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Commonwealth Games:कॉमनवेल्थ टेबल टेनिस में भारत का डंका!!!पुरुष और महिला दोनों टीमों ने जीता स्वर्ण, एशियन गेम्स से पहले बढ़ा हौसला!!!

Commonwealth Games :एशियन गेम्स की तैयारियों में जुटी भारतीय टेबल टेनिस टीम के लिए दिल्ली से एक बेहद शानदार और राहत भरी खबर सामने आई है। त्यागराज स्टेडियम में आयोजित ‘कॉमनवेल्थ टेबल टेनिस चैंपियनशिप’ में भारतीय खिलाड़ियों ने अपना दबदबा कायम रखते हुए पुरुष और महिला—दोनों टीम इवेंट्स में स्वर्ण पदक अपने नाम कर लिया है।

दोनों ही श्रेणियों के फाइनल मुकाबले में भारत का सामना मलेशिया से था, जहाँ भारतीय पैडलर्स ने शानदार प्रदर्शन करते हुए दोहरे सोने पर कब्जा जमाया।

1. महिला टीम की एकतरफा जीत (3-0)

महिला वर्ग के फाइनल मुकाबले में भारतीय टीम ने मलेशियाई खिलाड़ियों को संभलने का कोई मौका नहीं दिया और 3-0 से एकतरफा जीत दर्ज की।

पहला मैच: स्वस्तिका घोष ने एई शिन टी को 11-7, 11-2, 9-11, 11-9 से हराकर भारत को शुरुआती बढ़त दिलाई।

दूसरा मैच: श्रीजा अकुला ने कड़े मुकाबले में कैरेन अनक को 9-11, 11-6, 11-4, 5-11, 11-3 से परास्त किया।

तीसरा मैच: यशस्वीनी घोरपड़े ने एलिस ली के खिलाफ 7-11, 11-3, 17-15, 11-5 से मुकाबला जीतकर भारत की खिताबी जीत पर मुहर लगा दी।

पुरानी हार का हिसाब चुकता: बर्मिंघम कॉमनवेल्थ गेम्स के क्वार्टर फाइनल में भारतीय महिला टीम को मलेशिया के हाथों हार का सामना करना पड़ा था। इस शानदार जीत के साथ श्रीजा और उनकी टीम ने उस हार का हिसाब भी बराबर कर लिया। इस टीम में सुतीर्था मुखर्जी और सिंड्रेला दास भी शामिल थीं, हालांकि वे फाइनल मैच में नहीं उतरीं।

2. पुरुष टीम का रोमांचक मुकाबला (3-2)

महिला टीम के विपरीत, भारतीय पुरुष टीम को स्वर्ण पदक तक पहुँचने के लिए कड़ी मशक्कत करनी पड़ी। मुकाबला आखिरी मैच तक गया, जहाँ भारत ने 3-2 से रोमांचक जीत दर्ज की।

शुरुआती बढ़त: मानव ठक्कर और मानुष शाह ने अपने-अपने एकल मैच जीतकर भारत को 2-0 की मजबूत बढ़त दिलाई। मानव ने जावेन चुंग और मानुष ने किउ शेन ओंग को हराया।

मलेशिया की वापसी: इसके बाद जी. साथियान और मानव ठक्कर अपने-अपने मैच हार गए, जिससे मलेशिया ने 2-2 से बराबरी कर ली।

निर्णायक मुकाबला: दबाव के क्षणों में मानुष शाह ने शानदार खेल दिखाया और निर्णायक मैच में चुंग को सीधे सेटों में 11-7, 11-4, 11-4 से हराकर भारत की झोली में दूसरा सोना डाल दिया।

एशियन गेम्स से पहले बढ़ा मनोबल

बर्मिंघम कॉमनवेल्थ गेम्स के बाद इस बार मुख्य गेम्स से टेबल टेनिस को हटा दिया गया था, लेकिन ग्लासगो में गेम्स के दौरान ही दिल्ली में इस चैंपियनशिप का आयोजन किया गया।

भारतीय टीम की इस दोहरी सफलता पर कोच सौरभ चक्रवर्ती ने खुशी जताते हुए कहा:

“टीम में कई युवा खिलाड़ी शामिल हैं। ऐसे युवा खिलाड़ियों के साथ कॉमनवेल्थ स्तर पर चैंपियन बनना बेहद सकारात्मक संकेत है। आगामी एशियन गेम्स से ठीक पहले मिली यह जीत पूरी टीम के आत्मविश्वास को कई गुना बढ़ाएगी।”

टीम इवेंट्स में ऐतिहासिक सफलता हासिल करने के बाद, भारतीय खिलाड़ी अब सिंगल्स और डबल्स कैटेगरी के मुकाबलों में अपना जलवा दिखाने के लिए मैदान में उतरेंगे।

और पढ़ें:Shantiniketan Medical College & Hospital:मेडिकल कॉलेज में 14 मरीजों का बोन मैरो प्रत्यारोपण!!!

Shantiniketan Medical College & Hospital:मेडिकल कॉलेज में 14 मरीजों का बोन मैरो प्रत्यारोपण!!!

Shantiniketan Medical College & Hospital:बच्चों की बेफिक्र मुस्कान और खिलखिलाती हुई हंसी किसी भी परिवार के लिए दुनिया की सबसे खूबसूरत दौलत होती है। हालांकि, जो परिवार ‘मेजर थैलेसीमिया’ जैसी गंभीर और जानलेवा बीमारी से जूझ रहे हैं, उनके लिए हर उगता हुआ दिन दर्द, अनिश्चितता और आर्थिक संघर्ष की एक नई दास्तान लेकर आता है। हर कुछ हफ्तों में खून चढ़ाने (ब्लड ट्रांसफ्यूजन) की विवशता, महंगे इलाज की लाचारी और बच्चे के अनिश्चित भविष्य का डर उनके जीवन का स्थाई हिस्सा बन जाता है।

परंतु, पश्चिम बंगाल के बोलपुर स्थित शांतिनिकेतन मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल (SMC&H) ने इन दुःखों के बीच आशा की एक ऐतिहासिक किरण बिखेरी है। कोकिलाबेन धीरूभाई अंबानी रिसर्च सेंटर के सहयोग से, अस्पताल ने मेजर थैलेसीमिया से पीड़ित 14 बच्चों और किशोर-किशोरियों को नया जीवन देने की एक अनुकरणीय पहल शुरू की है।

बिना किसी आर्थिक बोझ के होगा ‘बोन मैरो ट्रांसप्लांट’

इस मानवीय मिशन के तहत सभी 14 थैलेसीमिया ग्रस्त मरीजों का बोन मैरो प्रत्यारोपण (Bone Marrow Transplant) पूरी तरह निःशुल्क किया जाएगा।

कुल अनुमानित लागत: लगभग ₹7 करोड़

मरीजों पर वित्तीय भार: शून्य (0%)

सहयोगी संस्थान: शांतिनिकेतन मेडिकल कॉलेज एवं कोकिलाबेन धीरूभाई अंबानी रिसर्च सेंटर

इस वृहद स्वास्थ्य पहल की संपूर्ण लागत को आयोजकों द्वारा स्वयं वहन किया जाएगा, जिससे पीड़ित परिवारों को एक भी रुपया खर्च नहीं करना पड़ेगा।

100% HLA जीन मैच: सफलता की ओर बड़ा कदम

गौरतलब है कि इसी वर्ष अप्रैल महीने में शांतिनिकेतन मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल में एक विशेष थैलेसीमिया स्क्रीनिंग और मूल्यांकन शिविर आयोजित किया गया था। इस शिविर में अत्याधुनिक पैथोलॉजिकल परीक्षणों और डॉक्टरी जांच के बाद इन 14 मरीजों का चयन किया गया।

चिकित्सकों के अनुसार, चयनित सभी 14 मरीजों में 100 प्रतिशत एचएलए (HLA – Human Leukocyte Antigen) जीन मैच पाया गया है। बोन मैरो ट्रांसप्लांट की सफलता दर को अधिकतम करने और रिजेक्शन के जोखिम को समाप्त करने के लिए 100% HLA मैच होना चिकित्सा विज्ञान में सबसे महत्वपूर्ण कारक माना जाता है।

जीवनदान पाने वाले 14 योद्धा:

मंगलदीप वैद्य

अनिमेष करण

रिया खातून

तानवी सुल्ताना

सुल्ताना परवीन

मोहम्मद इम्तियाज आलम

सुमाईया खातून

मिरजानु खातून

अनंत रानू

रेहान शेख

सैयद अब्दुल्ला सिद्दीकी

सुमन मुर्मू

मोहम्मद बरकतुल्लाह

अरित्र दलुई

 

शांतिनिकेतन मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल के निदेशक प्रोफेसर डॉ. अशोक कुमार दत्त ने इस संदर्भ में कहा:

पैसे की कमी से कोई जान न गंवाए,मेजर थैलेसीमिया से स्थायी मुक्ति पाने का सबसे प्रभावी तरीका बोन मैरो ट्रांसप्लांट ही है। लेकिन इसकी अत्यधिक लागत के कारण अधिकांश साधारण और मध्यमवर्गीय परिवार इस इलाज का सपना भी नहीं देख पाते। हमारा मुख्य ध्येय यही है कि धन का अभाव किसी बच्चे के जीवन की डोर टूटने की वजह न बने। 100% HLA मैच मिलने से इन बच्चों के पूरी तरह ठीक होने की संभावनाएं बेहद उज्ज्वल हैं।”

चिकित्सा नहीं, यह है सेवा का अनुपम उदाहरण

यह कदम केवल 14 मरीजों का इलाज करने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह 14 परिवारों के वर्षों पुराने मानसिक और आर्थिक कष्टों को खत्म करने की एक दृढ प्रतिबद्धता है। जब चिकित्सा क्षेत्र महज एक व्यवसाय न रहकर जनसेवा और संवेदनशीलता का माध्यम बनता है, तब समाज में ऐसे ही सकारात्मक बदलाव जन्म लेते हैं। शांतिनिकेतन मेडिकल कॉलेज की इस पहल ने यह साबित कर दिया है कि आधुनिक चिकित्सा की असली ताकत तकनीक से ज्यादा ‘मानवता और सहानुभूति’ में निहित है।

Glasgow Commonwealth Games:राष्ट्रमंडल खेल 2026: गुलवीर सिंह ने 10,000 मीटर में रचा इतिहास, भारत को दिलाया पहला ऐतिहासिक रजत पदक!!!

Glasgow Commonwealth Games:ग्लासगो में आयोजित राष्ट्रमंडल खेल 2026 (Commonwealth Games 2026) में भारत के स्टार लॉन्ग-डिस्टेंस रनर गुलवीर सिंह ने इतिहास के पन्नों में अपना नाम दर्ज करा लिया है। मंगलवार देर रात स्कॉट्सटौन स्टेडियम में मूसलाधार बारिश के बीच आयोजित पुरुषों की 10,000 मीटर दौड़ में गुलवीर सिंह ने शानदार प्रदर्शन करते हुए रजत पदक (Silver Medal) अपने नाम किया। राष्ट्रमंडल खेलों के इतिहास में पुरुषों की 10,000 मीटर स्पर्धा में पदक जीतने वाले वह पहले भारतीय एथलीट बन गए हैं।

25 लैप की इस कठिन और चुनौतीपूर्ण रेस में 26 वर्षीय राष्ट्रीय रिकॉर्ड धारक गुलवीर सिंह ने 27 मिनट 49.78 सेकंड का समय निकाला। ऑस्ट्रेलिया के काई रॉबिन्सन (27:48.93) ने स्वर्ण पदक जीता, जबकि आइल ऑफ मैन के डेविड मुल्लार्की ने कांस्य पदक हासिल किया।

एक दुर्लभ रिकॉर्ड: 1986 के बाद यह पहला मौका है जब राष्ट्रमंडल खेलों की 10,000 मीटर स्पर्धा में शीर्ष तीन स्थानों (पॉडियम) पर कोई भी अफ्रीकी एथलीट जगह नहीं बना सका। गुलवीर की इस ऐतिहासिक सफलता ने बर्मिंघम 2022 में अविनाश साबले द्वारा जीती गई ऐतिहासिक जीत की यादें ताजा कर दी हैं।

कोच स्कॉट सिमंस का ‘मास्टरप्लान’ आया काम

गुलवीर की इस ऐतिहासिक सफलता के पीछे उनके कोच स्कॉट सिमंस की सटीक रणनीति और मास्टरप्लान का बड़ा हाथ रहा। मैच के बाद गुलवीर ने अपनी रणनीति का खुलासा करते हुए बताया:

शुरुआती गति पर नियंत्रण: कोच ने शुरुआत में ही बढ़त बनाने के बजाय आगे चल रहे धावकों की पेस (गति) को बनाए रखने की सलाह दी थी।

अंतिम फिनिश: असली योजना अंतिम 400 मीटर (आखरी लैप) में अपनी पूरी ऊर्जा झोंककर गति बढ़ाने की थी।

गुलवीर ने कोच के निर्देशों का अक्षरशः पालन किया और अंतिम लैप में शानदार स्प्रिंट लगाते हुए भारत के लिए रजत पदक पक्का कर लिया।

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने दी बधाई

गुलवीर सिंह की इस अभूतपूर्व उपलब्धि पर भारत की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘X’ (ट्विटर) पर उन्हें बधाई दी।

राष्ट्रपति का संदेश:

“गुलवीर सिंह, आपकी इस शानदार उपलब्धि पर हार्दिक बधाई! ग्लासगो राष्ट्रमंडल खेल 2026 की पुरुषों की 10,000 मीटर दौड़ में रजत पदक जीतकर आपने भारत को इस स्पर्धा में पहला राष्ट्रमंडल पदक दिलाया है। पूरा देश आप पर गर्व करता है। आपके उज्ज्वल भविष्य और आगामी सफलताओं की कामना करती हूँ।”

देश और परिवार को समर्पित किया पदक

26 वर्षीय स्टार एथलीट गुलवीर सिंह ने अपनी इस ऐतिहासिक जीत को अपने परिवार, विशेषकर अपनी मां और पूरे देशवासियों को समर्पित किया है।

भावुक होते हुए गुलवीर ने कहा, “मैं यह पदक अपने परिवार को समर्पित करता हूँ। इस ऐतिहासिक पल में मुझे विशेष रूप से अपनी माँ की याद आ रही है। मेरी माँ, पिता और भाई—मेरा पूरा परिवार हमेशा मेरे साथ मजबूती से खड़ा रहा है। लेकिन सबसे बढ़कर, यह पदक मेरे देश भारत के लिए है, क्योंकि मैदान पर हम अपने तिरंगे का प्रतिनिधित्व करते हैं।”

और पढ़ें:AI तकनीकी और मानवीय संवेदनाओं का नया संगम: कोलकाता में ‘बंधुर बंधन’ पहल का भव्य शुभारंभ!!!!

AI तकनीकी और मानवीय संवेदनाओं का नया संगम: कोलकाता में ‘बंधुर बंधन’ पहल का भव्य शुभारंभ!!!!

तकनीकी और मानवीय संवेदनाओं का नया संगम: कोलकाता में ‘बंधुर बंधन’ पहल का भव्य शुभारंभ

 जब दोस्ती केवल व्यक्तिगत संबंधों तक सीमित न रहकर समाज कल्याण और मानवीय सेवा का माध्यम बनती है, तब सामाजिक परिवर्तन का एक नया अध्याय लिखा जाता है। इसी विचार को धरातल पर उतारने के लिए आज कोलकाता के सॉल्ट लेक स्थित ऐतिहासिक परिसर ‘द स्टैडेल’ (विवेकानंद युवा भारती क्रीड़ांगन) में ‘बंधुर बंधन’ (Bond of Friendship) नामक एक बहुआयामी सामाजिक पहल की औपचारिक शुरुआत की जा रही है।

अंतर्राष्ट्रीय मित्रता दिवस के अवसर पर आयोजित इस विशेष कार्यक्रम का उद्देश्य तकनीक, शिक्षा, स्वास्थ्य, मानव सेवा और डिजिटल सहभागिता के माध्यम से एक समावेशी, सजग और उन्नत समाज का निर्माण करना है। ‘एक दुनिया’, ‘पॉज़िटिव वार्ता’, ‘एआई मां मिशन’ (AI Maa Mission) और ‘डिजिटल त्रिपुरा पहल’ जैसी दूरदर्शी संस्थाओं तथा अभियानों के संयुक्त तत्वावधान में शुरू हो रहा यह मंच भारत को सशक्त और आत्मनिर्भर बनाने के संकल्प को गति देगा।

‘बंधुर बंधन’: सामाजिक संवेदना और तकनीक का एक नया युग

आधुनिक युग में डिजिटल क्रांति ने जहां दूरियों को मिटाया है, वहीं मानवीय संबंधों में संवेदनशीलता और आपसी जुड़ाव को बनाए रखना भी एक चुनौती बन गया है। ‘बंधुर बंधन’ इसी अंतर को पाटने की एक अभिनव कोशिश है। इस पहल के तहत यह संदेश दिया जा रहा है कि आधुनिक तकनीक (जैसे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) और मानवीय मूल्यों का जब सही तालमेल होता है, तो समाज के सबसे निचले पायदान पर खड़े व्यक्ति तक भी विकास की किरण पहुंचाई जा सकती है।

आयोजकों का मानना है कि सच्ची मित्रता वही है जो समाज को जागरूक करे, शिक्षा के अवसर बढ़ाए, स्वास्थ्य सेवाओं को सुलभ बनाए और संकट के समय एक-दूसरे का हाथ थामे।

प्रमुख स्तंभ: चार महा-अभियानों का एक मंच पर संगम

इस पहल की नींव मुख्य रूप से चार प्रमुख दूरदर्शी सोच और अभियानों पर टिकी है:

1. एक दुनिया (Ek Dunia): वैश्विक सोच और स्थानीय जुड़ाव

‘एक दुनिया’ का लक्ष्य वसुधैव कुटुंबकम की भावना को साकार करना है। इसके तहत पूरे देश और दुनिया के युवाओं, तकनीक विशेषज्ञों, शिक्षकों और समाजशास्त्रियों को एक साझा डिजिटल मंच पर लाने का प्रयास किया जा रहा है, ताकि वे अपने विचारों का आदान-प्रदान कर सकें और सामाजिक समस्याओं का व्यावहारिक समाधान खोज सकें।

2. पॉज़िटिव वार्ता (Positive Barta): सकारात्मकता का प्रसार

आज के डिजिटल दौर में जब भ्रामक और नकारात्मक खबरों का बोलबाला है, ‘पॉज़िटिव वार्ता’ समाज में प्रेरणादायक कहानियों, मानवीय प्रयासों और सकारात्मक परिवर्तन की खबरों को प्राथमिकता देती है। इसका मुख्य उद्देश्य युवाओं के मानस में सकारात्मक सोच और राष्ट्र निर्माण की भावना को मजबूत करना है।

3. एआई मां मिशन (AI Maa Mission): मातृत्व सेवा और तकनीक

‘एआई मां मिशन’ इस पूरी पहल का सबसे अनूठा और मानवीय पहलू है। इस मिशन के तहत कृत्रिम बुद्धिमत्ता (Artificial Intelligence) का उपयोग मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य देखभाल, परामर्श, और दूरस्थ ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं की त्वरित उपलब्धता के लिए किया जा रहा है। यह मिशन यह सिद्ध करता है कि एआई जैसी अत्याधुनिक तकनीक भी एक ‘मां’ की भांति ममता, देखभाल और सुरक्षा का माध्यम बन सकती है।

4. डिजिटल त्रिपुरा पहल (Digital Tripura Initiative): पूर्वोत्तर में डिजिटल सशक्तीकरण

भारत के पूर्वोत्तर राज्यों, विशेषकर त्रिपुरा में डिजिटल साक्षरता, युवाओं के लिए कौशल विकास और ई-गवर्नेंस सेवाओं को जमीनी स्तर तक पहुंचाने के लिए यह पहल एक मील का पत्थर साबित हो रही है। ‘बंधुर बंधन’ के माध्यम से पश्चिम बंगाल और पूर्वोत्तर के राज्यों के बीच सामाजिक व सांस्कृतिक तालमेल को भी बढ़ावा मिलेगा।

सामाजिक सरोकार के मुख्य क्षेत्र

‘बंधुर बंधन’ अभियान केवल एक औपचारिक आयोजन न होकर पांच मुख्य कार्यक्षेत्रों पर केंद्रित रहेगा:

कार्यक्षेत्र मुख्य उद्देश्य और कार्ययोजना
1. डिजिटल साक्षरता व शिक्षा ग्रामीण व वंचित वर्ग के बच्चों को नि:शुल्क डिजिटल शिक्षा और एआई-आधारित शिक्षण सामग्री उपलब्ध कराना।
2. सुलभ स्वास्थ्य सेवाएं टेली-मेडिसिन और ‘एआई मां मिशन’ के माध्यम से दूरदराज के क्षेत्रों तक स्वास्थ्य परामर्श पहुंचाना।
3. सामाजिक भाईचारा युवाओं को समाज सेवा, स्वच्छता अभियानों और पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एकजुट करना।
4. महिला सशक्तीकरण डिजिटल कौशल विकास के जरिए ग्रामीण व शहरी महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाना।
5. ‘विकसित भारत’ में योगदान जमीनी स्तर पर नीतियों को लागू करने में नागरिक सहभागिता बढ़ाना।

‘विकसित भारत’ के सपने को मिलेगी नई उड़ान

भारत सरकार के ‘विकसित भारत 2047’ के विजन में जन-भागीदारी और तकनीकी सशक्तीकरण अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ‘बंधुर बंधन’ जैसी पहल यह दर्शाती है कि गैर-सरकारी संस्थाएं, नागरिक समाज और तकनीकी विशेषज्ञ मिलकर किस प्रकार देश को विकास के पथ पर आगे ले जा सकते हैं।

कोलकाता में आयोजित हो रहे इस कार्यक्रम में शिक्षाविद्, तकनीकी विशेषज्ञ, स्वास्थ्यकर्मी, सामाजिक कार्यकर्ता और बड़ी संख्या में युवा हिस्सा ले रहे हैं। आयोजकों ने सभी नागरिकों से आह्वान किया है कि वे इस मानवीय महा-अभियान का हिस्सा बनें और समाज में सकारात्मक बदलाव की इस यात्रा में अपना योगदान दें।

“दोस्ती जब केवल एक भावना न रहकर समाज सेवा और तकनीकी नवाचार का संबल बनती है, तब राष्ट्र निर्माण की दिशा में एक नया अध्याय प्रारंभ होता है। ‘बंधुर बंधन’ इसी मानवीय प्रतिबद्धता का नाम है।”

कार्यक्रम का विवरण

Dahi स्वास्थ का अमृत: रोज़ाना दही खाने के 10 अद्भुत वैज्ञानिक फायदे और सही सेवन की संपूर्ण गाइड!!!

स्वास्थ का अमृत: रोज़ाना दही खाने के 10 अद्भुत वैज्ञानिक फायदे और सही सेवन की संपूर्ण गाइड

 भारतीय रसोई और हमारी पारंपरिक जीवनशैली में दही केवल एक स्वादिष्ट आहार नहीं, बल्कि औषधीय गुणों का भंडार मानी गई है। सदियों से हमारे बुजुर्ग भोजन की थाली में एक कटोरी दही या छाछ शामिल करने की सलाह देते आए हैं। आधुनिक विज्ञान और पोषण विशेषज्ञों (Nutritionists) ने भी अब यह पूरी तरह स्वीकार कर लिया है कि दही एक सुपरफूड (Superfood) है, जो हमारे आंत (Gut Health), दिल, हड्डियों और त्वचा के लिए संजीवनी की तरह काम करती है।

यदि आप अपनी दैनिक दिनचर्या में दही को सही तरीके से शामिल करते हैं, तो आप कई गंभीर बीमारियों से दूर रह सकते हैं। आइए जानते हैं दही के पीछे का पूरा विज्ञान, इसके स्वास्थ्य लाभ और इसे खाने के सही नियमों के बारे में।

 

1. पाचन तंत्र और आंत स्वास्थ्य का रक्षक (Probiotic Power)

दही को ‘प्रोबायोटिक’ (Probiotic) का सबसे बेहतरीन प्राकृतिक स्रोत माना जाता है। प्रोबायोटिक वास्तव में जीवित सूक्ष्मजीव (Good Bacteria) होते हैं, जो हमारी आंतों के स्वास्थ्य को सुधारते हैं।

  • लैक्टोबैसिलस का जादू: दही जमने की प्रक्रिया में लैक्टोबैसिलस (Lactobacillus) नामक बैक्टीरिया दूध के लैक्टोज को लैक्टिक एसिड में बदल देते हैं। यह प्रक्रिया पेट में बुरे बैक्टीरिया को मारती है और पाचन शक्ति को बढ़ाती है।

  • कब्ज और एसिडिटी से राहत: जिन लोगों को बार-बार गैस, ब्लोटिंग, एसिडिटी या कब्ज की समस्या रहती है, उनके लिए दही का नियमित सेवन एक प्राकृतिक औषधि की तरह काम करता है।

  • इर्रिटेबल बोवेल सिंड्रोम (IBS): पाचन संबंधी जटिल समस्याओं से पीड़ित मरीजों को डॉक्टर अक्सर रोजाना छाछ या दही लेने की सलाह देते हैं।

2. रोग प्रतिरोधक क्षमता (Immunity) को मजबूती

आपकी प्रतिरक्षा प्रणाली (Immune System) का लगभग 70% हिस्सा आपकी आंतों की सेहत से जुड़ा होता है। जब आपकी आंतें स्वस्थ रहती हैं, तो आपका शरीर संक्रमणों से बेहतर तरीके से लड़ पाता है।

  • जिंक और सेलेनियम से भरपूर: दही में जिंक, सेलेनियम और विटामिन B12 जैसे सूक्ष्म पोषक तत्व (Micronutrients) प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं, जो इम्यून सेल्स को सक्रिय रखते हैं।

  • बदलते मौसम में सुरक्षा: नियमित दही खाने वाले लोगों में मौसमी सर्दी, जुकाम और पेट के संक्रमण होने का खतरा काफी कम हो जाता है।

3. हड्डियों और दांतों की अटूट ताकत

दही कैल्शियम और फास्फोरस का एक उत्कृष्ट स्रोत है। यह दोनों खनिज हड्डियों के घनत्व (Bone Density) को बनाए रखने और दांतों को मजबूत बनाने के लिए बेहद जरूरी हैं।

  • ऑस्टियोपोरोसिस से बचाव: उम्र बढ़ने के साथ महिलाओं और पुरुषों दोनों में हड्डियों के पतले होने (Osteoporosis) का खतरा बढ़ जाता है। रोजाना एक कटोरी दही खाने से हड्डियों का क्षय रुकता है।

  • दांतों का इनेमल: दही में मौजूद फास्फोरस दांतों के इनेमल को सुरक्षित रखता है और कैविटी पैदा करने वाले बैक्टीरिया को रोकता है।

4. हृदय स्वास्थ्य और कोलेस्ट्रॉल नियंत्रण

आधुनिक जीवनशैली में दिल की बीमारियां एक बड़ी चुनौती बन चुकी हैं। दही का सही तरीके से सेवन आपके दिल के स्वास्थ्य में सुधार कर सकता है।

पोषक तत्व / लाभ दही में उपस्थिति हृदय स्वास्थ्य पर प्रभाव
पोटेशियम उच्च मात्रा सोडियम के असर को कम कर ब्लड प्रेशर नियंत्रित करता है
गुड कोलेस्ट्रॉल (HDL) मध्यम मात्रा बैड कोलेस्ट्रॉल (LDL) के स्तर को घटाने में मददगार
सैचुरेटेड फैट नियंत्रण टोंड दही में कम नसों में प्लाक बनने से रोकता है

5. वजन घटाने और फैट बर्निंग में मददगार

यदि आप वजन कम करने के सफर पर हैं, तो दही आपका सबसे अच्छा साथी बन सकता है।

  • प्रोटीन की प्रचुरता: दही में प्रोटीन की मात्रा अधिक होती है, जिससे इसे खाने के बाद लंबे समय तक पेट भरा हुआ महसूस होता है और अस्वास्थ्यकर स्नैक्स खाने की लालसा (Cravings) कम होती है।

  • कॉर्टिसोल हार्मोन पर नियंत्रण: शरीर में तनाव बढ़ाने वाला हार्मोन ‘कॉर्टिसोल’ फैट (विशेषकर पेट की चर्बी) जमा करने के लिए जिम्मेदार होता है। दही में मौजूद कैल्शियम कॉर्टिसोल के उत्पादन को सीमित करने में मदद करता है।

6. त्वचा और बालों के लिए प्राकृतिक निखार

दही केवल खाने के काम ही नहीं आती, बल्कि सौंदर्य निखारने में भी इसका कोई मुकाबला नहीं है।

  • त्वचा का प्राकृतिक मॉइस्चराइजर: दही में मौजूद लैक्टिक एसिड त्वचा की मृत कोशिकाओं (Dead Skin Cells) को हटाकर चेहरे पर प्राकृतिक चमक लाता है। बेसन और दही का लेप मुहांसों और टैनिंग को दूर करता है।

  • डैंड्रफ से मुक्ति: दही में एंटी-फंगल गुण पाए जाते हैं। बालों की जड़ों में दही लगाने से रूसी (Dandruff) खत्म होती है और बाल मुलायम व चमकदार बनते हैं।

7. दही पोषण सारिणी (Nutritional Profile per 100g)

दही में मौजूद पोषक तत्वों का ब्यौरा नीचे दी गई तालिका में देखा जा सकता है:

घटक मात्रा (प्रति 100 ग्राम)
कैलोरी ~60-70 kcal
प्रोटीन 3.5 – 4.5 ग्राम
फैट 3.0 – 4.0 ग्राम (टोंड में कम)
कैल्शियम ~120 मिग्रा
विटामिन B12 दैनिक आवश्यकता का ~13%
पोटेशियम ~155 मिग्रा

दही सेवन के आयुर्वेद एवं आधुनिक नियम: क्या करें और क्या न करें

दही भले ही कितनी भी गुणकारी हो, लेकिन गलत समय और गलत तरीके से खाने पर यह शरीर को नुकसान भी पहुंचा सकती है।

सही तरीका और सही समय

  1. दोपहर का समय सबसे उत्तम: दही का सेवन हमेशा सूर्योदय के बाद और दोपहर के भोजन के साथ करना चाहिए। इस समय पाचन अग्नि (Digestive Fire) तीव्र होती है।

  2. सेंधा नमक या मिश्री मिलाएं: आयुर्वेद के अनुसार, दही को हमेशा थोड़ी सी मिश्री, भुना जीरा, सेंधा नमक या काली मिर्च मिलाकर खाना चाहिए।

  3. ताजा दही खाएं: हमेशा ताजा जमी दही का ही प्रयोग करें। बहुत खट्टी दही शरीर में पित्त और कफ दोष को बढ़ा सकती है।

किन बातों से बचें?

  • रात में दही न खाएं: रात के समय शरीर में कफ की प्रवृत्ति बढ़ती है। रात में दही खाने से बलगम, खांसी, जोड़ों में दर्द और पाचन संबंधी समस्याएं हो सकती हैं।

  • दही को गर्म न करें: दही को कभी भी पकाकर या गर्म करके नहीं खाना चाहिए, क्योंकि गर्म करने से इसके मित्र बैक्टीरिया (Gut Bacteria) नष्ट हो जाते हैं।

  • मछली के साथ न लें: दही और मछली का संयोजन (Food Combination) अस्वास्थ्यकर माना जाता है, जिससे त्वचा संबंधी विकार हो सकते हैं।

संक्षेप में कहें तो, दही प्रकृति द्वारा दिया गया एक ऐसा उपहार है जो स्वाद और स्वास्थ्य का संतुलन बनाए रखता है। चाहे आपकी प्राथमिकता पाचन सुधारना हो, वजन कम करना हो या फिर हड्डियों को मजबूत बनाना हो—दही आपकी हर जरूरत पर खरी उतरती है। आज ही अपनी दोपहर की थाली में एक कटोरी ताजा दही शामिल करें और एक स्वस्थ जीवन की ओर कदम बढ़ाएं!

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Gunjan Saxena: जब द्रास और बटालिक के आसमान में गूंजा ‘चीता’, जानिए ‘द कारगिल गर्ल’ की शौर्य गाथा

रणभूमि की वह हुंकार, जिसने इतिहास के पन्नों को नया मोड़ दिया

वर्ष 1999 का ग्रीष्मकाल। कारगिल की हिमाच्छादित, दुर्गम और पथरीली चोटियाँ युद्ध की भीषण लपटों में झुलस रही थीं। ‘ऑपरेशन विजय’ के तहत भारतीय थल सेना और वायु सेना के वीर जांबाज मातृभूमि की अस्मिता की रक्षा के लिए घुसपैठियों को खदेड़ने में जुटे थे। जब भी युद्ध या सेना के पराक्रम की चर्चा होती है, तो अमूमन पुरुष योद्धाओं के चेहरे आँखों के सामने तैरने लगते हैं। लेकिन 1999 के कारगिल युद्ध की एक ऐतिहासिक सच्चाई यह भी है कि जब नियंत्रण रेखा (LoC) के पार से दुश्मन आग के गोले बरसा रहा था, तब भारत की एक बेटी भी आसमान का सीना चीरते हुए अग्रिम चौकियों पर रसद और दवाइयाँ पहुँचा रही थी।

उन्हें दुनिया ‘द कारगिल गर्ल’ यानी फ्लाइट लेफ्टिनेंट गुंजन सक्सेना के नाम से जानती है।

जब उधमपुर एयरबेस के स्टेशन कमांडर ने उनसे पूछा था—“क्या युद्धक्षेत्र के खतरनाक माहौल में जाने से कोई आपत्ति है?” तब उस 24 वर्षीया युवा महिला सैन्य अधिकारी की आँखों में रत्ती भर भी भय नहीं था। उनका सीधा और अडिग उत्तर था—“आपत्ति का सवाल ही पैदा नहीं होता, यह तो मेरे लिए अत्यंत गर्व का विषय है!” जब कमांडर ने मुस्कुराते हुए पुनः पूछा—“और अगर दुश्मन के इलाके में पकड़ी गईं तो?” तब अपनी कमर पर बंधी पिस्टल की तरफ इशारा करते हुए उन्होंने कहा था—“मेरे पास ऑटोमैटिक पिस्टल है, मैं संभाल लूँगी! और यदि संभव हो तो मुझे एक असॉल्ट राइफल भी दे दीजिए।”

यह निर्भीक उत्तर किसी आम नागरिक का नहीं, बल्कि भारतीय वायु सेना की पहली महिला कॉम्बैट एविएटर्स में से एक गुंजन सक्सेना का था।

बचपन से कॉकपिट तक का सफर: एक सपने की उड़ान

गुंजन सक्सेना का जन्म 1975 में उत्तर प्रदेश की सांस्कृतिक राजधानी लखनऊ में एक निष्ठावान सैन्य परिवार में हुआ था। उनके पिता भारतीय सेना में लेफ्टिनेंट कर्नल के पद पर कार्यरत थे और उनके भाई ने भी सेना में शामिल होकर देशसेवा का मार्ग चुना। बचपन से ही अनुशासन, देशभक्ति और वर्दी के प्रति सम्मान का माहौल गुंजन को विरासत में मिला।

बचपन में अत्यधिक बातें करने के कारण परिवारजन उन्हें प्यार से ‘गुंजन’ कहते थे। जब वह मात्र 5 वर्ष की थीं, तब अपने एक रिश्तेदार पायलट के माध्यम से उन्हें पहली बार एक विमान के कॉकपिट को भीतर से देखने का अवसर मिला। उस नन्हीं सी उम्र में उन्होंने कभी नहीं सोचा था कि एक दिन यही कॉकपिट उनकी पहचान बनेगा और वह सामान्य यात्री विमान नहीं, बल्कि दुर्गम पहाड़ियों में उड़ने वाले भारतीय वायु सेना के ‘चीता’ (Cheetah) हेलीकॉप्टर की कमान संभालेंगी।

शिक्षा और वायु सेना में ऐतिहासिक प्रवेश

गुंजन की स्कूली शिक्षा पूरी होने के बाद उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रसिद्ध हंसराज कॉलेज से भौतिक विज्ञान (Physics) में स्नातक (B.Sc.) की डिग्री हासिल की। पढ़ाई के दौरान ही आकाश में उड़ने की लालसा उन्हें सफदरजंग फ्लाइंग क्लब (Safdarjung Flying Club) ले गई।

वर्ष 1994 भारतीय वायु सेना के इतिहास में एक स्वर्णिम अध्याय लेकर आया। यह वही वर्ष था जब भारतीय वायु सेना ने इतिहास में पहली बार महिलाओं को पायलट के रूप में शामिल करने का ऐतिहासिक निर्णय लिया। सर्विस सिलेक्शन बोर्ड (SSB) की कठिन प्रवेश परीक्षा उत्तीर्ण कर गुंजन सक्सेना वायु सेना में चुनी गईं। देश भर से चयनित 25 जांबाज महिला कैडेटों के पहले बैच में गुंजन सक्सेना भी शामिल थीं। प्रशिक्षण पूरा करने के पश्चात उनकी पहली पोस्टिंग जम्मू-कश्मीर के रणनीतिक रूप से संवेदनशील उधमपुर एयरबेस पर हुई।

1999 का कारगिल युद्ध और ‘ऑपरेशन विजय’ में गुंजन की भूमिका

उधमपुर में तैनाती के महज़ पांच वर्ष बाद ही भारत-पाकिस्तान के बीच कारगिल युद्ध छिड़ गया। मई 1999 में शुरू हुए ‘ऑपरेशन विजय’ में भारतीय वायु सेना ने ‘ऑपरेशन सफेद सागर’ (Op Safed Sagar) के तहत अपनी शक्ति का प्रदर्शन किया। इस मिशन में पहली बार महिला पायलटों को युद्ध क्षेत्र के सीधे संपर्क (Operational Zone) में तैनात किया गया। फ्लाइट लेफ्टिनेंट गुंजन सक्सेना और उनकी साथी फ्लाइट लेफ्टिनेंट विद्या राजन को कारगिल के युद्धग्रस्त आसमान में उतरने का निर्देश मिला।

जोखिम भरे मिशन और अदम्य साहस

गुंजन सक्सेना के कंधों पर अत्यंत संवेदनशील और जीवन-रक्षक जिम्मेदारियाँ थीं:

  • रसद एवं जीवनरक्षक दवाओं की आपूर्ति: द्रास, बटालिक और टोलोलिंग जैसी अत्यंत ऊँची और जोखिमभरी चोटियों पर तैनात सैनिकों तक गोला-बारूद, रसद और दवाइयाँ पहुँचाना।

  • गंभीर रूप से घायल सैनिकों का रेस्क्यू (Evacuation): अग्रिम चौकियों से घायल भारतीय वीर जवानों को तुरंत एयरलिफ्ट कर सैन्य अस्पतालों तक पहुँचाना।

  • शहीदों के पार्थिव शरीर को निकालना: दुर्गम पहाड़ियों के बीच से जहाँ दुश्मन की गोलियाँ बरस रही हों, वहाँ से शहीद जवानों के पार्थिव शरीरों को ससम्मान वापस लाना।

  • रेकी (Reconnaissance): आसमान में उड़ान भरते हुए पाकिस्तानी सैनिकों और घुसपैठियों की हलचल पर नजर रखना और एयरबेस को इनपुट देना।

जिस ‘चीता’ हेलीकॉप्टर को गुंजन और विद्या उड़ा रही थीं, उसमें न तो आत्मरक्षा के लिए कोई मशीन गन लगी थी और न ही कोई रॉकेट लॉन्चर। वह एक हल्का निहत्था हेलीकॉप्टर था। कारगिल की तंग घाटियों में उड़ान भरते समय दुश्मन की मिसाइलें कई बार उनके हेलीकॉप्टर के बेहद करीब से गुजरीं। एक बार तो पाकिस्तानी कंधे पर रखकर दागी जाने वाली मिसाइल (SAM) उनके हेलीकॉप्टर को बाल-बाल चूक गई। इसके बावजूद, गुंजन ने कभी हिम्मत नहीं हारी और कई बार इमरजेंसी व क्रैश लैंडिंग के करीब की परिस्थितियों से निकलकर भी सैनिकों की जान बचाई।

कारगिल युद्ध के मुख्य आंकड़े व तुलनात्मक विवरण

कारगिल युद्ध में गुंजन सक्सेना और वायु सेना की महिला अधिकारियों की भूमिका को समझने के लिए निम्नलिखित तालिका देखें:

मापदंड / विवरण तथ्य एवं आंकड़े
युद्ध का समय व क्षेत्र मई-जुलाई 1999 (द्रास, कारगिल, बटालिक, टोलोलिंग सेक्टर)
वायु सेना का मुख्य ऑपरेशन ऑपरेशन सफेद सागर (Operation Safed Sagar)
प्रयुक्त हेलीकॉप्टर एचएएल ‘चीता’ (HAL Cheetah) – हल्का, गैर-हथियारबंद
मुख्य वायु सेना पायलट फ्लाइट लेफ्टिनेंट गुंजन सक्सेना एवं फ्लाइट लेफ्टिनेंट विद्या राजन
मुख्य कार्य घायल सैनिकों का रेस्क्यू, रसद/दवा आपूर्ति, दुश्मन पर नजर
तत्कालीन सेवा की प्रकृति शॉर्ट सर्विस कमीशन (SSC) – कुल 7 वर्षों की सेवा

चुनौतियाँ और बुनियादी ढाँचे की विषमता

1990 के दशक के उत्तरार्ध में जब महिला अधिकारियों ने वायु सेना में कदम रखा था, तब अग्रिम सैन्य ठिकानों और एयरबेस का ढाँचा पूरी तरह से पुरुष केंद्रित था। उधमपुर या अग्रिम चौकियों पर महिलाओं के लिए अलग से चेंजिंग रूम या समर्पित शौचालय तक की सुविधाएं उपलब्ध नहीं थीं। इन विपरीत और असुविधाजनक परिस्थितियों के बावजूद, गुंजन सक्सेना और उनकी समकालीन महिला अधिकारियों ने कभी कोई शिकायत नहीं की। उन्होंने साबित किया कि देश सेवा के जज्बे के आगे भौतिक असुविधाएं कोई मायने नहीं रखतीं।

उस समय महिला अधिकारियों की नियुक्ति ‘शॉर्ट सर्विस कमीशन’ (SSC) के तहत होती थी। इस वजह से 7 साल की निष्कलंक और वीरतापूर्ण सेवा के बाद वर्ष 2004 में गुंजन सक्सेना का चॉपर पायलट का सफर समाप्त हो गया।

वर्तमान जीवन: शांत गृहस्थी और बदलाव की बयार

आज ‘कारगिल कन्या’ गुंजन सक्सेना अपनी सैन्य सेवा से सेवानिवृत्त होकर एक शांत गृहस्थ जीवन व्यतीत कर रही हैं। वर्तमान में वह गुजरात के जामनगर में अपने परिवार के साथ रहती हैं। उनके पति भी भारतीय वायु सेना में वरिष्ठ पायलट रहे हैं। वह अपनी किशोरी बेटी और पति के साथ खुशहाल जीवन बिता रही हैं।

भले ही वह आज सैन्य वर्दी में न हों, लेकिन उनके द्वारा 1999 में बोया गया साहस का बीज आज एक विशाल वटवृक्ष बन चुका है।

उल्लेखनीय बदलाव:

गुंजन सक्सेना और विद्या राजन जैसी वीरांगनाओं के अभूतपूर्व योगदान का ही परिणाम था कि भारतीय सशस्त्र बलों में महिलाओं के लिए स्थायी कमीशन (Permanent Commission) और फाइटर स्ट्रीम के दरवाजे खुले। वर्ष 2016 में अवनी चतुर्वेदी, भावना कांत और मोहना सिंह जैसी महिला वैमानिकों ने इतिहास रचते हुए फाइटर स्ट्रीम में कमीशन प्राप्त किया और सुपरसोनिक लड़ाकू विमान ‘मिग-21 बिसन’ (MiG-21 Bison) के कॉकपिट पर कब्जा जमाया।

निष्कर्ष: नारी शक्ति का शाश्वत संदेश

26 जुलाई को जब पूरा देश कारगिल विजय दिवस के रूप में मनाता है और अमर शहीदों को नमन करता है, तब गुंजन सक्सेना की कहानी हमें यह याद दिलाती है कि भारत माता की रक्षा में देश की बेटियों का खून और पसीना भी उतना ही पावन है जितना बेटों का।

गुंजन सक्सेना ने यह साबित कर दिया कि शौर्य, निष्ठा और देशभक्ति का कोई जेंडर (Gender) नहीं होता। कारगिल के उतुंग शिखरों पर जब ‘चीता’ हेलीकॉप्टर की गड़गड़ाहट गूंजती थी, तो वह केवल एक मशीन की आवाज नहीं थी, बल्कि वह भारत की उस नारी शक्ति की हुंकार थी जो यह उद्घोष करती है—“नारी कभी अबला नहीं थी, न है, और न कभी रहेगी!”

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Guruba Bet:प्लास्टिक और कृत्रिम फाइबर का नया प्राकृतिक विकल्प: ‘गुरुबा बेत’!!!

Guruba Bet:आज पूरी दुनिया प्लास्टिक प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन और कृत्रिम फाइबर (सिंथेटिक फाइबर) से उत्पन्न होने वाले पर्यावरणीय खतरों से जूझ रही है। ऑटोमोबाइल, एरोस्पेस और निर्माण क्षेत्रों में कार्बन फाइबर, ग्लास फाइबर और अरामिड फाइबर जैसे कृत्रिम तत्वों का इस्तेमाल तेजी से बढ़ा है। हालांकि, इनके निर्माण में अत्यधिक ऊर्जा की खपत होती है और ये पर्यावरण के साथ-साथ मानव स्वास्थ्य के लिए भी गंभीर खतरा पैदा करते हैं।

इस वैश्विक संकट के बीच, भारतीय वैज्ञानिकों ने एक पर्यावरण-अनुकूल और क्रांतिकारी खोज की है। पश्चिम बंगाल के विद्यासागर विश्वविद्यालय और बॉटनिकल सर्वे ऑफ इंडिया (BSI) के वैज्ञानिकों के एक संयुक्त अध्ययन में ‘गुरुबा बेत’ (Guruba Cane) से प्राप्त प्राकृतिक फाइबर को प्लास्टिक और कृत्रिम तंतुओं का एक बेहद प्रभावी विकल्प बताया गया है। इस ऐतिहासिक अध्ययन को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिष्ठित ‘नेचर’ (Nature) पत्रिका में भी प्रकाशित किया गया है।

क्या है गुरुबा बेत?

गुरुबा बेत पाम (Palm) परिवार से संबंधित ‘कैलेमस’ (Calamus) प्रजाति का एक पौधा है, जो मुख्य रूप से दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया के उष्णकटिबंधीय जंगलों में पाया जाता है।

पारंपरिक उपयोग: भारत में लंबे समय से इसका उपयोग हस्तशिल्प, फर्नीचर और घरेलू सामान बनाने में किया जाता रहा है।

वैज्ञानिक खोज: भले ही इसका पारंपरिक उपयोग सालों से हो रहा था, लेकिन इसके तंतुओं (Fibers) की वैज्ञानिक संरचना और औद्योगिक क्षमता के बारे में दुनिया अब तक अनजान थी।

वैज्ञानिकों की टीम ने इस विशेष बेत को उत्तर बंगाल के कूचबिहार जिले से एकत्र किया था।

शोध टीम और उनकी मुख्य खोजें

इस दूरदर्शी शोध का नेतृत्व विद्यासागर विश्वविद्यालय के वनस्पति विज्ञान एवं वानिकी विभाग के वरिष्ठ प्रोफेसर अमल कुमार मंडल ने किया। शोध टीम में उनके साथ विद्यासागर विश्वविद्यालय के शोधकर्ता रॉनी साहा तथा बॉटनिकल सर्वे ऑफ इंडिया के वैज्ञानिक देवेन्द्र सिंह और राहुल देबबर्मन शामिल थे।

वैज्ञानिकों के अनुसार, गुरुबा बेत के रेशों में निम्नलिखित अनूठी विशेषताएं पाई गई हैं:

उच्च टिकाऊपन और मजबूती: यह फाइबर हल्का होने के साथ-साथ अत्यधिक मजबूत है, जो इसे आधुनिक उद्योगों के अनुकूल बनाता है।

बायोडिग्रेडेबल (जैव-निम्नीकरणीय): यह पर्यावरण में आसानी से नष्ट हो जाता है और प्लास्टिक की तरह सैकड़ों सालों तक कचरा बनकर नहीं रहता।

कम ऊर्जा खपत: इसके निष्कर्षण और प्रसंस्करण में कृत्रिम फाइबर की तुलना में बेहद कम ऊर्जा लगती है।

किन उद्योगों में हो सकता है इसका उपयोग?

प्रोफेसर अमल कुमार मंडल का कहना है कि पर्यावरण को बचाने के लिए प्राकृतिक और नवीकरणीय (renewable) तंतुओं का उपयोग बढ़ाना आज की सबसे बड़ी जरूरत है। गुरुबा बेत से प्राप्त पॉलीमर कंपोजिट का उपयोग भविष्य में निम्नलिखित उच्च-तकनीक वाले क्षेत्रों में किया जा सकता है:

एरोस्पेस और विमानन तकनीक (Aerospace Technology)

ऑटोमोबाइल उद्योग (गाड़ियों के हल्के और मजबूत पार्ट्स बनाने में)

निर्माण इंजीनियरिंग (Construction Engineering)

खेल सामग्री और उपकरण (Sports Goods)

चिकित्सा सहायक उपकरण (Medical Devices)

इको-फ्रेंडली पैकेजिंग उद्योग

हरित प्रौद्योगिकी (Green Technology) की ओर एक बड़ा कदम

बॉटनिकल सर्वे ऑफ इंडिया के वैज्ञानिक देवेन्द्र सिंह के अनुसार, “गुरुबा बेत से मिलने वाला यह प्राकृतिक फाइबर आने वाले दिनों में कृत्रिम तंतुओं का एक टिकाऊ और प्रभावी विकल्प साबित होगा। यह खोज वैश्विक स्तर पर ग्रीन टेक्नोलॉजी (हरित प्रौद्योगिकी) और सतत औद्योगिक विकास के एक नए अध्याय की शुरुआत करेगी।”

भारतीय वैज्ञानिकों का यह शोध न केवल प्लास्टिक प्रदूषण से निपटने की दिशा में एक बड़ी सफलता है, बल्कि यह साबित करता है कि प्रकृति के पास हमारी आधुनिक समस्याओं का सबसे बेहतरीन समाधान मौजूद है।

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Happiest City: दुनिया के सबसे खुशहाल शहरों की सूची जारी!!! टॉप-10 में शामिल भारत का ‘पिंक सिटी’ जयपुर!!!

Happiest City:  अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मशहूर ‘टाइम आउट’ (Time Out) मैगजीन ने वर्ष 2026 के लिए दुनिया के सबसे खुशहाल शहरों (World’s Happiest Cities 2026) की सूची जारी की है। इस वैश्विक रैंकिंग में भारत के लिए एक बेहद गर्व की बात सामने आई है—राजस्थान की राजधानी और ‘गुलाबी नगरी’ के नाम से मशहूर जयपुर ने दुनिया के टॉप-10 खुशहाल शहरों में छठा (6ठा) स्थान हासिल किया है।

इस सूची में स्थान पाने वाला जयपुर भारत का एकमात्र शहर है।

2026 के टॉप-10 सबसे खुशहाल शहर

टाइम आउट मैगजीन की इस वैश्विक रिपोर्ट में ब्रिटेन का ऐतिहासिक शहर बाथ (Bath) पहले स्थान पर रहा। दुनिया के शीर्ष 10 शहरों का क्रम इस प्रकार है:

रैंक शहर देश

1 बाथ (Bath) ब्रिटेन (UK)

2 पानामा सिटी (Panama City) पानामा

3 ग्वाडलहारा (Guadalajara) मेक्सिको

4 मेडेलिन (Medellín) कोलंबिया

5 क्रैको (Kraków) पोलैंड

6 जयपुर (Jaipur) भारत

7 शिकागो (Chicago) अमेरिका

8 केप टाउन (Cape Town) दक्षिण अफ्रीका

9 शंघाई (Shanghai) चीन

10 गोथेनबर्ग (Gothenburg) स्वीडन

जयपुर ने शिकागो, शंघाई और केप टाउन जैसे वैश्विक महानगरों को पीछे छोड़कर यह मुकाम हासिल किया है।

कैसे तय हुई शहरों की खुशी का पैमाना?

इस वैश्विक सूची को तैयार करने के लिए दुनिया भर के 24,000 से अधिक लोगों का सर्वेक्षण किया गया। मूल्यांकन में केवल आर्थिक संपन्नता को ही आधार नहीं बनाया गया, बल्कि शहरियों के दैनिक जीवन की खुशहाली से जुड़े निम्नलिखित मानकों को परखा गया:

संस्कृति और विरासत: शहर का सांस्कृतिक माहौल और समृद्ध परंपराएं।

खान-पान और नाइटलाइफ़: स्थानीय व्यंजनों का स्वाद और सामाजिक माहौल।

हरी-भरी जगहें: शहर में पार्क और पर्यावरण-अनुकूल क्षेत्र।

सामुदायिक भावना: पड़ोसियों और स्थानीय लोगों के बीच आपसी जुड़ाव, अपनापन और सकारात्मकता।

जयपुर क्यों बना खुशहाली का प्रतीक?

वर्ष 1727 में महाराजा सवाई जय सिंह द्वितीय द्वारा बसाया गया जयपुर शहर अपनी स्थापत्य कला और अनुशासित योजना के लिए जाना जाता है।

जयपुर की इस ऐतिहासिक उपलब्धि के पीछे वहां का धीमा और सुकून भरा जीवन, रंग-बिरंगे त्योहार, मशहूर राजस्थानी व्यंजन (जैसे दाल-बाटी-चूरमा), और स्थानीय निवासियों का मेहमाननवाज रवैया प्रमुख कारण रहे हैं।

यह उपलब्धि सिर्फ जयपुरवासियों के लिए ही नहीं, बल्कि पूरे देश के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गौरव की बात है।এখানে টাইম আউট ম্যাগাজিনের ২০২৬ সালের বিশ্বের সবচেয়ে আনন্দময়/খুশির শহরের (Happiest Cities) তালিকার ওপর ভিত্তি করে হিন্দি ভাষায় একটি সম্পূর্ণ মৌলিক ও আকর্ষণীয় নিবন্ধ (Article) দেওয়া হলো:

दुनिया के ‘सबसे खुशहाल शहरों’ की सूची जारी: टॉप 10 में शामिल हुआ भारत का यह खूबसूरत शहर

जीवन की भागदौड़ में किसी भी शहर की पहचान अब सिर्फ उसकी ऊंची इमारतों या आर्थिक प्रगति से नहीं, बल्कि वहां रहने वाले लोगों की खुशी और सुकून से होती है। मशहूर ग्लोबल पब्लिकेशन ‘टाइम आउट’ (Time Out) ने वर्ष 2026 के लिए ‘विश्व के सबसे खुशहाल शहरों’ (Happiest Cities of the World) की नई सूची जारी की है।

भारतीयों के लिए बेहद गर्व की बात यह है कि दुनिया भर के दिग्गज और खूबसूरत शहरों को पछाड़ते हुए भारत के एक बेहद लोकप्रिय शहर ने इस सूची के टॉप 10 में अपनी जगह बनाई है।

टॉप 10 में ‘पिंक सिटी’ जयपुर का जलवा

राजस्थान की राजधानी और पर्यटकों के पसंदीदा जयपुर (Jaipur) ने इस वैश्विक सूची में छठा (6th) स्थान हासिल किया है। अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, भव्य महलों और जीवंत परंपराओं के लिए मशहूर ‘गुलाबी शहर’ (Pink City) अब अपनी खुशमिजाजी के लिए भी दुनिया भर में पहचाना जाएगा।

1727 में महाराजा सवाई जय सिंह द्वितीय द्वारा बसाया गया जयपुर न केवल भारतीय पर्यटकों बल्कि विदेशी सैलानियों के आकर्षण का भी बड़ा केंद्र रहा है। यहाँ का आतिथ्य, रंग-बिरंगी संस्कृति और ऐतिहासिक सुंदरता लोगों को एक अलग ही खुशी का अहसास कराती है।

दुनिया के टॉप 10 सबसे खुशहाल शहर

टाइम आउट की 2026 की रिपोर्ट के अनुसार दुनिया के शीर्ष 10 सबसे खुशहाल शहरों की सूची इस प्रकार है:

बाथ (Bath), ब्रिटेन – पहला स्थान

पनामा सिटी (Panama City), पनामा – दूसरा स्थान

गुआदालाजारा (Guadalajara), मेक्सिको – तीसरा स्थान

मेड्रिन (Medellín), कोलंबिया – चौथा स्थान

क्राको (Kraków), पोलैंड – पांचवां स्थान

जयपुर (Jaipur), भारत – छठा स्थान

शिकागो (Chicago), अमेरिका – सातवां स्थान

केपटाउन (Cape Town), दक्षिण अफ्रीका – आठवां स्थान

शंघाई (Shanghai), चीन – नौवां स्थान

गोथेनबर्ग (Gothenburg), स्वीडन – दसवां स्थान

कैसे तय होती है शहरों की ‘हैप्पीनेस रैंकिंग’?

किसी भी शहर को इस सूची में शामिल करने से पहले विशेषज्ञ कई महत्वपूर्ण मानकों पर गहराई से विचार करते हैं। इस सर्वेक्षण में दुनिया भर के स्थानीय निवासियों और पर्यटकों से सीधे संवाद किया जाता है।

रैंकिंग तय करने के मुख्य आधार:

सांस्कृतिक जीवन (Culture): शहर की कला, इतिहास और परंपराएं।

खान-पान (Food & Dining): स्थानीय भोजन का स्वाद और विविधता।

नाइटलाइफ़ (Nightlife): शाम के बाद का माहौल और मनोरंजन के साधन।

हरियाली और वातावरण (Green Spaces): पार्कों, प्राकृतिक स्थानों और पर्यावरण का स्तर।

जीवन की समग्र गुणवत्ता (Overall Quality of Life): रोज़मर्रा के जीवन में मिलने वाला सुकून, सुरक्षा और सामुदायिक जुड़ाव।

भारत के लिए गर्व का क्षण

जयपुर का इस वैश्विक सूची में छठे स्थान पर आना यह साबित करता है कि भारतीय शहर न केवल इतिहास और पर्यटन में आगे हैं, बल्कि खुशहाली और बेहतर जीवनशैली के मामले में भी दुनिया में मिसाल कायम कर रहे हैं। शिकागो, केपटाउन और शंघाई जैसे आधुनिक वैश्विक महानगरों को पीछे छोड़कर जयपुर का यह स्थान हासिल करना हर भारतीय के लिए एक अनमोल उपलब्धि है।

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Railway Underpass:के लिए नहीं, बल्कि शेरों के लिए बना देश का पहला रेलवे अंडरपास: जानिए क्या है भारतीय रेलवे की यह अनोखी पहल!!!

Railway Underpass:आमतौर पर हमने देखा है कि रेलवे ट्रैक के नीचे बनने वाले अंडरपास का इस्तेमाल इंसान अपने आवागमन, पैदल चलने या गाड़ियों की आवाजाही के लिए करते हैं। इससे एक तरफ जहां रेलगाड़ियाँ अपने समय से पटरी पर दौड़ती रहती हैं, वहीं दूसरी तरफ आम नागरिक बिना किसी दुर्घटना के आसानी से रास्ता पार कर लेते हैं। लेकिन क्या आपने कभी सुना है कि कोई रेलवे अंडरपास खास तौर पर जंगल के राजा ‘शेर’ और अन्य वन्यजीवों के लिए बनाया गया हो?

 

जी हां, भारतीय रेल ने एक नई और अनुकरणीय पहल करते हुए देश में पहली बार विशेष रूप से एशियाई शेरों (Asiatic Lions) के लिए रेलवे अंडरपास का निर्माण किया है।

मुख्य बिंदु:

स्थान: गुजरात के गिर जंगल के पास (धासा-राजूला और राजूला-पीपावाव रेल सेक्शन)।

उद्देश्य: एशियाई शेरों को ट्रेन हादसों से बचाना।

बजट: 9.42 करोड़ रुपये की लागत।

योजना: कुल 5 अंडरपास बनने हैं, जिनमें से 1 पूरी तरह बनकर तैयार हो चुका है।

आखिर क्यों पड़ी शेरों के लिए अंडरपास की जरूरत?

गुजरात का गिर राष्ट्रीय उद्यान (Gir National Park) एशियाई शेरों का इकलौता प्राकृतिक आवास है। इस इलाके के आसपास से रेलवे लाइनें गुजरती हैं। अक्सर देखा गया है कि भोजन, पानी या अपनी टेरिटरी (इलाके) की तलाश में शेर और अन्य वन्यजीव पटरियों को पार करते हैं।

कई बार अचानक ट्रेन आ जाने की वजह से ये बेजुबान जीव गंभीर हादसों का शिकार हो जाते हैं। शेरों की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए वन विभाग और पश्चिम रेलवे के भावनगर मंडल ने संयुक्त रूप से इस संकट का ऐतिहासिक समाधान निकाला है।

9.42 करोड़ रुपये का विज़न: कैसे काम करेगा यह प्रोजेक्ट?

इस विशेष परियोजना की कुल लागत लगभग 9.42 करोड़ रुपये है। इसके तहत कुल 5 ‘लायन अंडरपास’ बनाए जाने हैं:

1 अंडरपास पूरी तरह से तैयार हो चुका है और काम कर रहा है।

बाकी 4 अंडरपास का निर्माण कार्य तेजी से चल रहा है।

यह अंडरपास रेलवे पटरी के नीचे इस तरह डिजाइन किया गया है कि वन्यजीव इसे अपने स्वाभाविक रास्ते की तरह इस्तेमाल कर सकें। इससे न केवल एशियाई शेर बल्कि जंगल के अन्य जानवर भी बिना पटरियों पर आए सुरक्षित रूप से एक तरफ से दूसरी तरफ आ-जा सकेंगे।

भविष्य के लिए एक नई उम्मीद

रेलवे और वन विभाग के अधिकारियों का मानना है कि यदि यह प्रयोग सफल रहता है और जानवर इस अंडरपास का नियमित इस्तेमाल करने लगते हैं, तो यह भारत के अन्य वन्यजीव क्षेत्रों के लिए एक ‘मॉडल’ साबित होगा।

भविष्य में देश के उन सभी हिस्सों में (जहां जंगलों के बीच से रेल लाइनें गुजरती हैं और हाथियों या अन्य जानवरों के हादसों का खतरा बना रहता है) इसी तरह के विशेष अंडरपास बनाए जाएंगे।

यह कदम साबित करता है कि विकास और पर्यावरण संरक्षण साथ-साथ चल सकते हैं, बस ज़रूरत है तो सही सोच और संवेदनशील दृष्टिकोण की।

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भीषण गर्मी की तपिश के बाद मानसून का आगमन प्रकृति में नई जान फूंक देता है। चारों तरफ फैली हरियाली और ठंडी हवाएं तन-मन को असीम राहत पहुंचाती हैं। लेकिन सुहावने मौसम के साथ-साथ यह ऋतु अपने संग कई तरह की स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियां भी लेकर आती है। हवा में नमी का उच्च स्तर, चारों ओर जलजमाव और रोगाणुओं (बैक्टीरिया, वायरस, फंगस) के तेजी से पनपने के कारण इस मौसम में डेंगू, मलेरिया, टाइफाइड, हैजा, डायरिया, सर्दी-जुकाम और त्वचा संबंधी संक्रमणों का खतरा अत्यधिक बढ़ जाता है।

स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि थोड़ा सा सजग रहकर, सही खान-पान अपनाकर और व्यक्तिगत स्वच्छता का ध्यान रखकर हम मानसून के इस सुहावने सफर का बिना बीमार पड़े पूरा आनंद उठा सकते हैं। इस लेख में हम मानसूनी बीमारियों के कारणों, उनके लक्षणों और विशेषज्ञों द्वारा सुझाए गए बेहद प्रभावी एवं सरल स्वास्थ्य उपायों पर विस्तार से चर्चा करेंगे।

१. मानसून में तेजी से फैलने वाली प्रमुख बीमारियां

मानसून की नमी और उमस बैक्टीरिया और वायरस के अनुकूल होती है। इस मौसम में मुख्य रूप से चार प्रकार के रोग सर्वाधिक देखने को मिलते हैं:

क. मच्छर जनित रोग (Vector-borne Diseases)

बारिश के पानी का जगह-जगह इकट्ठा होना मच्छरों के प्रजनन के लिए सबसे अनुकूल स्थिति पैदा करता है।

  • डेंगू और चिकनगुनिया: एडीज मच्छर साफ, स्थिर पानी में अंडे देते हैं और दिन के समय काटते हैं।

  • मलेरिया: एनोफेलीज मच्छर दूषित या गंदे पानी में पनपते हैं।

  • प्रमुख लक्षण: अचानक तेज बुखार, जोड़ों और मांसपेशियों में असहनीय दर्द, आंखों के पीछे दर्द, शरीर पर चकत्ते (रैशेज) और अत्यधिक कमजोरी।

ख. जल जनित रोग (Water-borne Diseases)

मानसून में पीने के पानी के स्रोत अक्सर दूषित हो जाते हैं। दूषित जल और भोजन के सेवन से पाचन तंत्र पर सीधा हमला होता है।

  • टाइफाइड: साल्मोनेला टाइफी बैक्टीरिया से होने वाला गंभीर बुखार।

  • पीलिया (हेपेटाइटिस A और E): दूषित पानी से लीवर में होने वाला संक्रमण।

  • हैजा और डायरिया: पेट का गंभीर संक्रमण, जिससे शरीर में पानी की कमी (डीहाइड्रेशन) हो जाती है।

  • प्रमुख लक्षण: उल्टी, दस्त, पेट में ऐंठन, लगातार बुखार और भूख न लगना।

ग. श्वसन तंत्र के संक्रमण और वायरल बुखार

मौसम में अचानक बदलाव और तापमान में गिरावट के कारण प्रतिरक्षा प्रणाली (Immunity) कमजोर हो जाती है, जिससे वायरल इन्फेक्शन तेजी से फैलता है।

  • प्रमुख लक्षण: गले में खराश, लगातार छींकें आना, बहती नाक, खांसी और हल्का या तेज बुखार।

घ. त्वचा और फंगल संक्रमण (Skin and Fungal Infections)

गीले कपड़े, पसीना और दूषित पानी के संपर्क में रहने से त्वचा से जुड़ी समस्याएं जन्म लेती हैं।

  • प्रमुख लक्षण: दाद, खुजली, एथलीट फुट (पैरों की उंगलियों के बीच फंगल इन्फेक्शन) और रैशेज।

२. खान-पान और सुरक्षित पेयजल संबंधी दिशानिर्देश

मानसून के दौरान हमारी पाचन अग्नि (Digestive Fire) मंद पड़ जाती है। इसलिए इस मौसम में हल्का और सुपाच्य भोजन करना अत्यंत आवश्यक है।

खाद्य श्रेणी क्या करें (सही चुनाव) क्या न करें (परहेज करें)
पीने का पानी पानी को कम से कम १०-१५ मिनट उबालकर या आरओ से फ़िल्टर करके ही पिएं। नल का सीधा पानी, बिना ढका पानी या खुले में बिकने वाले बर्फ युक्त पेय।
मुख्य भोजन घर का बना ताजा, हल्का, गर्म और सुपाच्य भोजन लें। बासी खाना, सड़क किनारे बिकने वाले खुले और तले-भुने पकवान।
फल और सब्जियां अच्छी तरह धोकर उबाली गई सब्जियां, ताजे और छिलके वाले फल। कटी हुई रखी दुकानें की फ्रूट चाट, कच्चे पत्तेदार साग बिना सही सफाई के।

पोषण विशेषज्ञों की विशेष सलाह:

  1. हाइड्रेटेड रहें: बारिश में प्यास कम लगती है, लेकिन शरीर को पानी की आवश्यकता बनी रहती है। इसलिए दिन भर में कम से कम ८ से १० गिलास उबला हुआ या सुरक्षित पानी पिएं।

  2. प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाएं: अपनी खुराक में विटामिन C युक्त फल जैसे आंवला, नींबू, संतरा और अमरूद शामिल करें।

  3. हर्बल काढ़ा और चाय: अदरक, तुलसी, लौंग, काली मिर्च और दालचीनी से बना काढ़ा या हर्बल टी का सेवन करें। यह गले के संक्रमण को दूर रखता है और इम्युनिटी को मजबूत बनाता है।

  4. हल्दी वाला दूध: रात को सोने से पहले चुटकी भर हल्दी वाला गर्म दूध पीना शरीर के आंतरिक दर्द और संक्रमण से राहत देता है।

३. मच्छर नियंत्रण और आसपास की स्वच्छता

मच्छर जनित जानलेवा बीमारियों से बचने का सबसे कारगर तरीका मच्छरों के पनपने की गुंजाइश को खत्म करना है।

  • जलजमाव रोकें: घर की छत, बालकनी, गमले, कूलर, पुराने टायर और नारियल के खोल में ३ दिन से अधिक पानी जमा न होने दें।

  • पूरी बांह के कपड़े पहनें: बाहर निकलते समय ऐसे कपड़े पहनें जो शरीर को पूरी तरह ढकें, ताकि मच्छरों के काटने का जोखिम कम से कम हो।

  • मच्छरदानी का प्रयोग: सोते समय (दिन या रात दोनों समय) मच्छरदानी का उपयोग सबसे सुरक्षित उपाय है।

  • मॉस्किटो रिपेलेंट: घर से बाहर निकलते समय त्वचा पर अच्छी गुणवत्ता का मॉस्किटो रिपेलेंट क्रीम या स्प्रे लगाएं।

४. व्यक्तिगत स्वच्छता और जीवनशैली

मानसून में व्यक्तिगत स्वच्छता का ध्यान रखना बीमारियों को खुद से दूर रखने की सबसे मजबूत ढाल है।

  1. हाथों की नियमित सफाई: खाना खाने से पहले, बाहर से आने के बाद और शौचालय के उपयोग के बाद कम से कम २० सेकंड तक साबुन से हाथ धोएं।

  2. गीले कपड़ों से बचें: बारिश में भीगने पर तुरंत कपड़े और जूते बदलें। लंबे समय तक गीले कपड़ों में रहने से निमोनिया, सर्दी और फंगल इन्फेक्शन का खतरा बढ़ जाता है।

  3. गुनगुने पानी से स्नान: बारिश में भीगकर घर लौटने पर गुनगुने पानी से स्नान करें और तौलिए से शरीर को अच्छी तरह सुखाएं।

  4. पैरों की विशेष देखभाल: पैरों को सूखा रखें। बंद और चमड़े के जूतों के बजाय ऐसे सैंडल का चयन करें जो जल्दी सूख जाएं। बाहर से आने पर पैरों को एंटीसेप्टिक युक्त पानी से धोएं।

५. बच्चों और बुजुर्गों की विशेष देखभाल

छोटे बच्चों और बुजुर्गों की प्रतिरक्षा प्रणाली कमजोर होती है, इसलिए उन्हें इस मौसम में अतिरिक्त ध्यान देने की आवश्यकता होती है।

  • बच्चों के लिए सलाह: स्कूल जाते समय रेनकोट और छाता साथ दें। बच्चों को बाहर जमा पानी में खेलने से रोकें। उन्हें जंक फूड की जगह घर का बना पोष्टिक नाश्ता दें।

  • बुजुर्गों के लिए सलाह: यदि बुजुर्गों को अस्थमा या सांस की बीमारी है, तो उन्हें सीलन भरे कमरों में न रहने दें। उनके कमरों में हवा का उचित वेंटिलेशन होना चाहिए। जोड़ों के दर्द से बचने के लिए उन्हें हल्का गर्म पानी पीने को दें और गुनगुने तेल से मालिश करें।

६. डॉक्टर से परामर्श कब लें?

सामान्य सर्दी-जुकाम या बुखार यदि २-३ दिनों में ठीक न हो, तो डॉक्टर से संपर्क करना अनिवार्य है। निम्नलिखित लक्षणों में बिल्कुल भी देरी न करें:

  • १०२° से १०४° फ़ारेनहाइट तक का तेज बुखार जो ३ दिनों से अधिक समय तक रहे।

  • शरीर में अत्यधिक ऐंठन, उल्टी या निर्जलीकरण (Dehydration) के लक्षण।

  • मसूड़ों, नाक या मल के साथ रक्तस्राव (Bleeding) का संकेत होना (डेंगू का लक्षण)।

  • आंखों और त्वचा का पीला पड़ना (पीलिया के लक्षण)।

  • पेट में अत्यधिक दर्द या सांस लेने में तकलीफ होना।

विशेष चेतावनी: बिना डॉक्टर की सलाह के खुद से कोई भी एंटीबायोटिक (Antibiotic) या पेनकिलर (Painkiller) न लें। डेंगू जैसी स्थिति में गलत दवाएं हानिकारक सिद्ध हो सकती हैं।

मानसून प्रकृति का सुंदर उपहार है। थोड़ी सी सावधानी, स्वच्छ खान-पान और सही जीवनशैली अपनाकर हम मानसून की इन बीमारियों से खुद को और अपने परिवार को पूरी तरह सुरक्षित रख सकते हैं। स्वस्थ रहें, जागरूक रहें और इस खूबसूरत मानसूनी मौसम का भरपूर आनंद उठाएं!

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