Homeब्लॉगKhurshani Imli:600 साल पुराने सफर से 'अनोखे सम्मान' तक की पूरी कहानी!!!

Khurshani Imli:600 साल पुराने सफर से ‘अनोखे सम्मान’ तक की पूरी कहानी!!!

Khurshani imli:भारत में इमली का नाम सुनते ही मुंह में पानी आ जाता है। चटनी से लेकर सांभर तक, हमारे व्यंजनों में इसका एक खास स्थान है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि भारत में एक ऐसी भी इमली पाई जाती है, जिसका इतिहास बेहद अनोखा है और हाल ही में उसे एक बड़ा सम्मान मिला है? हम बात कर रहे हैं ‘खुरसानी इमली’ (Khursani Tamarind) की, जो इन दिनों अपनी एक नई पहचान को लेकर चर्चा में है।

आइए जानते हैं विटामिन्स से भरपूर इस अनोखी इमली और इसके दिलचस्प इतिहास के बारे में:

600 साल पुराना है इतिहास

खुरसानी इमली का भारत से नाता सदियों पुराना है। इतिहास के पन्नों को पलटें तो पता चलता है कि लगभग 600 साल पहले, अफगान और अरब व्यापारियों के जरिए इस इमली के पेड़ भारत आए थे। विदेशी जमीन से आकर भारत की मिट्टी में रची-बसी यह इमली आज यहां की संस्कृति का एक अहम हिस्सा बन चुकी है।

आम पेड़ों से बिल्कुल अलग है ‘बाओबाब’

खुरसानी इमली जिस पेड़ पर उगती है, उसे बाओबाब (Baobab Tree) कहा जाता है। यह पेड़ हमारी आम इमली के पेड़ों जैसा बिल्कुल नहीं दिखता।

अनोखी बनावट: बाओबाब पेड़ का तना (गुल्ली) और इसकी शाखाएं बहुत मोटी होती हैं।

पानी का भंडार: इस पेड़ के तने की खासियत यह है कि यह अपने भीतर भारी मात्रा में पानी जमा करके रख सकता है, जिससे यह सूखे के दिनों में भी जीवित रहता है।

दिखावट: इसका अजीबोगरीब और विशाल आकार दूर से ही लोगों का ध्यान खींच लेता है। इसी पेड़ पर अनोखे स्वाद वाली खुरसानी इमली फलती है।

सेहत का खजाना: भरपूर विटामिन्स

स्वाद के साथ-साथ खुरसानी इमली सेहत के लिए भी किसी वरदान से कम नहीं है। इसमें:

भरपूर मात्रा में विटामिन और मिनरल्स पाए जाते हैं।

यह शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता (Immunity) को बढ़ाने में मददगार है।

पाचन तंत्र को दुरुस्त रखने के लिए भी इसे बेहद फायदेमंद माना जाता है।

आदिवासियों की आजीविका और अब मिला ‘अनोखा सम्मान’

अब तक खुरसानी इमली का बाजार बहुत सीमित था। स्थानीय आदिवासी समुदाय के लोग इसे जंगलों या रास्तों के किनारे बैठकर बेचा करते थे। इसके अलावा, इससे कई तरह के स्वादिष्ट स्थानीय पकवान और उत्पाद भी बनाए जाते थे, जो केवल एक विशेष क्षेत्र तक ही सीमित थे।

क्या बदला अब?

खुरसानी इमली को हाल ही में एक ‘अनोखा सम्मान’ (Geographical Indication – GI Tag या विशेष दर्जा) मिला है। इस सम्मान के मिलने से अब इस इमली को राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर एक नई पहचान मिलेगी।

बाजार में आएगा उछाल

इस विशेष सम्मान के बाद उम्मीद जताई जा रही है कि खुरसानी इमली की मांग में भारी तेजी आएगी। इससे न सिर्फ इसकी बिक्री में जबरदस्त उछाल (जोआर) आएगा, बल्कि इसे बेचने वाले स्थानीय आदिवासी भाई-बहनों और किसानों की आर्थिक स्थिति में भी बड़ा सुधार देखने को मिलेगा।

सदियों पहले विदेश से आकर भारत की शान बनी यह खुरसानी इमली आज सही मायनों में आत्मनिर्भरता और पहचान का नया प्रतीक बन चुकी है।

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