम लिया। उन्होंने अपनी ढाई एकड़ जमीन पर लगभग 4.5 लाख रुपये का निवेश करके ‘बारही’ खजूर के 150 पौधे लगाए। बारही खजूर अपनी मिठास और बेहतरीन स्वाद के लिए जाने जाते हैं।

रासायनिक खादों को कहा ‘ना’

दिवाकर ने शुरू से ही तय कर रखा था कि वे अपनी जमीन पर जहर (रासायनिक कीटनाशक) नहीं डालेंगे। उन्होंने पूरी तरह जैविक पद्धतियों को अपनाया:

वे बाजार की महंगी खादों के बजाय खुद पंचगव्य और जीवामृत तैयार करते हैं।

इससे न केवल मिट्टी की उपजाऊ क्षमता (Microbial Activity) बढ़ी, बल्कि पौधों को प्राकृतिक रूप से पोषण मिला।

पहली फसल से बढ़ा हौसला, आज कमा रहे हैं बंपर मुनाफा

साल 2013 (पहली सफलता): चार साल की कड़ी मेहनत के बाद पेड़ों पर पहली बार फल आए। पहली बार में करीब 650 किलोग्राम खजूर का उत्पादन हुआ, जिसे उन्होंने बाजार में ₹375 प्रति किलो के शानदार दाम पर बेचा। इस पहली सफलता ने उनका आत्मविश्वास आसमान पर पहुंचा दिया।

साल 2023 का आंकड़ा: धीरे-धीरे उनके बाग के पेड़ पूरी तरह परिपक्व हो गए। साल 2023 तक आते-आते उनके पास बारही खजूर के 102 बेहद स्वस्थ पेड़ थे। हर एक पेड़ से औसतन 40 से 50 किलोग्राम फल निकले। उस साल उनका कुल उत्पादन लगभग 4.2 टन (4200 किलो) रहा।

विवरण आंकड़े

शुरुआती निवेश (2009) ₹4.5 लाख

कुल जमीन 2.5 एकड़

खजूर की वैरायटी बारही (Barhi)

वार्षिक मुनाफा (वर्तमान) ₹15 लाख से अधिक

सफलता का सबसे बड़ा मंत्र: ‘डायरेक्ट-टू-कंज्यूमर’ (D2C) बिजनेस मॉडल

दिवाकर की सफलता का राज सिर्फ अच्छी फसल उगाना नहीं, बल्कि उसे सही तरीके से बेचना भी है। उन्होंने कृषि बाजार के सबसे बड़े खलनायक यानी ‘बिचौलियों’ (Middlemen) को पूरी तरह हटा दिया।

वे अपने खेत के ताजे खजूरों को सीधे ग्राहकों तक पहुंचाते हैं। इससे दो बड़े फायदे होते हैं:

बिचौलियों का कमीशन बचने से दिवाकर को अपनी फसल का शत-प्रतिशत सही दाम मिलता है।

ग्राहकों को सीधे खेत से बिना किसी केमिकल के पका हुआ शुद्ध और ताजा फल मिलता है, जिससे उनका भरोसा दिवाकर के ब्रांड पर बना रहता है।

निष्कर्ष: युवाओं के लिए एक नई प्रेरणा

आज दिवाकर चन्नाप्पा उन सभी लोगों के लिए एक जीती-जागती मिसाल हैं जो यह मानते हैं कि खेती में कोई भविष्य या पैसा नहीं है। उन्होंने साबित कर दिया है कि अगर सही रणनीति, आधुनिक दृष्टिकोण, धैर्य और प्रकृति के प्रति सम्मान के साथ काम किया जाए, तो मिट्टी से भी ‘सोना’ उगाया जा सकता है। दिवाकर आज न सिर्फ मोटी कमाई कर रहे हैं, बल्कि सम्मानजनक आत्मनिर्भर जीवन जीकर हजारों युवाओं को कृषि क्षेत्र में आने के लिए प्रेरित कर रहे हैं।

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Amul: पश्चिम बंगाल के औद्योगिक और व्यापारिक क्षेत्र में एक बहुत बड़ा निवेश होने जा रहा है। देश की सबसे बड़ी डेयरी कंपनी अमूल (Amul) हावड़ा के संकराइल (Sankrail) में दुनिया का सबसे बड़ा दही उत्पादन केंद्र (World’s Largest Yogurt/Curd Production Center) स्थापित करने जा रही है। इस मेगा प्रोजेक्ट का शिलान्यास करने के लिए देश के केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह खुद बंगाल आ रहे हैं। राज्य में नई राजनीतिक व प्रशासनिक व्यवस्था के बाद यह पहला इतना बड़ा औद्योगिक प्लांट होने जा रहा है, जिसका भूमि पूजन होने जा रहा है।

​मिली जानकारी के अनुसार, आगामी 14 जून को हावड़ा के संकराइल फूड पार्क में इस प्रस्तावित प्लांट का आधिकारिक शिलान्यास किया जाएगा। यह जगह कोलकाता से महज 25-35 किलोमीटर की दूरी पर राष्ट्रीय राजमार्ग 16 (NH-16) के बिल्कुल पास स्थित है। इस भव्य कार्यक्रम में देश भर से लगभग 600 दुग्ध उत्पादक (डेयरी किसान) और 200 से अधिक विशिष्ट अतिथि शामिल होंगे।

नबन्ना में हुई हाई-प्रोफाइल बैठक

​इस ऐतिहासिक शिलान्यास से पहले शनिवार को राज्य के सचिवालय ‘नबन्ना’ में एक बेहद महत्वपूर्ण और उच्च स्तरीय बैठक हुई। इस बैठक में गुजरात को-ऑपरेटिव मिल्क मार्केटिंग फेडरेशन (GCMMF) के मैनेजिंग डायरेक्टर (MD) श्री जयेन मेहता और कायरा डिस्ट्रिक्ट को-ऑपरेटिव मिल्क प्रोड्यूसर्स यूनियन (अमूल डेयरी) के सर्वेसर्वा श्री अमित व्यास ने हिस्सा लिया।

​बैठक के बाद मुख्यमंत्री शुभेंद्रु अधिकारी ने इस मुलाकात को राज्य के विकास के लिए मील का पत्थर बताया। उन्होंने कहा:

​”आज नबन्ना में अमूल डेयरी के शीर्ष अधिकारियों के साथ हमारी शिष्टाचार मुलाकात और बेहद महत्वपूर्ण चर्चा हुई। आने वाले समय में पश्चिम बंगाल में अमूल जैसी इतनी बड़ी और प्रतिष्ठित संस्था का निवेश राज्य के आर्थिक विकास, रोजगार के नए अवसरों और डेयरी उद्योग के आधुनिकीकरण में बहुत बड़ी भूमिका निभाएगा। यह चर्चा बेहद सकारात्मक रही और मुझे पूरा भरोसा है कि बंगाल और अमूल का यह आपसी सहयोग राज्य में खुशहाली का नया सवेरा लेकर आएगा।”

600 करोड़ का निवेश और रिकॉर्ड उत्पादन

इस प्रोजेक्ट से जुड़ी कुछ बेहद खास बातें इस प्रकार हैं:

​प्राथमिक निवेश: इस प्लांट को शुरू करने के लिए शुरुआती तौर पर 600 करोड़ रुपये का भारी-भरकम निवेश किया जा रहा है।

मुख्य फोकस: हालांकि यहाँ दूध से बने कई अन्य प्रॉडक्ट्स भी तैयार किए जाएंगे, लेकिन इस प्लांट का मुख्य फोकस ‘दही’ पर होगा।

दैनिक क्षमता: इस अत्याधुनिक कारखाने से रोजाना 10 लाख किलोग्राम (10 Lakh Kg) दही, लस्सी और छाछ (मट्ठा) का उत्पादन करने का लक्ष्य रखा गया है।

स्थानीय स्तर पर रोजगार की बहार

​अमूल (आनंद मिल्क यूनियन लिमिटेड), जिसकी शुरुआत साल 1946 में हुई थी, आज भारत का सबसे बड़ा दुग्ध ब्रांड है और इससे देश के लाखों पशुपालक जुड़े हुए हैं। हावड़ा के संकराइल में बनने वाले इस नए प्लांट से न केवल बंगाल के स्थानीय डेयरी किसानों को अपनी उपज का सही दाम मिलेगा, बल्कि हजारों युवाओं के लिए रोजगार (Employment) के नए रास्ते भी खुलेंगे। कोलकाता के नजदीकी जिले हावड़ा के लोग इस निवेश को लेकर बेहद उत्साहित हैं और इसे राज्य के औद्योगिक पुनरुत्थान के रूप में देख रहे हैं।

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