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Mount Kailash: दुनिया की वह पवित्र चोटी, जहां आज भी इंसानी कदम नहीं पहुंचे!!!

कैलाश: दुनिया की वह पवित्र चोटी, जहां आज भी इंसानी कदम नहीं पहुंचे

एवरेस्ट और के-2 पर फहराया मानव साहस का परचम, लेकिन कैलाश की चोटी आज भी अछूती

दुनिया के सबसे ऊंचे और दुर्गम पर्वतों को जीतने की मानव कहानी जितनी रोमांचक है, उतनी ही रहस्यमय कहानी तिब्बत के कैलाश पर्वत की भी है। इंसान ने माउंट एवरेस्ट की चोटी पर कदम रखा, के-2 जैसी कठिन पर्वत चोटियों को पार किया, अन्नपूर्णा और नंगा पर्वत जैसे चुनौतीपूर्ण शिखरों पर भी पहुंच बनाई। आधुनिक पर्वतारोहण ने तकनीक, प्रशिक्षण और साहस के सहारे प्रकृति की अनेक कठिन सीमाओं को पार किया है।

लेकिन हिमालय के विस्तृत भूभाग में एक ऐसा पर्वत आज भी मौजूद है, जिसकी चोटी पर किसी सफल मानव आरोहण का विश्वसनीय और प्रमाणित रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है।

यह पर्वत है—कैलाश।

लगभग 6,638 मीटर ऊंचा कैलाश तिब्बत के पश्चिमी क्षेत्र में स्थित है। देखने में लगभग पिरामिड जैसी सममित आकृति वाला यह पर्वत दूर से ही अपनी अलग पहचान बना लेता है। लेकिन इसकी वास्तविक पहचान इसकी ऊंचाई या आकार से कहीं अधिक गहरी है।

हिंदू, बौद्ध, जैन और तिब्बती Bön परंपराओं में कैलाश को अत्यंत पवित्र माना जाता है। इसलिए दुनिया के दूसरे पर्वतों की तरह यहां शिखर पर पहुंचना उपलब्धि का अंतिम लक्ष्य नहीं है। इसके बजाय कैलाश की परिक्रमा धार्मिक आस्था और आध्यात्मिक यात्रा का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

आज कैलाश की चोटी पर पर्वतारोहण की अनुमति नहीं है। यही कारण है कि अत्याधुनिक पर्वतारोहण तकनीक के युग में भी यह पर्वत मानव पैरों के स्पर्श से दूर बना हुआ है।

तिब्बत की धरती पर खड़ा एक असाधारण पर्वत

कैलाश तिब्बत के पश्चिमी हिस्से में गंगदिसे या ट्रांसहिमालय पर्वत प्रणाली का हिस्सा है। इसके आसपास का पूरा क्षेत्र ऊंचे पठारों, बर्फीली चोटियों और कठोर जलवायु के लिए जाना जाता है।

कैलाश के निकट ही मानसरोवर और राक्षसताल स्थित हैं। ये दोनों झीलें इस क्षेत्र के प्राकृतिक और धार्मिक महत्व को और बढ़ाती हैं।

कैलाश-मानसरोवर क्षेत्र का महत्व केवल धार्मिक नहीं है। यह एशिया की प्रमुख नदी प्रणालियों के उद्गम क्षेत्रों से भी भौगोलिक रूप से जुड़ा हुआ है। सिंधु, सतलुज, कर्णाली और ब्रह्मपुत्र नदी प्रणालियों के स्रोत क्षेत्र व्यापक रूप से इसी तिब्बती उच्चभूमि से संबंधित हैं।

इस दृष्टि से कैलाश को केवल एक धार्मिक पर्वत मानना उसके भौगोलिक महत्व को सीमित कर देना होगा।

यह पर्वत एक ऐसे भूभाग में खड़ा है, जिसका असर एशिया की जल-भूगोल व्यवस्था तक दिखाई देता है।

बर्फ से ढका पिरामिड और उसकी रहस्यमयी छवि

कैलाश की सबसे विशिष्ट विशेषताओं में उसका आकार भी शामिल है। कई कोणों से देखने पर इसकी चोटी लगभग सममित पिरामिड जैसी दिखाई देती है।

सफेद बर्फ से ढका हुआ शिखर, उसके नीचे गहरे रंग की चट्टानी संरचनाएं और आसपास फैला विशाल तिब्बती पठार कैलाश को एक अलग दृश्यात्मक पहचान देते हैं।

लेकिन पर्वत की यह आकृति केवल प्राकृतिक सुंदरता का विषय नहीं बनी। सदियों से लोगों ने इसे धार्मिक प्रतीकों और आध्यात्मिक धारणाओं से भी जोड़ा है।

यही वजह है कि कैलाश की तस्वीरें, यात्राओं के विवरण और धार्मिक कथाएं भारत तथा तिब्बत से लेकर दुनिया के विभिन्न हिस्सों तक लोगों की कल्पना को आकर्षित करती रही हैं।

चार धार्मिक परंपराओं में विशेष स्थान

कैलाश की सबसे बड़ी विशेषता उसकी बहुधार्मिक पहचान है।

हिंदू परंपरा में इसे भगवान शिव का निवास माना जाता है। शिव और पार्वती से जुड़ी अनेक धार्मिक कथाओं में कैलाश का विशेष स्थान है। भारतीय धार्मिक संस्कृति में कैलाश केवल हिमालय की एक चोटी नहीं, बल्कि आध्यात्मिक शक्ति और तपस्या के प्रतीक के रूप में भी देखा जाता है।

बौद्ध परंपरा में भी कैलाश अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। तिब्बती बौद्ध संस्कृति में इस पर्वत से जुड़ी अनेक धार्मिक कथाएं और परंपराएं मौजूद हैं।

जैन धर्म में भी कैलाश क्षेत्र का संबंध धार्मिक इतिहास और आध्यात्मिक परंपराओं से जोड़ा जाता है।

इसी प्रकार तिब्बत की प्राचीन Bön परंपरा में भी कैलाश का विशेष धार्मिक महत्व है।

इस प्रकार एक ही पर्वत को चार अलग-अलग धार्मिक परंपराएं अपनी-अपनी मान्यताओं के अनुसार पवित्र मानती हैं।

यही बहुआयामी धार्मिक महत्व कैलाश को सामान्य पर्वतारोहण के दृष्टिकोण से अलग बनाता है।

पर्वतारोहण की दुनिया की नजर भी पहुंची कैलाश तक

बीसवीं सदी में जब दुनिया के दुर्गम पर्वतों का वैज्ञानिक और साहसिक अध्ययन तेज हुआ, तब कैलाश भी पर्वतारोहियों की रुचि का विषय बना।

अभियान दलों ने इसकी भौगोलिक संरचना, ढलानों और संभावित चढ़ाई मार्गों का अध्ययन करने की कोशिश की। लेकिन कैलाश का मामला सामान्य पर्वतारोहण अभियानों जैसा नहीं था।

1926 में ब्रिटिश पर्वतारोही Hugh Ruttledge ने कैलाश क्षेत्र का दौरा किया था। उनके अभियान के दौरान पर्वत की संभावित चढ़ाई के रास्तों का निरीक्षण किया गया।

इसी दौर में Colonel R. C. Wilson ने भी कैलाश की संरचना और संभावित आरोहण मार्गों को समझने का प्रयास किया।

लेकिन कठिन मौसम, बर्फ और स्थानीय परिस्थितियों के कारण कोई सफल और प्रमाणित शिखर आरोहण सामने नहीं आया।

इस प्रकार शुरुआती पर्वतारोहण इतिहास में कैलाश का नाम एक ऐसे पर्वत के रूप में दर्ज होने लगा, जिसके बारे में उत्सुकता तो थी, लेकिन जिसकी चोटी तक पहुंचने का रास्ता व्यावहारिक और स्वीकार्य दोनों स्तरों पर कठिन था।

1936 और Herbert Tichy का अभियान

1936 में ऑस्ट्रियाई पर्वतारोही Herbert Tichy कैलाश क्षेत्र में पहुंचे।

उनके अभियान के संदर्भ में कैलाश से जुड़ी धार्मिक और स्थानीय मान्यताओं की चर्चाएं भी सामने आती हैं। इनमें एक लोकप्रिय धारणा यह रही कि कैलाश की चोटी तक केवल वही व्यक्ति पहुंच सकता है जो पूरी तरह पवित्र और निष्पाप हो।

इस तरह की बातें धार्मिक विश्वास और लोककथाओं का हिस्सा हैं। इनके समर्थन में आधुनिक वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं।

फिर भी ऐसी कथाएं यह बताती हैं कि कैलाश को लेकर लोगों की सोच सामान्य पर्वतारोहण की सोच से कितनी अलग रही है।

किसी अन्य पर्वत की चोटी पर चढ़ने के लिए जहां तकनीक, रस्सियां, ऑक्सीजन, प्रशिक्षण और मौसम की जानकारी महत्वपूर्ण होती है, वहीं कैलाश के मामले में आध्यात्मिक और सांस्कृतिक प्रश्न भी उतने ही महत्वपूर्ण बन जाते हैं।

Reinhold Messner और कैलाश का अधूरा अध्याय

कैलाश के संदर्भ में विश्व प्रसिद्ध पर्वतारोही Reinhold Messner का नाम विशेष रूप से चर्चा में आता है।

Messner पर्वतारोहण के इतिहास के सबसे प्रसिद्ध नामों में शामिल हैं। वह दुनिया के सभी 14 आठ-हजारी पर्वतों पर चढ़ाई करने वाले पहले व्यक्ति के रूप में प्रसिद्ध हैं।

ऐसे पर्वतारोही का कैलाश से जुड़ना अपने आप में उल्लेखनीय घटना है।

विभिन्न पर्वतारोहण संबंधी विवरणों में उल्लेख मिलता है कि 1980 के दशक में Messner के सामने कैलाश पर चढ़ने की संभावना आई थी। लेकिन उन्होंने उस अवसर का इस्तेमाल कर शिखर पर पहुंचने का प्रयास नहीं किया।

यह फैसला कैलाश की कहानी को एक नया आयाम देता है।

क्योंकि यहां सवाल सिर्फ यह नहीं था कि पर्वत पर चढ़ना कितना कठिन है। सवाल यह भी था कि क्या एक पवित्र पर्वत की चोटी पर चढ़ना उचित है?

Messner बाद में कैलाश क्षेत्र में गए और पर्वत के आसपास की धार्मिक परिक्रमा से भी जुड़े।

उनका उदाहरण अक्सर इस बात के संदर्भ में दिया जाता है कि पर्वतारोहण की दुनिया में अत्यधिक सफल व्यक्ति भी किसी पर्वत को केवल एक खेल चुनौती के रूप में नहीं देखता।

2001 में कैलाश फिर बना अंतरराष्ट्रीय चर्चा का विषय

कैलाश के इतिहास में वर्ष 2001 भी महत्वपूर्ण माना जाता है।

उस समय खबरें सामने आईं कि एक स्पेनिश दल को कैलाश पर चढ़ाई की अनुमति मिलने वाली है। इस समाचार के सामने आते ही विभिन्न धार्मिक समुदायों में विरोध और चिंता व्यक्त की गई।

कैलाश को पवित्र मानने वाले लोगों के लिए यह विचार ही अस्वीकार्य था कि कोई पर्वतारोही वहां जाकर चोटी पर चढ़े।

बाद में चीनी अधिकारियों की ओर से कैलाश पर चढ़ाई की अनुमति दिए जाने संबंधी खबरों का खंडन किया गया। इसके साथ यह स्थिति स्पष्ट हुई कि कैलाश पर पर्वतारोहण की अनुमति नहीं है।

इसके बाद कैलाश की कहानी में एक महत्वपूर्ण तथ्य और मजबूत हुआ—यह पर्वत केवल इसलिए अछूता नहीं है कि अभी तक कोई सफल पर्वतारोही इसकी चोटी तक नहीं पहुंच सका, बल्कि यहां चढ़ाई की अनुमति भी नहीं है।

कैलाश पर जाना संभव, लेकिन शिखरारोहण नहीं

कैलाश को लेकर सबसे आम गलतफहमियों में एक यह है कि वहां इंसान जा ही नहीं सकता।

वास्तविकता इससे अलग है।

कैलाश क्षेत्र में तीर्थयात्री जाते हैं और पर्वत की परिक्रमा करते हैं। इस धार्मिक यात्रा को कोरा या परिक्रमा कहा जाता है।

यानी कैलाश का अनुभव चोटी तक पहुंचने से नहीं, बल्कि उसके चारों ओर घूमकर आध्यात्मिक यात्रा पूरी करने से जुड़ा है।

दुनिया के अन्य प्रसिद्ध पर्वतों पर जाने वाले पर्वतारोहियों का मुख्य उद्देश्य अक्सर शिखर तक पहुंचना होता है। कैलाश में इसका उलटा दिखाई देता है।

यहां पर्वत के चारों ओर चलना ही धार्मिक यात्रा का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

लगभग 52 किलोमीटर की कठिन परिक्रमा

कैलाश की परिक्रमा का मार्ग लगभग 52 किलोमीटर लंबा माना जाता है। हालांकि वास्तविक दूरी मार्ग और गणना की पद्धति के अनुसार अलग-अलग बताई जा सकती है।

इस यात्रा का सबसे कठिन और ऊंचा हिस्सा Drolma La दर्रा माना जाता है, जिसकी ऊंचाई लगभग 5,600 मीटर के आसपास है।

इतनी ऊंचाई पर चलना किसी भी व्यक्ति के लिए आसान नहीं है। हवा में ऑक्सीजन का स्तर कम होता है, तापमान तेजी से बदल सकता है और मौसम अचानक खराब हो सकता है।

आमतौर पर परिक्रमा पूरी करने में दो से तीन दिन लग सकते हैं। हालांकि यह अवधि व्यक्ति की शारीरिक क्षमता, मौसम, मार्ग की स्थिति और ऊंचाई के अनुकूल होने की क्षमता पर निर्भर करती है।

कई श्रद्धालु पूरी यात्रा पैदल करते हैं। कुछ लोग धार्मिक परंपरा के अनुसार बार-बार दंडवत या साष्टांग प्रणाम करते हुए आगे बढ़ते हैं।

उनके लिए यह यात्रा केवल शारीरिक दूरी तय करना नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक साधना होती है।

अलग-अलग परंपराओं में परिक्रमा की दिशा

कैलाश की धार्मिक परंपराएं भी अत्यंत विविध हैं।

हिंदू और बौद्ध तीर्थयात्री सामान्यतः पर्वत की परिक्रमा घड़ी की दिशा में करते हैं।

दूसरी ओर जैन और Bön परंपराओं में विपरीत दिशा में परिक्रमा करने की परंपरा का उल्लेख मिलता है।

इससे पता चलता है कि कैलाश एक ऐसी जगह है जहां विभिन्न धार्मिक परंपराएं अपने-अपने अनुष्ठानों और मान्यताओं के साथ मौजूद हैं।

दिशा अलग हो सकती है, धार्मिक व्याख्या अलग हो सकती है, लेकिन पर्वत के प्रति श्रद्धा का भाव इन परंपराओं को जोड़ता है।

क्या कैलाश दुनिया का सबसे कठिन पर्वत है?

सोशल मीडिया और लोकप्रिय लेखों में कई बार कैलाश को दुनिया का सबसे कठिन या सबसे रहस्यमय पर्वत कहा जाता है।

लेकिन पर्वतारोहण के तकनीकी मानकों पर इस तरह का दावा करना उचित नहीं होगा।

कैलाश की ऊंचाई लगभग 6,638 मीटर है, जबकि माउंट एवरेस्ट 8,848 मीटर से अधिक ऊंचा है। इसके अलावा दुनिया में कई ऐसे पर्वत हैं जिनकी तकनीकी चढ़ाई बेहद कठिन मानी जाती है।

किसी पर्वत की कठिनाई तय करने के लिए केवल ऊंचाई पर्याप्त नहीं होती। ढलान, चट्टान की संरचना, बर्फ, हिमस्खलन का खतरा, मौसम, मार्ग की तकनीकी कठिनाई और बचाव की संभावनाएं भी महत्वपूर्ण होती हैं।

इसलिए कैलाश को दुनिया का ‘सबसे कठिन पर्वत’ कहना तथ्यात्मक रूप से उचित नहीं है।

उसकी विशिष्टता किसी और जगह है।

कैलाश की असली कठिनाई क्या है?

कैलाश की अनोखी स्थिति को समझने के लिए तीन बातों को साथ देखना होगा।

पहली—इसका ऊंचाई वाला और कठोर पर्वतीय वातावरण।

दूसरी—इसका असाधारण धार्मिक महत्व।

तीसरी—इस पर पर्वतारोहण की वर्तमान मनाही।

इन तीनों के कारण कैलाश की कहानी अन्य पर्वतों से अलग हो जाती है।

अगर केवल तकनीकी चुनौती की बात होती तो आधुनिक पर्वतारोहण शायद किसी न किसी दिन इसकी चोटी तक पहुंचने की कोशिश करता। लेकिन यहां पर्वत की धार्मिक स्थिति भी महत्वपूर्ण है।

इसलिए कैलाश को ‘मानव क्षमता से परे पर्वत’ कहना उतना सटीक नहीं है, जितना यह कहना कि यह एक ऐसा पर्वत है जिसे मानव समाज ने धार्मिक और सांस्कृतिक कारणों से चढ़ाई के लिए खुला नहीं छोड़ा।

शिखर की जगह परिक्रमा ने ली

कैलाश की सबसे खूबसूरत विशेषताओं में से एक यही विरोधाभास है।

दुनिया के पर्वतारोहण इतिहास में सफलता का अर्थ अक्सर शिखर तक पहुंचना है। लेकिन कैलाश में धार्मिक सफलता का अर्थ शिखर तक पहुंचना नहीं, बल्कि परिक्रमा पूरी करना है।

यह अंतर कैलाश को केवल भौगोलिक स्थान नहीं रहने देता।

यह एक सांस्कृतिक अवधारणा बन जाता है।

हजारों वर्षों की आस्था ने पर्वत के साथ मनुष्य का रिश्ता ऐसा बनाया है जिसमें चोटी को छूना आवश्यक नहीं माना गया।

बल्कि कई श्रद्धालुओं के लिए पर्वत की चोटी को अछूता छोड़ना ही श्रद्धा का हिस्सा है।

मानसरोवर के साथ जुड़ा कैलाश का आकर्षण

कैलाश यात्रा का दूसरा प्रमुख आकर्षण मानसरोवर है।

मानसरोवर ऊंचाई पर स्थित एक विशाल और प्रसिद्ध झील है। इसके आसपास का प्राकृतिक वातावरण अत्यंत सुंदर और कठोर दोनों है।

बर्फीली चोटियों के बीच नीले पानी की झील, विस्तृत तिब्बती पठार और साफ आसमान इस पूरे क्षेत्र को असाधारण दृश्य प्रदान करते हैं।

धार्मिक यात्राओं में कैलाश और मानसरोवर को अक्सर एक ही तीर्थ अनुभव के हिस्से के रूप में देखा जाता है।

लेकिन इस क्षेत्र की यात्रा में प्राकृतिक कठिनाइयों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

ऊंचाई और मौसम के कारण यहां जाने वाले लोगों को शारीरिक तैयारी की आवश्यकता होती है।

ऊंचाई पर यात्रा अपने आप में चुनौती

कैलाश की परिक्रमा भले ही पर्वतारोहण अभियान नहीं है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि यह आसान यात्रा है।

लगभग 5,600 मीटर की ऊंचाई तक पहुंचने वाली परिक्रमा में कम ऑक्सीजन एक बड़ी चुनौती बन सकती है। ऊंचाई से संबंधित बीमारी का जोखिम भी रहता है।

ठंड, तेज हवाएं और अचानक बदलता मौसम भी कठिनाई बढ़ा सकते हैं।

इसलिए कैलाश यात्रा को केवल धार्मिक भावना के आधार पर नहीं, बल्कि एक उच्च ऊंचाई वाले पर्वतीय अभियान के रूप में भी गंभीरता से लेना आवश्यक है।

यात्रियों के लिए स्थानीय नियमों का पालन, पर्याप्त तैयारी और स्वास्थ्य संबंधी सावधानी महत्वपूर्ण होती है।

किंवदंतियां बहुत हैं, लेकिन तथ्य भी जरूरी

कैलाश को लेकर इंटरनेट पर तरह-तरह की कहानियां मिलती हैं। इनमें समय के असामान्य ढंग से बीतने से लेकर पर्वत की कथित अलौकिक शक्तियों तक कई दावे किए जाते हैं।

इनमें से अनेक दावों का वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है।

कैलाश की वास्तविकता को समझने के लिए मिथकों और प्रमाणित तथ्यों के बीच अंतर करना जरूरी है।

यह सच है कि कैलाश असाधारण रूप से महत्वपूर्ण धार्मिक पर्वत है। यह भी तथ्य है कि इसके शिखर पर कोई विश्वसनीय रूप से प्रमाणित सफल आरोहण दर्ज नहीं है और वर्तमान में वहां चढ़ाई की अनुमति नहीं है।

लेकिन इससे आगे की हर असाधारण कहानी को वैज्ञानिक सत्य मान लेना उचित नहीं होगा।

कैलाश की वास्तविक कहानी स्वयं इतनी महत्वपूर्ण है कि उसे रहस्यमय दावों की जरूरत नहीं।

इंसान ने चोटी से ज्यादा सम्मान को महत्व दिया

मानव इतिहास में पर्वतारोहण का एक बड़ा उद्देश्य रहा है—प्रकृति की ऊंचाइयों को छूना।

लेकिन कैलाश हमें पर्वत और मनुष्य के संबंध का दूसरा रूप दिखाता है।

यहां मनुष्य ने यह स्वीकार किया है कि हर चोटी को जीतना आवश्यक नहीं।

किसी पर्वत का सम्मान उसके शिखर तक पहुंचने में नहीं, बल्कि कभी-कभी उसे उसी रूप में छोड़ देने में भी हो सकता है।

कैलाश के संदर्भ में यही विचार सबसे अधिक महत्वपूर्ण बन जाता है।

यह पर्वत किसी प्रतियोगिता का हिस्सा नहीं है। यहां पहला पर्वतारोही बनने की दौड़ नहीं है। यहां शिखर पर झंडा फहराने की परंपरा नहीं है।

इसके बजाय यहां सदियों से चलती आ रही परिक्रमा, प्रार्थना और आध्यात्मिक आस्था है।

दुनिया के पर्वतों में कैलाश की अलग पहचान

एवरेस्ट की कहानी ऊंचाई की कहानी है।

के-2 की कहानी तकनीकी चुनौती की कहानी है।

अन्नपूर्णा की कहानी जोखिम और पर्वतारोहण के इतिहास की कहानी है।

लेकिन कैलाश की कहानी आस्था, संस्कृति और स्वैच्छिक सीमा की कहानी है।

यही कारण है कि पर्वतारोहण के मानचित्र पर कैलाश का स्थान भले ही दुनिया की सबसे ऊंची चोटियों के बीच न हो, लेकिन सांस्कृतिक मानचित्र पर इसका महत्व अत्यंत व्यापक है।

यह एक ऐसा पर्वत है जिसके बारे में दुनिया भर में लोग जानते हैं, भले ही वे कभी वहां न गए हों।

क्या भविष्य में कैलाश पर चढ़ाई होगी?

वर्तमान स्थिति में कैलाश पर पर्वतारोहण की अनुमति नहीं है। इसलिए भविष्य में वहां किसी आधिकारिक पर्वतारोहण अभियान की अनुमति मिलेगी या नहीं, इसका निश्चित उत्तर देना संभव नहीं है।

यह विषय संबंधित प्रशासनिक नीतियों, पर्यावरणीय परिस्थितियों और सबसे महत्वपूर्ण रूप से धार्मिक एवं सांस्कृतिक संवेदनशीलता से जुड़ा है।

जब तक स्थिति नहीं बदलती, कैलाश की चोटी मानव आरोहण से दूर ही रहेगी।

और शायद यही इसकी सबसे विशिष्ट पहचान भी बनी रहेगी।

एक ऐसी चोटी जिसकी महानता ‘जीतने’ में नहीं

दुनिया के सबसे ऊंचे पहाड़ों की तस्वीरों में अक्सर पर्वतारोहियों को शिखर पर खड़ा देखा जाता है। उनके हाथों में झंडे होते हैं और पीछे बर्फ से ढकी चोटियां।

कैलाश की कल्पना इससे बिल्कुल अलग है।

यहां तस्वीर का केंद्र अक्सर चोटी पर खड़ा इंसान नहीं, बल्कि स्वयं कैलाश होता है।

लोग नीचे से उसकी ओर देखते हैं। उसके चारों ओर चलते हैं। प्रार्थना करते हैं। अपने धार्मिक विश्वासों के अनुसार उसे नमन करते हैं।

यही दृश्य बताता है कि मनुष्य और प्रकृति के बीच संबंध केवल विजय का नहीं हो सकता।

कभी-कभी दूरी बनाए रखना भी सम्मान का एक रूप होता है।

आज भी कायम है कैलाश का रहस्य

कैलाश की चोटी पर किसी सफल मानव आरोहण का प्रमाणित रिकॉर्ड नहीं है। अतीत में पर्वतारोहियों ने इसके संभावित मार्गों का अध्ययन किया। कुछ अभियानों ने इसकी भौगोलिक संरचना को समझने की कोशिश की। Reinhold Messner जैसे विश्व प्रसिद्ध पर्वतारोही का नाम भी इसके संदर्भ में सामने आया।

लेकिन चोटी तक पहुंचने की कहानी कभी पूरी नहीं हुई।

आज पर्वतारोहण की आधुनिक तकनीक पहले से कहीं अधिक विकसित है। इंसान ऐसे क्षेत्रों में पहुंच चुका है जहां कुछ दशक पहले जाना असंभव समझा जाता था।

फिर भी कैलाश की चोटी अब भी अछूती है।

इसका कारण केवल प्राकृतिक चुनौती नहीं, बल्कि धार्मिक आस्था और प्रशासनिक प्रतिबंध भी हैं।

कैलाश: जहां शिखर से बड़ी है श्रद्धा

कैलाश की कहानी को अगर केवल ‘एक अनारोही चोटी’ के रूप में देखा जाए तो शायद उसके साथ न्याय नहीं होगा।

यह तिब्बत की धरती पर खड़ा एक भौगोलिक शिखर है, लेकिन साथ ही करोड़ों लोगों की धार्मिक भावनाओं का केंद्र भी है। यह एशिया के महत्वपूर्ण नदी-उद्गम क्षेत्रों के निकट स्थित एक प्राकृतिक संरचना है, लेकिन इसके चारों ओर हजारों वर्षों की आध्यात्मिक परंपराएं भी जीवित हैं।

यहां पर्वतारोहण की संभावना से ज्यादा महत्वपूर्ण है परिक्रमा।

यहां चोटी तक पहुंचने से ज्यादा महत्वपूर्ण है श्रद्धा के साथ उसके चारों ओर चलना।

यहां ‘पहला कौन?’ का सवाल उतना महत्वपूर्ण नहीं, जितना ‘इस पवित्र स्थान का सम्मान कैसे किया जाए?’ का सवाल।

शायद यही कैलाश की सबसे बड़ी विशेषता है।

मानव सभ्यता ने पृथ्वी की अनेक ऊंचाइयों को नाप लिया। वैज्ञानिकों ने पर्वतों की ऊंचाई मापी, पर्वतारोहियों ने उनके मार्ग खोजे और अभियानों ने असंभव समझे जाने वाले शिखरों को भी छुआ।

लेकिन कैलाश आज भी एक अलग कहानी कहता है।

उसकी बर्फीली चोटी आज भी तिब्बत के विशाल आकाश के नीचे खड़ी है। उसके चारों ओर तीर्थयात्रियों की परिक्रमा जारी है। मानसरोवर का शांत जल उसकी प्राकृतिक भव्यता को और बढ़ाता है। दूर-दूर से आने वाले श्रद्धालु उसके दर्शन करते हैं और अपने-अपने धार्मिक विश्वास के अनुसार उसकी परिक्रमा पूरी करते हैं।

मानव ने अनेक पर्वतों को ‘जीत’ लिया, लेकिन कैलाश को लेकर उसने एक अलग रास्ता चुना—चोटी को छूने के बजाय उसे सम्मान देने का रास्ता।

यही कारण है कि कैलाश केवल एक पर्वत नहीं है।

यह भूगोल और धर्म, प्रकृति और संस्कृति, साहस और संयम, जिज्ञासा और श्रद्धा—इन सभी के बीच एक अनोखा सेतु है।

और शायद इसी वजह से, दुनिया की तमाम विजित चोटियों के बीच দাঁড়িয়ে कैलाश आज भी अपनी सबसे बड़ी पहचान बनाए हुए है—

एक ऐसी पवित्र चोटी, जिसकी ऊंचाई केवल मीटरों में नहीं मापी जाती; जिसकी असली ऊंचाई मानव आस्था और सम्मान में दिखाई देती है।

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UPSC Success Story:पहली ही कोशिश में UPSC क्रैक!!! मुर्शिदाबाद की बेटी साना आज़मी ने पूरा किया किसान पिता का सपना!!!

UPSC Success Story :अक्सर कहा जाता है कि सपने देखने के लिए संसाधनों की नहीं, बल्कि बुलंद हौसलों की जरूरत होती है। इस बात को पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद जिले की रहने वाली साना आज़मी ने पूरी तरह सच साबित कर दिया है। ग्रामीण परिवेश की चुनौतियों और आर्थिक तंगी को मात देते हुए साना ने पहले ही प्रयास में संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) की सिविल सेवा परीक्षा में सफलता हासिल कर इतिहास रच दिया है।

एक साधारण किसान परिवार से ताल्लुक

साना आज़मी मुर्शिदाबाद जिले के सागरदिघी इलाके के पाकलपारा गांव की रहने वाली हैं। वह अपने दस भाई-बहनों में सबसे छोटी हैं। उनके पिता माइजुद्दीन शेख एक साधारण किसान हैं, जो गरीबी के कारण खुद केवल नौवीं कक्षा तक ही पढ़ाई कर पाए थे। परिवार की आर्थिक स्थिति इतनी कमजोर थी कि उन्हें कम उम्र में ही खेती-किसानी संभालनी पड़ी।

इसके बावजूद, पिता ने ठान लिया था कि वे अपनी सात बेटियों समेत सभी बच्चों को उच्च शिक्षा दिलाएंगे। उन्होंने अपनी इच्छाओं को दबाकर बच्चों की पढ़ाई के लिए कड़ा संघर्ष किया। पिता के इसी संघर्ष और अটল संकल्प ने साना को कभी हार न मानने की प्रेरणा दी।

शिक्षा और शानदार शैक्षणिक सफर

साना की शुरुआती पढ़ाई उनके गांव के ही स्कूल से हुई। इसके बाद उन्होंने सागरदिघी के ‘अल-अमीन मिशन’ से अपनी माध्यमिक और उच्च माध्यमिक (12वीं) की शिक्षा पूरी की। बचपन से ही मेधावी रहीं साना ने उच्च माध्यमिक परीक्षा में पूरे मुर्शिदाबाद जिले में पहला स्थान हासिल कर अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया था।

स्कूली शिक्षा पूरी करने के बाद, वह आगे की पढ़ाई के लिए दिल्ली चली गईं। उन्होंने जामिया मिल्लिया इस्लामिया विश्वविद्यालय से अंग्रेजी विषय में स्नातक (Graduation) की डिग्री प्राप्त की। दिल्ली में रहने के दौरान ही उन्होंने UPSC परीक्षा की तैयारी की शुरुआत कर दी थी।

पहली बार में ही UPSC में सफलता

साल 2025 की UPSC सिविल सेवा परीक्षा में साना ने पहली बार हिस्सा लिया और अपने पहले ही प्रयास में सफलता का परचम लहरा दिया। उन्होंने अखिल भारतीय स्तर पर 764वीं रैंक (AIR 764) हासिल की है। इस शानदार सफलता के साथ वह इंडियन रेवेन्यू सर्विस (IRS) सहित अन्य ‘ग्रुप-A’ पदों के लिए योग्य हो गई हैं।

हालांकि, साना की मंजिल यहीं खत्म नहीं होती है। उनका अंतिम लक्ष्य आईएएस (IAS) अधिकारी बनना है और इसके लिए उन्होंने अभी से अपनी तैयारी फिर से शुरू कर दी है।

संघर्ष से सफलता की प्रेरणा

साना आज़मी की यह कहानी सिर्फ एक परीक्षा पास करने की नहीं है, बल्कि यह एक किसान पिता के अधूरे सपनों, बेटी के अटूट विश्वास और उस हर युवा के लिए एक मिसाल है जो विपरीत परिस्थितियों में भी अपनी मेहनत के दम पर आसमान छूना चाहता है।

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​”मेहनत और ईमानदारी की सुंदर परिणति”: भावुक हुईं यामी

​पुरस्कार प्राप्त करने के बाद यामी गौतम ने सोशल मीडिया पर एक बेहद भावुक संदेश साझा करते हुए अपनी भावनाएं व्यक्त कीं। उन्होंने लिखा:  

​“हर यात्रा में एक ऐसा पल आता है जो आपको यह याद दिलाता है कि आपने कभी हार क्यों नहीं मानी थी। आज मेरे लिए ठीक वही दिन है। ‘आर्टिकल 370’ के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार पाना एक ऐसा सम्मान है, जिसे मैं जीवन की अंतिम सांस तक संभालकर रखूंगी।”

 

​अपने डेढ़ दशक के लंबे संघर्ष को याद करते हुए अभिनेत्री ने आगे कहा:

​”बीते 14 वर्षों से मैंने केवल अपनी कला के प्रति ईमानदार रहने की कोशिश की है और हमेशा चाहा कि मेरा काम ही मेरी पहचान बने। यह सम्मान उम्मीद, धैर्य, दृढ़ता और सिनेमा के प्रति अटूट प्रेम का परिणाम है। यह एक ऐसा सपना था जिसे मैं वर्षों से दिल में संजोए हुए थी। ‘आर्टिकल 370’ सिर्फ एक फिल्म नहीं थी, यह एक ऐसी कहानी थी जिस पर मुझे अटूट विश्वास था। हमारे अपने होम प्रोडक्शन की फिल्म होने के कारण यह जीत मेरे लिए और भी अधिक व्यक्तिगत और भावुक बन जाती है।”

​गैलरी से पति की तालियाँ और ‘ट्रिपल धमाका’

​जब यामी देश का सर्वोच्च सम्मान स्वीकार कर रही थीं, तब दर्शक दीर्घा में बैठे उनके पति, फिल्म निर्माता व निर्देशक आदित्य धर, गर्व से भरी आँखों के साथ तालियाँ बजाते दिखाई दिए। खुशी का यह अवसर तब और बड़ा हो गया जब आदित्य सुहास जांभले द्वारा निर्देशित और आदित्य धर के बैनर B62 स्टूडियोज व जियो स्टूडियोज के संयुक्त निर्माण में बनी फिल्म ‘आर्टिकल 370’ को 72वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों में ‘सर्वश्रेष्ठ फीचर फिल्म’ (Best Feature Film) घोषित किया गया।

​इसके अलावा, फिल्म के संगीत निर्देशक शाश्वत सचदेव को ‘सर्वश्रेष्ठ संगीत निर्देशन (गीत)’ के पुरस्कार से नवाजा गया। इस तरह इस राजनीतिक थ्रिलर ने कुल तीन श्रेणियों में जीत हासिल कर शानदार प्रदर्शन किया।

​संघर्ष के दिनों से सफलता के शिखर तक

​वर्ष 2012 में ‘विक्की डोनर’ से बॉलीवुड में अपनी शुरुआत करने वाली यामी गौतम ने पिछले डेढ़ दशक में ‘काबिल’, ‘उरी: द सर्जिकल स्ट्राइक’, ‘बाला’, ‘दसवीं’ और ‘ओएमजी 2’ जैसी विविधतापूर्ण फिल्मों में अभिनय कर खुद को एक बेहतरीन अभिनेत्री के रूप में स्थापित किया है। हालाँकि, ‘आर्टिकल 370’ में ज़ूनी हाकसार के किरदार के लिए उनका शारीरिक बदलाव, एक्शन दृश्य और गंभीर अभिनय उनके करियर का सबसे सशक्त पड़ाव साबित हुआ।

​मायानगरी मुंबई में एक आउटसाइडर के तौर पर कदम रखकर अपनी कड़ी मेहनत से इस मुकाम को हासिल करने के बाद, यामी ने युवा और नए कलाकारों को प्रेरित करते हुए कहा: “आप नहीं जानते कि जिंदगी आपके लिए आगे क्या मोड़ लेकर आने वाली है। बस पूरी निष्ठा से मेहनत करते रहिए और अच्छा काम करते रहिए—एक न एक दिन ऐसा शुभ अवसर आपके जीवन में भी जरूर आएगा।”

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Ekdunia digital hospital: डिजिटल अन्नपूर्णा दिवस 2026 पर स्वास्थ्य सेवा में एक स्वर्णिम शुरुआत!!!

Ekdunia digital hospital :आज का युग तकनीक और डिजिटल नवाचार का युग है। जिस प्रकार हर क्षेत्र में तकनीक ने आम जनजीवन को सुगम बनाया है, उसी प्रकार स्वास्थ्य सेवाओं में भी डिजिटल क्रांति अब एक अनिवार्यता बन चुकी है। इसी विजन को आगे बढ़ाते हुए, 17 सितंबर 2026 (गुरुवार) को देश के यशस्वी प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिवस और डिजिटल अन्नपूर्णा दिवस के ऐतिहासिक अवसर पर एक अभूतपूर्व पहल की शुरुआत की गई। पश्चिम बंगाल के बोलपुर स्थित शांति निकेतन मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल में ‘एक दुनिया डिजिटल अस्पताल’ (Ek Dunia Digital Hospital) का भव्य शुभारंभ किया गया।

यह पहल केवल एक अस्पताल की शुरुआत नहीं है, बल्कि यह ग्रामीण और दूरदराज के क्षेत्रों में रहने वाले अंतिम व्यक्ति तक बेहतर, सुलभ और किफायती स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाने का एक क्रांतिकारी कदम है।

 

आयोजन और संकल्प: अंत्योदय की भावना को साकार करना

यह गरिमामयी पहल इतिवाचक वार्ता फाउंडेशन (Itibachak Barta Foundation) द्वारा आयोजित की गई थी। कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य देश के ग्रामीण व वंचित समुदायों को आधुनिक चिकित्सा तकनीक से जोड़ना है।

अंत्योदय का विजन: पंडित दीनदयाल उपाध्याय के ‘अंत्योदय’ यानी समाज के सबसे अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति तक विकास का लाभ पहुंचाने के सपने को यह डिजिटल स्वास्थ्य सेवा मजबूती देती है।

समुदाय केंद्रित दृष्टिकोण: इस पहल का मुख्य केंद्र-बिंदु यह सुनिश्चित करना है कि गुणवत्तापूर्ण चिकित्सा सेवाएं केवल महानगरों या बड़े शहरों तक सीमित न रहें, बल्कि बोलपुर जैसे ग्रामीण अंचलों के लोग भी इसका सीधा लाभ उठा सकें।

सहयोग और समर्पण: इस आयोजन में कई प्रतिष्ठित डॉक्टरों, स्वास्थ्य विशेषज्ञों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और स्थानीय प्रशासनिक अधिकारियों ने भाग लिया, जो इस महान कार्य के प्रति उनकी प्रतिबद्धता को दर्शाता है।

‘एक दुनिया डिजिटल अस्पताल’ की मुख्य विशेषताएं

यह डिजिटल अस्पताल पारंपरिक चिकित्सा प्रणालियों से हटकर आधुनिक तकनीक का उपयोग करता है, जिससे मरीजों को कम समय और कम खर्च में बेहतरीन इलाज मिल सके। इसकी प्रमुख विशेषताएं निम्नलिखित हैं:

टेलीमेडिसिन और विशेषज्ञ परामर्श: ग्रामीण इलाकों के मरीज अब घर बैठे ही देश और दुनिया के बड़े चिकित्सा विशेषज्ञों से ऑनलाइन परामर्श ले सकेंगे। इससे मरीजों को दूर-दूर यात्रा करने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी।

किफायती और सुलभ स्वास्थ्य सेवाएं: आधुनिक चिकित्सा कई बार आम आदमी की पहुंच से बाहर हो जाती है, लेकिन इस डिजिटल पहल का उद्देश्य स्वास्थ्य सेवाओं को बेहद किफायती बनाना है।

डिजिटल स्वास्थ्य रिकॉर्ड (Digital Health Records): मरीजों का पूरा मेडिकल डेटा डिजिटल रूप से सुरक्षित रखा जाएगा, जिससे भविष्य में इलाज के दौरान पुरानी रिपोर्टों को ढूंढने की समस्या खत्म हो जाएगी और डॉक्टर सटीक निदान कर सकेंगे।

त्वरित निदान और दवा प्रबंधन: डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से जांच रिपोर्ट तेजी से उपलब्ध होंगी और सही समय पर सही दवा की जानकारी मिल सकेगी।

डिजिटल अन्नपूर्णा दिवस का महत्व

17 सितंबर को ‘डिजिटल अन्नपूर्णा दिवस’ के रूप में मनाना यह संदेश देता है कि जिस प्रकार अन्न (भोजन) जीवन के लिए आवश्यक है, उसी प्रकार स्वास्थ्य और पोषण भी जीवन का आधार हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिन के अवसर पर इस प्रकार की कल्याणकारी योजनाओं का शुभारंभ करना इस बात का प्रतीक है कि राष्ट्र निर्माण का मार्ग जनसेवा और जनकल्याण से होकर गुजरता है।

डिजिटल अन्नपूर्णा दिवस स्वास्थ्य सुरक्षा और खाद्य सुरक्षा दोनों के तालमेल का एक अनूठा संगम है, जो देश के नागरिकों को सशक्त और आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में एक मील का पत्थर साबित हो रहा है।

ग्रामीण भारत और स्वास्थ्य सेवाओं की चुनौतियां

भारत की एक बहुत बड़ी आबादी आज भी ग्रामीण क्षेत्रों में निवास करती है। हालांकि स्वास्थ्य के क्षेत्र में पिछले कुछ वर्षों में अभूतपूर्व सुधार हुए हैं, फिर भी आज कई ग्रामीण इलाकों में निम्नलिखित चुनौतियां बनी हुई हैं:

विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी: ग्रामीण अस्पतालों में अक्सर सुपर-स्पेशलिस्ट डॉक्टरों का अभाव होता है।

यातायात की समस्या: गंभीर बीमारी की स्थिति में मरीजों को मीलों दूर शहर के बड़े अस्पतालों में ले जाना पड़ता है, जिसमें समय और धन दोनों की बर्बादी होती है।

जागरूकता का अभाव: कई बार समय पर सही सलाह न मिलने के कारण छोटी बीमारियां भी गंभीर रूप ले लेती हैं।

‘एक दुनिया डिजिटल अस्पताल’ जैसी पहल इन सभी चुनौतियों का एक प्रभावी और आधुनिक समाधान प्रस्तुत करती है। डिजिटल माध्यम से अब गांव का हर व्यक्ति दुनिया के बेहतरीन डॉक्टरों की सलाह पा सकता है।

भविष्य की दिशा और प्रभाव

यह पहल आने वाले समय में भारतीय स्वास्थ्य सेवा के परिदृश्य को पूरी तरह से बदलने की क्षमता रखती है।

स्वास्थ्य समानता: इसके माध्यम से शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों के बीच स्वास्थ्य सेवाओं में जो खाई है, उसे पाटने में मदद मिलेगी।

निवारक स्वास्थ्य सेवा (Preventive Healthcare): डिजिटल माध्यमों से लोगों को स्वास्थ्य के प्रति जागरूक करना और समय-समय पर उनकी जांच करना आसान हो जाएगा।

युवाओं और तकनीक का मिलन: यह पहल देश के तकनीकी विशेषज्ञों और चिकित्सा क्षेत्र के पेशेवरों को एक मंच पर लाकर नए नवाचारों को जन्म दे रही है।

निष्कर्ष

‘एक दुनिया डिजिटल अस्पताल’ का शुभारंभ महज़ एक शुरुआत नहीं, बल्कि एक नए युग का शंखनाद है। शांति निकेतन मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल में आयोजित इस कार्यक्रम ने यह सिद्ध कर दिया है कि यदि सही दिशा में, सही नीयत और आधुनिक तकनीक के साथ प्रयास किए जाएं, तो समाज के सबसे निचले तबके तक भी खुशहाली और बेहतर स्वास्थ्य पहुंचाया जा सकता है।

इतिवाचक वार्ता फाउंडेशन के इस सराहनीय प्रयास ने डिजिटल इंडिया के सपने को स्वास्थ्य क्षेत्र में चरितार्थ किया है। यह पहल आने वाले दिनों में देश के अन्य हिस्सों के लिए भी एक मिसाल बनेगी और एक स्वस्थ, सशक्त एवं डिजिटल भारत के निर्माण में अपना बहुमूल्य योगदान देगी।

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Ekdunia digital hospital:शांतिनिकेतन में प्रधानमंत्री मोदी के जन्मदिन पर ‘एकदुनिया डिजिटल अस्पताल’ की शुरुआत, ग्रामीण स्वास्थ्य सेवा को मिलेगा नया आयाम!!!

Ekdunia digital hospital :”देश सबसे पहले है। देश की उन्नति, एकजुटता और एकता सर्वोपरि है। विकास का लाभ समाज के अंतिम छोर पर खड़े व्यक्ति तक पहुँचना चाहिए।” प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिन के अवसर पर शांतिनिकेतन मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल में आयोजित एक विशेष समारोह में भाजपा मेडिकल सेल के पूर्व राष्ट्रीय सह-संयोजक और भारत सरकार के आयुष मंत्रालय के पूर्व सदस्य डॉ. दिनेश उपाध्याय ने यह प्रेरक संदेश दिया।

गुरुवार को ‘सकारात्मक संदेश फाउंडेशन’ की पहल पर शांतिनिकेतन मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल के सभागार में जन-कल्याणकारी स्वास्थ्य पहल ‘एकदुनिया डिजिटल अस्पताल’ की शुरुआत की गई। इस डिजिटल तकनीक आधारित पहल का मुख्य उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों के लोगों तक स्वास्थ्य सेवाओं को और अधिक सुलभ, सरल और मानवीय रूप से पहुँचाना है।

प्रमुख हस्तियों की गरिमामयी उपस्थिति

इस कार्यक्रम का शुभारंभ दीप प्रज्वलन के साथ डॉ. दिनेश उपाध्याय ने किया। इस अवसर पर राज्य के पूर्व डीएचएस (DHS) तथा अस्पताल के सलाहकार डॉ. अजय चक्रवर्ती, निदेशक प्रोफेसर डॉ. अशोक कुमार दत्त, प्रिंसिपल प्रोफेसर डॉ. प्रबीर सेनगुप्ता, एमएसवीपी (MSVP) प्रोफेसर डॉ. प्रदीप कुमार बनर्जी, सीईओ डॉ. हिमाद्री आरी सहित कई प्रतिष्ठित चिकित्सक और गणमान्य लोग उपस्थित रहे।

स्वास्थ्य सेवा को तकनीक से जोड़ने पर जोर

डॉ. अशोक कुमार दत्त ने कहा कि स्वास्थ्य सेवाएँ केवल बड़े अस्पतालों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। तकनीक की मदद से दूर-दराज के इलाकों तक चिकित्सीय परामर्श और स्वास्थ्य संबंधी सहायता पहुँचाना जरूरी है।

डॉ. अजय चक्रवर्ती ने अपने विचार रखते हुए कहा कि चिकित्सा को केवल चार दीवारों के भीतर तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि तकनीक के जरिए इसे लोगों के अपने गाँवों तक पहुँचना चाहिए।

डॉ. दिनेश उपाध्याय ने अपने उद्घाटन भाषण में कहा कि देश का वास्तविक विकास तभी संभव है जब समाज के अंतिम व्यक्ति तक उसका लाभ पहुँचे। उन्होंने ‘अंत्योदय’ की भावना को विकास का वास्तविक आधार बताया।

क्या है ‘एकदुनिया डिजिटल अस्पताल’ की विशेषता?

इस डिजिटल पहल के माध्यम से निम्नलिखित सेवाओं पर विशेष जोर दिया गया है:

डिजिटल चिकित्सा सहायता और स्वास्थ्य संबंधी सही जानकारी।

अस्पतालों और डॉक्टरों के साथ सीधा संपर्क स्थापित करना।

जाँच-पड़ताल और दवाइयों से जुड़ी सहायता।

आपातकालीन परिस्थितियों में तुरंत आवश्यक दिशा-निर्देश प्रदान करना।

कार्यक्रम के अंत में प्रधानमंत्री के जन्मदिन को जनसेवा से जोड़ते हुए डॉ. उपाध्याय ने कहा कि किसी व्यक्ति का जन्मदिन तभी सार्थक होता है जब वह दिन दूसरों के जीवन में उम्मीद की एक नई किरण लेकर आए। उन्होंने देशप्रेम, एकता और मानवीय मूल्यों के साथ समाज के हर वर्ग के उत्थान के लिए आगे आने का आह्वान किया।

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Marua plant: मच्छਰ भगाने और सेहत का एक अचूक प्राकृतिक उपाय!!!

Marua plan:गर्मी और बरसात के मौसम में मच्छरों का प्रकोप बहुत अधिक बढ़ जाता है, जिससे शहर हो या गाँव, हर कोई परेशान रहता है। खासकर बच्चे जब खेलने जाते हैं, तो वे मच्छरों का सबसे ज्यादा शिकार होते हैं। मच्छरों से राहत पाने के लिए लोग अक्सर कॉइल या धुआँ करने वाली अन्य चीजों का इस्तेमाल करते हैं, जो न केवल मच्छरों के लिए बल्कि इंसानी स्वास्थ्य (विशेषकर फेफड़ों) के लिए भी काफी हानिकारक होती हैं।

अगर आप भी मच्छरों की इस समस्या से तंग आ चुके हैं, तो इसके लिए एक बेहद आसान और घरेलू उपाय मौजूद है। आपको इसके लिए ज्यादा मेहनत करने की जरूरत नहीं है, बस घर में एक खास पौधा लगाना है जो मच्छरों को कोसों दूर रखेगा। आइए इस चमत्कारी पौधे के बारे में विस्तार से जानते हैं।

मरुआ पौधा (Marjoram Plant) क्या है?

यह विशेष पौधा, जिसे मरुआ के नाम से जाना जाता है, देश के कई हिस्सों में बन तुलसी और बाबरी के नाम से भी प्रसिद्ध है। तुलसी परिवार का यह अनूठा पौधा एक प्राकृतिक मॉस्किटो रिपेलेंट के रूप में काम करता है, क्योंकि मच्छर इसकी तेज गंध को बिल्कुल बर्दाश्त नहीं कर पाते हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि इस पौधे से पुदीने जैसी महक आती है, जो मच्छरों और अन्य कीड़ों-मकोड़ों को घर से दूर भगाने में बहुत असरदार है। यदि आप इसे अपने आंगन, बालकनी या रसोई के पास लगाते हैं, तो घर में मच्छरों का आना काफी हद तक कम हो जाएगा।

सेहत के लिए मरुआ पौधे के बेजोड़ फायदे

मच्छर भगाने के अलावा, यह पौधा औषधीय गुणों से भरपूर है और बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक के लिए बेहद फायदेमंद है:

सर्दी-खांसी से राहत: मरुआ के पौधे में प्रचुर मात्रा में एंटीऑक्सीडेंट और पोषक तत्व पाए जाते हैं, जो बच्चों को बार-बार होने वाली सर्दी-खांसी और जुकाम से राहत दिलाते हैं।

पेट के कीड़ों का नाश: छोटे बच्चों को अक्सर पेट में कीड़े (কৃমি) होने की समस्या रहती है। ऐसे में इस पौधे की पत्तियों का रस बहुत लाभकारी होता है।

मुँह की दुर्गंध और मसूड़ों की समस्या: इसकी पत्तियाँ चबाने से मुँह की दुर्गंध दूर होती है और मसूड़ों से जुड़ी परेशानियां कम होती हैं।

माइग्रेन में आराम: मरुआ की पत्तियों का रस या इन्हें चबाने से माइग्रेन के दर्द में भी काफी आराम मिलता है।

भोजन में इस्तेमाल: इस पौधे की पत्तियों का उपयोग चाय, सलाद और स्वादिष्ट चटनी बनाने में भी किया जाता है, जो स्वास्थ्य के लिए अच्छी होती हैं।

निष्कर्ष

खतरनाक केमिकल्स वाले कॉइल या स्प्रे का इस्तेमाल करने के बजाय अपने घर में मरुआ का पौधा लगाना एक बुद्धिमानी भरा कदम है। यह प्राकृतिक रूप से आपके घर को मच्छरों से सुरक्षित रखता है और इसके औषधीय गुण पूरे परिवार के स्वास्थ्य को बेहतर बनाते हैं। तो देर किस बात की, आज ही अपने घर में मरुआ का पौधा लगाएं और रासायनिक धुएँ से अपने परिवार को बचाएं।

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भारत रत्न मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया की जयंती पर मनाया गया ‘राष्ट्रीय अभियंता दिवस’निर्माण, नवाचार और राष्ट्र-विकास के प्रतीक महान अभियंता को देश ने किया नमन

भारत के विकास की कहानी केवल बड़े शहरों, ऊंची इमारतों, चौड़ी सड़कों और आधुनिक तकनीक की कहानी नहीं है। इसके पीछे उन हजारों-लाखों अभियंताओं की मेहनत, कल्पना, तकनीकी दक्षता और समस्याओं को समाधान में बदलने की क्षमता छिपी है, जिन्होंने देश के विकास की नींव मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इन्हीं अभियंताओं के योगदान को सम्मान देने और भारत के महान अभियंता भारत रत्न मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया की स्मृति को नमन करने के लिए हर वर्ष 15 सितंबर को राष्ट्रीय अभियंता दिवस मनाया जाता है।

15 सितंबर का दिन भारतीय इंजीनियरिंग जगत के लिए केवल एक स्मृति दिवस नहीं, बल्कि तकनीकी शिक्षा, वैज्ञानिक सोच, नवाचार और राष्ट्र निर्माण के संकल्प को दोहराने का अवसर है। इस दिन देश भर में अभियंताओं, इंजीनियरिंग विद्यार्थियों, तकनीकी शिक्षण संस्थानों और औद्योगिक क्षेत्र से जुड़े लोगों द्वारा विभिन्न कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। सेमिनार, तकनीकी प्रदर्शनियां, परियोजना प्रस्तुतियां, कार्यशालाएं, प्रतियोगिताएं और जागरूकता कार्यक्रमों के माध्यम से इंजीनियरिंग की भूमिका को समाज के सामने रखा जाता है।

राष्ट्रीय अभियंता दिवस उस व्यक्तित्व की जयंती पर मनाया जाता है, जिसने अपने जीवन को तकनीकी उत्कृष्टता और सार्वजनिक हित से जोड़ दिया था। मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया, जिन्हें देशभर में सम्मानपूर्वक एम. विश्वेश्वरैया के नाम से जाना जाता है, भारतीय इंजीनियरिंग इतिहास के उन महान व्यक्तित्वों में शामिल हैं जिनका योगदान आज भी प्रेरणा देता है।

इंजीनियरिंग को राष्ट्र निर्माण से जोड़ने वाले महान व्यक्तित्व

मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया का जन्म 15 सितंबर 1861 को तत्कालीन मैसूर राज्य के क्षेत्र में हुआ था। साधारण परिस्थितियों से आगे बढ़ते हुए उन्होंने शिक्षा के माध्यम से अपने लिए एक विशिष्ट पहचान बनाई। उनकी प्रतिभा, अनुशासन, मेहनत और तकनीकी दृष्टि ने उन्हें भारतीय इंजीनियरिंग जगत में अलग स्थान दिलाया।

उन्होंने इंजीनियरिंग को केवल नौकरी या पेशे के रूप में नहीं देखा। उनके लिए इंजीनियरिंग ऐसी शक्ति थी, जिसके माध्यम से समाज की वास्तविक समस्याओं का समाधान किया जा सकता था। जल प्रबंधन, सिंचाई, बाढ़ नियंत्रण, बांध निर्माण और सार्वजनिक अवसंरचना जैसे क्षेत्रों में उनकी सोच अपने समय से काफी आगे थी।

विश्वेश्वरैया की कार्यशैली में वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ-साथ प्रशासनिक दक्षता भी दिखाई देती थी। वे योजनाओं को केवल कागज पर तैयार करने के बजाय उनके व्यावहारिक प्रभाव पर जोर देते थे। यही कारण है कि उनका नाम भारत के विकासवादी इंजीनियरिंग इतिहास में विशेष सम्मान के साथ लिया जाता है।

जल प्रबंधन में छोड़ी अमिट छाप

भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में जल संसाधनों का प्रबंधन हमेशा से एक महत्वपूर्ण चुनौती रहा है। कहीं बाढ़ की समस्या रही है, तो कहीं सूखे और सिंचाई की कमी ने किसानों के सामने संकट पैदा किया। विश्वेश्वरैया ने जल संसाधनों के वैज्ञानिक उपयोग और प्रबंधन पर विशेष ध्यान दिया।

उन्होंने जल संरक्षण, सिंचाई व्यवस्था और बाढ़ नियंत्रण से संबंधित अनेक परियोजनाओं में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनकी इंजीनियरिंग सोच का एक महत्वपूर्ण हिस्सा यह था कि प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग योजनाबद्ध तरीके से किया जाए और उनका लाभ अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचे।

उनकी तकनीकी उपलब्धियों में स्वचालित जल-द्वारों से संबंधित कार्य को विशेष रूप से याद किया जाता है। जलाशयों के जलस्तर को नियंत्रित करने की उनकी तकनीकी सोच ने उस समय इंजीनियरिंग के क्षेत्र में नई संभावनाएं प्रस्तुत की थीं।

कृष्णराज सागर परियोजना और विकास की नई सोच

मैसूर क्षेत्र के विकास में कृष्णराज सागर बांध का विशेष महत्व रहा है। इस परियोजना के विकास और उससे जुड़े इंजीनियरिंग कार्यों में विश्वेश्वरैया की महत्वपूर्ण भूमिका रही। यह परियोजना सिंचाई, पेयजल और क्षेत्रीय विकास के लिए लंबे समय तक महत्वपूर्ण रही।

उस दौर में किसी बड़े जलाशय और बांध की योजना बनाना आज की तुलना में कहीं अधिक चुनौतीपूर्ण था। सीमित तकनीकी संसाधनों के बावजूद इंजीनियरों को भौगोलिक परिस्थितियों, जल प्रवाह, निर्माण सामग्री और भविष्य की जरूरतों को ध्यान में रखकर योजनाएं तैयार करनी पड़ती थीं।

विश्वेश्वरैया की सोच इसी व्यापक दृष्टिकोण पर आधारित थी। उनका मानना था कि किसी भी इंजीनियरिंग परियोजना का मूल्य केवल उसके निर्माण में नहीं, बल्कि उससे समाज को मिलने वाले दीर्घकालीन लाभ में निहित होता है।

आधुनिक भारत के विकास की सोच

विश्वेश्वरैया केवल संरचनाओं के निर्माण तक सीमित नहीं थे। वे भारत के औद्योगिक और आर्थिक विकास को लेकर भी गंभीर विचार रखते थे। उनका मानना था कि यदि भारत को आधुनिक और आत्मनिर्भर बनना है तो शिक्षा, उद्योग, तकनीक और उत्पादन क्षमता को मजबूत करना होगा।

उनके विचारों में अनुशासन, दक्षता, समय का सदुपयोग और गुणवत्तापूर्ण कार्य को विशेष महत्व प्राप्त था। वे चाहते थे कि भारत केवल संसाधनों का उपभोक्ता न बने, बल्कि विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में अपनी क्षमता विकसित करे।

आज जब भारत आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, रोबोटिक्स, सेमीकंडक्टर, अंतरिक्ष विज्ञान, हरित ऊर्जा, इलेक्ट्रिक मोबिलिटी और डिजिटल तकनीक जैसे क्षेत्रों में तेजी से आगे बढ़ रहा है, तब विश्वेश्वरैया की आत्मनिर्भर तकनीकी विकास की सोच और भी प्रासंगिक दिखाई देती है।

‘राष्ट्रीय अभियंता दिवस’ का महत्व

राष्ट्रीय अभियंता दिवस मनाने का उद्देश्य केवल महान अभियंता की जयंती मनाना नहीं है। इसका व्यापक उद्देश्य समाज में इंजीनियरिंग और तकनीकी शिक्षा के महत्व को समझाना भी है।

आज हमारे आसपास दिखाई देने वाली लगभग हर आधुनिक सुविधा के पीछे इंजीनियरिंग की भूमिका है। बिजली की आपूर्ति से लेकर मोबाइल नेटवर्क तक, रेलवे से लेकर मेट्रो तक, अस्पतालों की मशीनों से लेकर अंतरिक्ष अभियानों तक और खेती की आधुनिक तकनीक से लेकर स्मार्ट शहरों तक—हर क्षेत्र में अभियंताओं का योगदान मौजूद है।

इंजीनियर किसी समस्या को केवल समस्या के रूप में नहीं देखते। वे उसके कारणों को समझते हैं, आंकड़ों का विश्लेषण करते हैं, संभावित समाधान तैयार करते हैं और उपलब्ध संसाधनों के भीतर बेहतर व्यवस्था विकसित करने का प्रयास करते हैं।

इसी समस्या-समाधान की क्षमता को राष्ट्रीय विकास से जोड़ना आज के अभियंता दिवस का महत्वपूर्ण संदेश है।

तकनीकी शिक्षा और युवाओं की बढ़ती भूमिका

भारत की युवा आबादी देश की सबसे बड़ी शक्तियों में से एक है। तकनीकी शिक्षा प्राप्त करने वाले विद्यार्थी आने वाले वर्षों में देश के औद्योगिक, वैज्ञानिक और डिजिटल विकास को नई दिशा दे सकते हैं।

इंजीनियरिंग की पढ़ाई अब केवल पारंपरिक शाखाओं तक सीमित नहीं रही। कंप्यूटर इंजीनियरिंग, इलेक्ट्रॉनिक्स, मैकेनिकल, सिविल, इलेक्ट्रिकल, एयरोस्पेस, बायोटेक्नोलॉजी, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, डेटा साइंस, रोबोटिक्स और नवीकरणीय ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में युवाओं के लिए नए अवसर लगातार विकसित हो रहे हैं।

इसके साथ ही तकनीकी एवं व्यावसायिक शिक्षा का महत्व भी बढ़ रहा है। उद्योगों को ऐसे कुशल युवाओं की आवश्यकता है जो मशीनों को समझ सकें, आधुनिक उपकरणों का संचालन कर सकें, तकनीकी समस्याओं का समाधान कर सकें और बदलती औद्योगिक जरूरतों के अनुसार खुद को विकसित कर सकें।

इंजीनियरिंग का बदलता स्वरूप

इक्कीसवीं सदी की इंजीनियरिंग पारंपरिक इंजीनियरिंग से काफी अलग है। आज एक इंजीनियर के सामने केवल डिजाइन या निर्माण की चुनौती नहीं होती, बल्कि उसे पर्यावरण, ऊर्जा दक्षता, साइबर सुरक्षा, डेटा संरक्षण, लागत, स्थिरता और सामाजिक प्रभाव जैसे अनेक पहलुओं पर विचार करना पड़ता है।

जलवायु परिवर्तन ने भी इंजीनियरिंग की प्राथमिकताओं को बदल दिया है। अब ऐसी तकनीक की आवश्यकता है जो विकास के साथ पर्यावरण की रक्षा भी कर सके। सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, ऊर्जा-कुशल भवन, इलेक्ट्रिक वाहन, जल पुनर्चक्रण और स्मार्ट जल प्रबंधन जैसी तकनीकें भविष्य की इंजीनियरिंग का महत्वपूर्ण हिस्सा बन रही हैं।

विश्वेश्वरैया के समय में संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग और सार्वजनिक हित पर जोर दिया जाता था। आज वही सोच आधुनिक तकनीक और पर्यावरणीय जिम्मेदारी के साथ आगे बढ़ाने की आवश्यकता है।

गांवों और ग्रामीण भारत के विकास में अभियंताओं की भूमिका

इंजीनियरिंग का प्रभाव केवल महानगरों तक सीमित नहीं रहना चाहिए। भारत के वास्तविक और समावेशी विकास के लिए ग्रामीण क्षेत्रों तक तकनीकी सुविधाओं की पहुंच बेहद जरूरी है।

ग्रामीण सड़कों, सिंचाई व्यवस्था, पेयजल आपूर्ति, ग्रामीण विद्युतीकरण, कृषि मशीनरी, छोटे उद्योगों, डिजिटल कनेक्टिविटी और स्थानीय स्तर पर रोजगार सृजन में तकनीकी विशेषज्ञों की महत्वपूर्ण भूमिका है।

किसी गांव में जल निकासी की बेहतर व्यवस्था हो, खेतों तक सिंचाई का पानी पहुंचे, सौर ऊर्जा से बिजली उपलब्ध हो या किसानों को कम लागत वाली मशीनरी मिले—इन सभी क्षेत्रों में इंजीनियरिंग समाधान महत्वपूर्ण योगदान दे सकते हैं।

यही कारण है कि आज के अभियंता दिवस पर युवाओं के सामने यह प्रश्न भी रखा जाना चाहिए कि वे अपनी तकनीकी क्षमता का उपयोग समाज के अंतिम व्यक्ति तक कैसे पहुंचा सकते हैं।

महिला अभियंताओं की बढ़ती भागीदारी

भारतीय इंजीनियरिंग क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी लगातार महत्वपूर्ण होती जा रही है। सिविल, इलेक्ट्रिकल, कंप्यूटर, इलेक्ट्रॉनिक्स, एयरोस्पेस, अनुसंधान और अन्य तकनीकी क्षेत्रों में महिलाएं अपनी प्रतिभा का परिचय दे रही हैं।

तकनीकी शिक्षा में लैंगिक समानता केवल रोजगार के अवसरों का विषय नहीं है, बल्कि यह नवाचार की विविधता से भी जुड़ा है। अलग-अलग अनुभव और दृष्टिकोण जब किसी तकनीकी समस्या के समाधान में शामिल होते हैं तो नए और अधिक प्रभावी विचार सामने आ सकते हैं।

राष्ट्रीय अभियंता दिवस ऐसे सभी युवा विद्यार्थियों को प्रेरित करने का अवसर है जो तकनीकी क्षेत्र में अपना भविष्य बनाना चाहते हैं।

डिजिटल क्रांति और नए इंजीनियरिंग अवसर

भारत में डिजिटल तकनीक के विस्तार ने इंजीनियरिंग के स्वरूप को व्यापक बना दिया है। स्मार्टफोन, क्लाउड कंप्यूटिंग, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, इंटरनेट ऑफ थिंग्स, साइबर सुरक्षा और ऑटोमेशन जैसे क्षेत्रों ने तकनीकी विशेषज्ञों की मांग बढ़ाई है।

आज एक इंजीनियर केवल मशीन या भवन का डिजाइन तैयार नहीं करता। वह डिजिटल सिस्टम विकसित कर सकता है, बड़े डेटा का विश्लेषण कर सकता है, स्वचालित मशीनों को नियंत्रित कर सकता है और जटिल प्रक्रियाओं को अधिक कुशल बनाने के लिए सॉफ्टवेयर तथा हार्डवेयर दोनों का उपयोग कर सकता है।

आने वाले समय में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और रोबोटिक्स का प्रभाव और बढ़ने की संभावना है। ऐसे में तकनीकी विद्यार्थियों के लिए लगातार सीखते रहना आवश्यक होगा।

कौशल विकास और तकनीकी प्रशिक्षण की आवश्यकता

आज उद्योग तेजी से बदल रहा है। नई मशीनें, नई उत्पादन प्रणालियां और नई डिजिटल तकनीकें लगातार सामने आ रही हैं। ऐसे वातावरण में केवल डिग्री प्राप्त करना पर्याप्त नहीं है। व्यावहारिक कौशल और लगातार सीखने की क्षमता भी उतनी ही जरूरी है।

तकनीकी संस्थानों में विद्यार्थियों को प्रयोगशाला आधारित प्रशिक्षण, परियोजना कार्य, औद्योगिक प्रशिक्षण और समस्या-समाधान आधारित शिक्षा से जोड़ना आवश्यक है।

औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थान और अन्य व्यावसायिक प्रशिक्षण केंद्र इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। यहां विद्यार्थी विभिन्न ट्रेडों में व्यावहारिक ज्ञान प्राप्त कर अपने लिए रोजगार और स्वरोजगार के रास्ते खोल सकते हैं।

स्टार्टअप और नवाचार की नई दुनिया

भारत में स्टार्टअप संस्कृति ने इंजीनियरिंग युवाओं के लिए एक नया अवसर पैदा किया है। पहले तकनीकी शिक्षा प्राप्त करने के बाद नौकरी को ही प्रमुख विकल्प माना जाता था। अब अनेक युवा अपनी तकनीकी क्षमता के आधार पर स्वयं के उत्पाद और सेवाएं विकसित कर रहे हैं।

कृषि तकनीक, स्वास्थ्य तकनीक, शिक्षा तकनीक, स्वच्छ ऊर्जा, परिवहन, जल प्रबंधन और डिजिटल सेवाओं जैसे क्षेत्रों में तकनीकी नवाचार की व्यापक संभावनाएं हैं।

विश्वेश्वरैया की कार्यशैली से भी यही संदेश मिलता है कि ज्ञान तभी सार्थक है जब उसका उपयोग वास्तविक समस्याओं को हल करने के लिए किया जाए।

इंजीनियरिंग में नैतिक जिम्मेदारी

तकनीकी क्षमता के साथ नैतिक जिम्मेदारी भी जरूरी है। किसी पुल की डिजाइन में छोटी-सी गलती, किसी विद्युत प्रणाली की लापरवाही या किसी औद्योगिक प्रक्रिया में सुरक्षा की अनदेखी गंभीर परिणाम पैदा कर सकती है।

इसलिए एक अच्छे इंजीनियर की पहचान केवल उसकी तकनीकी जानकारी से नहीं होती। उसकी पहचान उसके अनुशासन, ईमानदारी, जिम्मेदारी और सार्वजनिक सुरक्षा के प्रति संवेदनशीलता से भी होती है।

विश्वेश्वरैया के जीवन से मेहनत और पेशेवर अनुशासन का जो संदेश मिलता है, वह आज के तकनीकी विद्यार्थियों के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है।

पर्यावरण और टिकाऊ विकास

विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन आज पूरी दुनिया के सामने एक बड़ी चुनौती है। इंजीनियरिंग इस चुनौती का समाधान खोजने में केंद्रीय भूमिका निभा सकती है।

ऐसे भवन बनाए जा सकते हैं जो कम ऊर्जा का उपयोग करें। ऐसी मशीनें विकसित की जा सकती हैं जो कम ईंधन में अधिक उत्पादन दें। जल शोधन और पुनर्चक्रण की तकनीकों को बेहतर बनाया जा सकता है। अक्षय ऊर्जा के उपयोग को बढ़ाया जा सकता है।

भविष्य का इंजीनियर केवल यह नहीं पूछेगा कि कोई परियोजना कितनी जल्दी और कितनी कम लागत में तैयार हो सकती है। वह यह भी पूछेगा कि उसका पर्यावरण पर प्रभाव क्या होगा और आने वाली पीढ़ियों के लिए उसके परिणाम कैसे होंगे।

आपदा प्रबंधन में इंजीनियरों की भूमिका

बाढ़, भूकंप, चक्रवात, भूस्खलन और अन्य प्राकृतिक आपदाओं से निपटने में भी इंजीनियरिंग का योगदान महत्वपूर्ण है।

भूकंपरोधी भवन, मजबूत पुल, बेहतर जल निकासी व्यवस्था, बाढ़ नियंत्रण प्रणाली और आपदा पूर्व चेतावनी तकनीकें लोगों की सुरक्षा में मदद करती हैं।

जल प्रबंधन के क्षेत्र में विश्वेश्वरैया के योगदान को देखते हुए यह बात विशेष रूप से महत्वपूर्ण है कि आधुनिक इंजीनियर जलवायु और प्राकृतिक आपदाओं से उत्पन्न चुनौतियों के लिए अधिक सुरक्षित और टिकाऊ समाधान विकसित करें।

‘भारत रत्न’ से सम्मानित महान अभियंता

मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया को उनके असाधारण योगदान के लिए भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मानों में शामिल भारत रत्न से सम्मानित किया गया। यह सम्मान उनके तकनीकी योगदान, राष्ट्र सेवा और विकास की दूरदर्शी सोच के प्रति देश की श्रद्धा को दर्शाता है।

उनका जीवन इस बात का उदाहरण है कि तकनीकी ज्ञान और सार्वजनिक सेवा का संयोजन किसी व्यक्ति को इतिहास में स्थायी स्थान दिला सकता है।

उनकी उपलब्धियां आज भी इंजीनियरिंग के विद्यार्थियों और पेशेवरों को प्रेरित करती हैं।

आज के भारत में विश्वेश्वरैया की प्रासंगिकता

आज भारत एक ऐसे दौर से गुजर रहा है जहां तकनीक विकास की लगभग हर दिशा को प्रभावित कर रही है। अंतरिक्ष मिशन, डिजिटल अर्थव्यवस्था, रेलवे आधुनिकीकरण, सड़क एवं बंदरगाह निर्माण, अक्षय ऊर्जा, इलेक्ट्रिक वाहन, रक्षा तकनीक और स्मार्ट विनिर्माण—हर क्षेत्र में इंजीनियरों की आवश्यकता है।

ऐसे समय में विश्वेश्वरैया की सोच पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हो जाती है। उन्होंने जिस भारत की कल्पना की थी, उसमें शिक्षा, उद्योग, तकनीकी दक्षता और आत्मनिर्भरता को महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त था।

आज के युवा इंजीनियर यदि इस सोच को आधुनिक तकनीक के साथ जोड़ सकें तो भारत के विकास को नई गति मिल सकती है।

सिर्फ नौकरी नहीं, समाधान का माध्यम बने इंजीनियर

राष्ट्रीय अभियंता दिवस का सबसे महत्वपूर्ण संदेश शायद यही है कि इंजीनियरिंग को केवल रोजगार के माध्यम के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। यह समाज की समस्याओं को समझने और उनके समाधान तैयार करने की जिम्मेदारी भी है।

किसी गांव में स्वच्छ जल उपलब्ध कराना, किसानों की लागत कम करना, ऊर्जा की बचत करना, प्रदूषण कम करना, सुरक्षित परिवहन विकसित करना या किसी छोटे उद्योग को अधिक कुशल बनाना—ये सभी इंजीनियरिंग की सामाजिक भूमिका के उदाहरण हैं।

जब तकनीकी ज्ञान सामाजिक जरूरतों से जुड़ता है, तभी उसका वास्तविक प्रभाव दिखाई देता है।

विद्यार्थियों के लिए प्रेरणा का दिन

राष्ट्रीय अभियंता दिवस विशेष रूप से इंजीनियरिंग और तकनीकी शिक्षा प्राप्त कर रहे विद्यार्थियों के लिए प्रेरणा का अवसर है। यह दिन उन्हें याद दिलाता है कि उनकी पढ़ाई केवल परीक्षा और डिग्री तक सीमित नहीं है।

हर तकनीकी विद्यार्थी के भीतर किसी समस्या का समाधान खोजने की क्षमता होती है। आवश्यकता है जिज्ञासा बनाए रखने की, प्रयोग करने की, असफलताओं से सीखने की और लगातार अपने ज्ञान को अपडेट करने की।

विश्वेश्वरैया का जीवन बताता है कि बड़ी उपलब्धियां केवल प्रतिभा से नहीं मिलतीं। इसके लिए अनुशासन, परिश्रम, धैर्य और उद्देश्य के प्रति समर्पण भी जरूरी है।

राष्ट्र निर्माण में तकनीकी संस्थानों की जिम्मेदारी

देश में तकनीकी शिक्षा का विस्तार होने के साथ शिक्षण संस्थानों की जिम्मेदारी भी बढ़ी है। संस्थानों को विद्यार्थियों को केवल पाठ्यक्रम आधारित ज्ञान देने के बजाय वास्तविक जीवन की समस्याओं से जोड़ना होगा।

स्थानीय स्तर की समस्याओं पर परियोजनाएं तैयार की जा सकती हैं। जल संरक्षण, ऊर्जा बचत, स्वच्छता, कृषि, ग्रामीण परिवहन और छोटे उद्योगों से संबंधित तकनीकी समाधान विकसित किए जा सकते हैं।

इस तरह शिक्षा और समाज के बीच मजबूत संबंध स्थापित किया जा सकता है।

भविष्य की इंजीनियरिंग कैसी होगी?

भविष्य की इंजीनियरिंग अधिक बहु-विषयक होगी। एक ही परियोजना में इलेक्ट्रॉनिक्स, सॉफ्टवेयर, मैकेनिकल डिजाइन, डेटा विश्लेषण और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसी कई तकनीकों का एक साथ उपयोग हो सकता है।

स्वचालित वाहन, स्मार्ट फैक्टरी, रोबोटिक सिस्टम, अंतरिक्ष तकनीक, हरित ऊर्जा और डिजिटल स्वास्थ्य जैसी व्यवस्थाएं इंजीनियरिंग के नए आयाम खोल रही हैं।

लेकिन तकनीक चाहे जितनी बदल जाए, एक अच्छे इंजीनियर की मूल जिम्मेदारी नहीं बदलेगी—समस्या को समझना, सुरक्षित और प्रभावी समाधान खोजना तथा समाज के हित को प्राथमिकता देना।

विश्वेश्वरैया का संदेश आज भी जीवित

मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया का जीवन भारतीय इंजीनियरिंग के इतिहास में एक ऐसे अध्याय के रूप में दर्ज है, जिसमें तकनीकी ज्ञान, अनुशासन, राष्ट्रभक्ति और विकास की सोच एक साथ दिखाई देती है।

उनकी जयंती पर राष्ट्रीय अभियंता दिवस मनाना केवल परंपरा नहीं, बल्कि उनके आदर्शों को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का माध्यम है।

आज जब भारत दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में अपनी जगह मजबूत करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है, तब तकनीकी मानव संसाधन की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो गई है। देश को ऐसे इंजीनियरों की आवश्यकता है जो केवल तकनीक के जानकार न हों, बल्कि समाज और पर्यावरण के प्रति भी जिम्मेदार हों।

निष्कर्ष : तकनीक से आत्मनिर्भर भारत की ओर

राष्ट्रीय अभियंता दिवस हमें यह याद दिलाता है कि किसी भी आधुनिक राष्ट्र की प्रगति उसके वैज्ञानिक और तकनीकी आधार पर निर्भर करती है। सड़कें, पुल, बांध, बिजली संयंत्र, संचार नेटवर्क, अस्पताल, कारखाने, अंतरिक्ष यान और डिजिटल प्लेटफॉर्म—इन सभी के पीछे अभियंताओं की कल्पना और मेहनत होती है।

भारत रत्न मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया ने अपने जीवन और कार्यों से यह साबित किया कि इंजीनियरिंग केवल तकनीकी गणनाओं और निर्माण योजनाओं का विषय नहीं है। यह मानव जीवन को बेहतर बनाने और राष्ट्र की क्षमता को मजबूत करने का माध्यम भी है।

15 सितंबर को जब देश राष्ट्रीय अभियंता दिवस मनाता है, तब यह अवसर हर इंजीनियर और तकनीकी विद्यार्थी के लिए आत्ममंथन का भी है—क्या हमारी तकनीकी क्षमता समाज की वास्तविक जरूरतों को पूरा कर रही है? क्या हमारा नवाचार आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित और टिकाऊ भविष्य बना रहा है? और क्या हम अपने ज्ञान का उपयोग राष्ट्र निर्माण के लिए कर रहे हैं?

इन सवालों के जवाब ही राष्ट्रीय अभियंता दिवस की वास्तविक भावना को सार्थक करेंगे।

महान अभियंता विश्वेश्वरैया की जयंती पर देश के सभी अभियंताओं, तकनीकी विशेषज्ञों, शोधकर्ताओं, नवोन्मेषकों और तकनीकी शिक्षा प्राप्त कर रहे विद्यार्थियों को यही संदेश मिलता है कि ज्ञान को कौशल में, कौशल को नवाचार में और नवाचार को राष्ट्र निर्माण में बदलना ही सच्ची इंजीनियरिंग है।

आज का भारत तकनीक के नए युग की ओर बढ़ रहा है। इस यात्रा में इंजीनियरों की भूमिका केवल मशीनें और संरचनाएं तैयार करने तक सीमित नहीं होगी, बल्कि वे आने वाले भारत की दिशा और स्वरूप को भी प्रभावित करेंगे। इसलिए राष्ट्रीय अभियंता दिवस वास्तव में उन सभी मस्तिष्कों और हाथों का सम्मान है, जो कल्पना को वास्तविकता में बदलने का साहस रखते हैं।

भारत रत्न मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया को उनकी जयंती पर शत-शत नमन और देश के सभी अभियंताओं को राष्ट्रीय अभियंता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं।

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Earth Science Olympiad:दुरापुर के सौमिक ने इंटरनेशनल अर्थ साइंस ओलंपियाड में गाड़े झंडे, जीते दो स्वर्ण और एक रजत पदक!!!

Earth Science Olympiad:इटली के ट्यूरिन शहर में आयोजित 19वें इंटरनेशनल अर्थ साइंस ओलंपियाड में भारतीय दल ने शानदार प्रदर्शन करते हुए कुल नौ पदक अपने नाम किए। इस प्रतिष्ठित प्रतियोगिता में भारत ने सर्वाधिक पदक जीतकर वैश्विक स्तर पर शीर्ष स्थान हासिल किया। भारतीय दल की इस ऐतिहासिक सफलता में पश्चिम बंगाल के दुर्गापुर के रहने वाले मेधावी छात्र सौमिक मंडल ने सबसे चमकता हुआ सितारा बनकर उभरे, जिन्होंने अकेले दो स्वर्ण और एक रजत पदक जीतकर देश का नाम रोशन किया।

ट्यूरिन यूनिवर्सिटी साइंस कैंपस में 20 से 27 अगस्त के बीच आयोजित इस ओलंपियाड में दुनिया भर के 39 देशों के प्रतिभाशाली छात्र-छात्राओं ने हिस्सा लिया था। प्रतियोगिता के दौरान लिखित और प्रायोगिक (प्रैक्टिकल) परीक्षा में उत्कृष्ट प्रदर्शन करते हुए सौमिक ने तीसरा स्थान हासिल किया और अपना पहला स्वर्ण पदक जीता। इसके बाद इंटरनेशनल टीम फील्ड इन्वेस्टिगेशन में बेहतरीन प्रदर्शन करते हुए उन्होंने दूसरा स्वर्ण पदक हासिल किया। वहीं, अर्थ साइंस प्रोजेक्ट में उल्लेखनीय कार्य के लिए उन्हें रजत पदक से सम्मानित किया गया।

इस वैश्विक मंच तक का सफर आसान नहीं था। जियोलॉजिकल सोसाइटी ऑफ इंडिया की देखरेख में देश भर के 500 केंद्रों पर कड़ी परीक्षाएं आयोजित की जाती हैं, जिसमें माध्यमिक और उच्च माध्यमिक स्तर के छात्र भाग लेते हैं। इस साल इस प्रारंभिक परीक्षा में लगभग 17,800 विद्यार्थियों ने हिस्सा लिया था। इनमें से चुने गए शीर्ष 25 छात्रों को गुजरात के वडोदरा स्थित एमएस यूनिवर्सिटी में तीन सप्ताह के कड़े प्रशिक्षण के लिए भेजा गया। इसके बाद चेन्नई में सात दिन का विशेष प्रशिक्षण शिविर आयोजित हुआ, जिसके बाद भारतीय दल ने ट्यूरिन के लिए उड़ान भरी। ओलंपियाड के दौरान छात्रों की प्रतिभा का आकलन भू-भौतिकी, मौसम विज्ञान, समुद्र विज्ञान और पर्यावरण विज्ञान जैसे जटिल विषयों पर लिखित, प्रैक्टिकल, फील्ड इन्वेस्टिगेशन और प्रोजेक्ट्स के माध्यम से किया गया।

दुर्गापुर स्टील टाउनशिप के ए-जोन निवासी सौमिक वर्तमान में बारहवीं कक्षा के छात्र हैं। उनके पिता कौशिक मंडल एक निजी कंपनी में कार्यरत हैं और माता मौसुमी मंडल गृहणी हैं। बेटे की इस अपूर्व सफलता पर गर्व महसूस करते हुए उनकी मां ने कहा कि प्रतियोगिता बेहद कठिन थी और उन्होंने कभी सोचा नहीं था कि सौमिक इतनी बड़ी सफलता हासिल करेगा। अपनी इस उपलब्धि के बाद सौमिक ने भविष्य की योजना साझा करते हुए बताया कि वह आगे चलकर आईआईटी से जियो-केमिस्ट्री (भू-रसायन विज्ञान) की पढ़ाई करना चाहते हैं और इसी क्षेत्र में अपना शोध कार्य आगे बढ़ाना चाहते हैं।

इस शानदार प्रदर्शन के बाद केंद्रीय भूविज्ञान और प्रौद्योगिकी राज्य मंत्री जितेंद्र सिंह राणा ने नई दिल्ली स्थित पृथ्वी भवन में भारतीय दल के सभी प्रतिनिधियों से मुलाकात की और उनका गर्मजोशी से स्वागत कर उन्हें सम्मानित किया। सौमिक की यह सफलता न केवल उनके परिवार और दुर्गापुर शहर के लिए, बल्कि पूरे देश के लिए गर्व का विषय है।

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IPF world championship: जब 21 साल की भारतीय पावरलिफ्टर किया कुनाल बनर्जी ने दक्षिण अफ्रीका के सन सिटी में आयोजित अंतरराष्ट्रीय पावरलिफ्टिंग प्रतियोगिता में 140 किलो का बारबेल जमीन से उठाया, तो हर कोई दंग रह गया। मात्र 45.70 किलोग्राम वजन वाली किया ने अपने शरीर के वजन से लगभग 3.06 गुना ज्यादा भार उठाकर अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत का नाम रोशन किया। इस शानदार प्रदर्शन के बल पर उन्होंने डेडलिफ्ट में रजत पदक (Silver Medal) अपने नाम किया।

प्रतियोगिता और किया का प्रदर्शन

किया ने यह उपलब्धि जूनियर महिला 47 किग्रा वर्ग में हासिल की। इस प्रतियोगिता में उनके तीनों मुख्य लिफ्ट का स्कोर इस प्रकार रहा:

स्कवॉट (Squat): 90 किलो

बेंच प्रेस (Bench Press): 50 किलो

डेडलिफ्ट (Deadlift): 140 किलो

कुल लिफ्ट: 280 किलो

ओवरऑल रैंकिंग में किया पांचवें स्थान पर रहीं, लेकिन डेडलिफ्ट वर्ग में 140 किलो का भार उठाकर उन्होंने दूसरा स्थान और रजत पदक हासिल किया। इस वर्ग में फ्रांस की इनेस एरबो ने 165 किलो उठाकर स्वर्ण पदक जीता। वहीं आयरलैंड की ब्लाथनेड ओ’डायर्ह ने भी 140 किलो उठाया, लेकिन प्रतियोगिता के नियमों और तकनीकी मानकों के आधार पर किया को दूसरा स्थान मिला।

एक साल की कड़ी मेहनत का नतीजा

किया की यह सफलता किसी चमत्कार का परिणाम नहीं, बल्कि उनकी निरंतर मेहनत का फल है। साल 2025 में 47 किग्रा श्रेणी में उनका प्रदर्शन इस प्रकार था:

वर्ग / लिफ्ट वर्ष 2025 (राष्ट्रीय) वर्ष 2026 (अंतरराष्ट्रीय) सुधार

शरीर का वजन 44.60 किग्रा 45.70 किग्रा +1.10 किग्रा

स्कवॉट 82.50 किग्रा 90.00 किग्रा +7.50 किग्रा

बेंच प्रेस 47.50 किग्रा 50.00 किग्रा +2.50 किग्रा

डेडलिफ्ट 127.50 किग्रा 140.00 किग्रा +12.50 किग्रा

कुल लिफ्ट 257.50 किग्रा 280.00 किग्रा +22.50 किग्रा

एक साल के भीतर डेडलिफ्ट में 12.50 किग्रा और कुल लिफ्ट क्षमता में उल्लेखनीय सुधार यह साबित करता है कि किया ने अपनी ताकत और तकनीक पर कितना काम किया है।

45.70 किलो वजन और 140 किलो की लिफ्ट—इन दोनों के बीच का 94.30 किलो का अंतर किया कुनाल बनर्जी के समर्पण, अनुशासन और कभी न हार मानने वाले जज्बे को बयां करता है।

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National Teachers Award 2026: ₹60 दिहाड़ी से राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार तक!!! जानिए दिल्ली की ‘मदर टीचर’ सुमन गोयल की प्रेरक कहानी!!!

National Teachers Award 2026:कहावत है कि धैर्य, निष्ठा और कड़े परिश्रम का फल हमेशा मीठा होता है। दिल्ली के सर्वोदय कन्या विद्यालय (GSKV) पूठ कलां की प्राथमिक शिक्षिका सुमन गोयल की कहानी इस बात का जीवंत प्रमाण है। कभी अपनी कॉलेज फीस भरने के लिए मात्र ₹60 प्रतिदिन पर पढ़ाने वाली सुमन को राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार 2026 (National Teachers Award 2026) के लिए चुना गया है।

5 सितंबर 2026 को शिक्षक दिवस के अवसर पर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू नई दिल्ली स्थित विज्ञान भवन में उन्हें इस सर्वोच्च सम्मान से सम्मानित करेंगी।

गांव की मिट्टी से दिल्ली तक का संघर्षपूर्ण सफर

सुमन गोयल मूल रूप से हरियाणा के जींद जिले के जुलाना गांव की रहने वाली हैं। बचपन में उनका सपना डॉक्टर बनने का था, लेकिन पारिवारिक और आर्थिक संकटों के कारण 10वीं के बाद उनके परिवार को दिल्ली स्थानांतरित होना पड़ा।

वर्ष 2002 में उन्होंने दिल्ली के पूठ कलां स्थित स्कूल से 12वीं की परीक्षा में टॉप किया। इसके बाद उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय के लक्ष्मीबाई कॉलेज में दाखिला लिया। कॉलेज की पढ़ाई का खर्च और फीस निकालना एक बड़ी चुनौती थी, इसलिए उन्होंने उसी स्कूल का रुख किया जहां से उन्होंने पढ़ाई की थी।

2004 का दौर: उन्होंने उसी स्कूल में पढ़ाना शुरू किया, जहाँ उन्हें प्रति माह लगभग ₹1,200 से ₹1,300 (यानी ₹60 प्रति दिन) मिलते थे।

2009 में सरकारी नौकरी: अध्यापकों के मार्गदर्शन में उन्होंने प्रतियोगी परीक्षा उत्तीर्ण की और सरकारी शिक्षिका बनीं।

2013 में वापसी: वर्ष 2013 में वे एक स्थायी प्राथमिक शिक्षिका के रूप में फिर से उसी GSKV पूठ कलां स्कूल लौटीं।

‘मदर टीचर’ की अनूठी पहचान और मानवीय पहल

सुमन खुद को केवल एक अध्यापिका नहीं, बल्कि बच्चों की ‘मदर टीचर’ मानती हैं। पूठ कलां, कृष्ण विहार और मांगे राम पार्क जैसे इलाकों से आने वाले अधिकतर बच्चे अपने परिवार की पहली पीढ़ी (First-generation learners) हैं जो स्कूल तक पहुंचे हैं।

सुमन गोयल की प्रमुख शिक्षण तकनीकें एवं योगदान

निपुण मैथ्स किट (NIPUN Maths Kit): बुनियादी गणितीय समझ को सहज और आनंददायक बनाने के लिए इस विशेष किट का निर्माण किया।

समावेशी शिक्षा (Inclusive Education): विशेष आवश्यकता वाले (CWSN) और दिव्यांग बच्चों को कक्षा में सामान्य बच्चों के साथ पीयर-ग्रुप के माध्यम से घुलने-मिलने में मदद की।

अकादमिक से परे सहयोग: जरूरतमंद बच्चों के लिए शीतकालीन वस्त्र, स्टेशनरी, स्वास्थ्य देखभाल और पोषाहार का व्यक्तिगत स्तर पर प्रबंध करना।

बाल साहित्य प्रोत्साहन: 8वीं कक्षा के छात्रों की सोच और विचारों को संकलित कर उन्हें बाल प्रकाशन मंचों के माध्यम से किताबों के रूप में प्रकाशित कराया।

परिवार का संबल और राष्ट्रीय मंच तक की यात्रा

अल्पायु में अपने माता-पिता को खो देने के बाद सुमन के इस सफर में उनके पति गौरव गोयल ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार की 2-3 महीने लंबी जटिल डिजिटल आवेदन प्रक्रिया के दौरान उनके पति ने घर पर आईटी सुविधाएं उपलब्ध कराईं और उन्हें आवेदन के लिए प्रेरित किया।

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