रणभूमि की वह हुंकार, जिसने इतिहास के पन्नों को नया मोड़ दिया
वर्ष 1999 का ग्रीष्मकाल। कारगिल की हिमाच्छादित, दुर्गम और पथरीली चोटियाँ युद्ध की भीषण लपटों में झुलस रही थीं। ‘ऑपरेशन विजय’ के तहत भारतीय थल सेना और वायु सेना के वीर जांबाज मातृभूमि की अस्मिता की रक्षा के लिए घुसपैठियों को खदेड़ने में जुटे थे। जब भी युद्ध या सेना के पराक्रम की चर्चा होती है, तो अमूमन पुरुष योद्धाओं के चेहरे आँखों के सामने तैरने लगते हैं। लेकिन 1999 के कारगिल युद्ध की एक ऐतिहासिक सच्चाई यह भी है कि जब नियंत्रण रेखा (LoC) के पार से दुश्मन आग के गोले बरसा रहा था, तब भारत की एक बेटी भी आसमान का सीना चीरते हुए अग्रिम चौकियों पर रसद और दवाइयाँ पहुँचा रही थी।
उन्हें दुनिया ‘द कारगिल गर्ल’ यानी फ्लाइट लेफ्टिनेंट गुंजन सक्सेना के नाम से जानती है।
जब उधमपुर एयरबेस के स्टेशन कमांडर ने उनसे पूछा था—“क्या युद्धक्षेत्र के खतरनाक माहौल में जाने से कोई आपत्ति है?” तब उस 24 वर्षीया युवा महिला सैन्य अधिकारी की आँखों में रत्ती भर भी भय नहीं था। उनका सीधा और अडिग उत्तर था—“आपत्ति का सवाल ही पैदा नहीं होता, यह तो मेरे लिए अत्यंत गर्व का विषय है!” जब कमांडर ने मुस्कुराते हुए पुनः पूछा—“और अगर दुश्मन के इलाके में पकड़ी गईं तो?” तब अपनी कमर पर बंधी पिस्टल की तरफ इशारा करते हुए उन्होंने कहा था—“मेरे पास ऑटोमैटिक पिस्टल है, मैं संभाल लूँगी! और यदि संभव हो तो मुझे एक असॉल्ट राइफल भी दे दीजिए।”
यह निर्भीक उत्तर किसी आम नागरिक का नहीं, बल्कि भारतीय वायु सेना की पहली महिला कॉम्बैट एविएटर्स में से एक गुंजन सक्सेना का था।
बचपन से कॉकपिट तक का सफर: एक सपने की उड़ान
गुंजन सक्सेना का जन्म 1975 में उत्तर प्रदेश की सांस्कृतिक राजधानी लखनऊ में एक निष्ठावान सैन्य परिवार में हुआ था। उनके पिता भारतीय सेना में लेफ्टिनेंट कर्नल के पद पर कार्यरत थे और उनके भाई ने भी सेना में शामिल होकर देशसेवा का मार्ग चुना। बचपन से ही अनुशासन, देशभक्ति और वर्दी के प्रति सम्मान का माहौल गुंजन को विरासत में मिला।
बचपन में अत्यधिक बातें करने के कारण परिवारजन उन्हें प्यार से ‘गुंजन’ कहते थे। जब वह मात्र 5 वर्ष की थीं, तब अपने एक रिश्तेदार पायलट के माध्यम से उन्हें पहली बार एक विमान के कॉकपिट को भीतर से देखने का अवसर मिला। उस नन्हीं सी उम्र में उन्होंने कभी नहीं सोचा था कि एक दिन यही कॉकपिट उनकी पहचान बनेगा और वह सामान्य यात्री विमान नहीं, बल्कि दुर्गम पहाड़ियों में उड़ने वाले भारतीय वायु सेना के ‘चीता’ (Cheetah) हेलीकॉप्टर की कमान संभालेंगी।
शिक्षा और वायु सेना में ऐतिहासिक प्रवेश
गुंजन की स्कूली शिक्षा पूरी होने के बाद उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रसिद्ध हंसराज कॉलेज से भौतिक विज्ञान (Physics) में स्नातक (B.Sc.) की डिग्री हासिल की। पढ़ाई के दौरान ही आकाश में उड़ने की लालसा उन्हें सफदरजंग फ्लाइंग क्लब (Safdarjung Flying Club) ले गई।
वर्ष 1994 भारतीय वायु सेना के इतिहास में एक स्वर्णिम अध्याय लेकर आया। यह वही वर्ष था जब भारतीय वायु सेना ने इतिहास में पहली बार महिलाओं को पायलट के रूप में शामिल करने का ऐतिहासिक निर्णय लिया। सर्विस सिलेक्शन बोर्ड (SSB) की कठिन प्रवेश परीक्षा उत्तीर्ण कर गुंजन सक्सेना वायु सेना में चुनी गईं। देश भर से चयनित 25 जांबाज महिला कैडेटों के पहले बैच में गुंजन सक्सेना भी शामिल थीं। प्रशिक्षण पूरा करने के पश्चात उनकी पहली पोस्टिंग जम्मू-कश्मीर के रणनीतिक रूप से संवेदनशील उधमपुर एयरबेस पर हुई।
1999 का कारगिल युद्ध और ‘ऑपरेशन विजय’ में गुंजन की भूमिका
उधमपुर में तैनाती के महज़ पांच वर्ष बाद ही भारत-पाकिस्तान के बीच कारगिल युद्ध छिड़ गया। मई 1999 में शुरू हुए ‘ऑपरेशन विजय’ में भारतीय वायु सेना ने ‘ऑपरेशन सफेद सागर’ (Op Safed Sagar) के तहत अपनी शक्ति का प्रदर्शन किया। इस मिशन में पहली बार महिला पायलटों को युद्ध क्षेत्र के सीधे संपर्क (Operational Zone) में तैनात किया गया। फ्लाइट लेफ्टिनेंट गुंजन सक्सेना और उनकी साथी फ्लाइट लेफ्टिनेंट विद्या राजन को कारगिल के युद्धग्रस्त आसमान में उतरने का निर्देश मिला।
जोखिम भरे मिशन और अदम्य साहस
गुंजन सक्सेना के कंधों पर अत्यंत संवेदनशील और जीवन-रक्षक जिम्मेदारियाँ थीं:
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रसद एवं जीवनरक्षक दवाओं की आपूर्ति: द्रास, बटालिक और टोलोलिंग जैसी अत्यंत ऊँची और जोखिमभरी चोटियों पर तैनात सैनिकों तक गोला-बारूद, रसद और दवाइयाँ पहुँचाना।
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गंभीर रूप से घायल सैनिकों का रेस्क्यू (Evacuation): अग्रिम चौकियों से घायल भारतीय वीर जवानों को तुरंत एयरलिफ्ट कर सैन्य अस्पतालों तक पहुँचाना।
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शहीदों के पार्थिव शरीर को निकालना: दुर्गम पहाड़ियों के बीच से जहाँ दुश्मन की गोलियाँ बरस रही हों, वहाँ से शहीद जवानों के पार्थिव शरीरों को ससम्मान वापस लाना।
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रेकी (Reconnaissance): आसमान में उड़ान भरते हुए पाकिस्तानी सैनिकों और घुसपैठियों की हलचल पर नजर रखना और एयरबेस को इनपुट देना।
जिस ‘चीता’ हेलीकॉप्टर को गुंजन और विद्या उड़ा रही थीं, उसमें न तो आत्मरक्षा के लिए कोई मशीन गन लगी थी और न ही कोई रॉकेट लॉन्चर। वह एक हल्का निहत्था हेलीकॉप्टर था। कारगिल की तंग घाटियों में उड़ान भरते समय दुश्मन की मिसाइलें कई बार उनके हेलीकॉप्टर के बेहद करीब से गुजरीं। एक बार तो पाकिस्तानी कंधे पर रखकर दागी जाने वाली मिसाइल (SAM) उनके हेलीकॉप्टर को बाल-बाल चूक गई। इसके बावजूद, गुंजन ने कभी हिम्मत नहीं हारी और कई बार इमरजेंसी व क्रैश लैंडिंग के करीब की परिस्थितियों से निकलकर भी सैनिकों की जान बचाई।
कारगिल युद्ध के मुख्य आंकड़े व तुलनात्मक विवरण
कारगिल युद्ध में गुंजन सक्सेना और वायु सेना की महिला अधिकारियों की भूमिका को समझने के लिए निम्नलिखित तालिका देखें:
| मापदंड / विवरण | तथ्य एवं आंकड़े |
| युद्ध का समय व क्षेत्र | मई-जुलाई 1999 (द्रास, कारगिल, बटालिक, टोलोलिंग सेक्टर) |
| वायु सेना का मुख्य ऑपरेशन | ऑपरेशन सफेद सागर (Operation Safed Sagar) |
| प्रयुक्त हेलीकॉप्टर | एचएएल ‘चीता’ (HAL Cheetah) – हल्का, गैर-हथियारबंद |
| मुख्य वायु सेना पायलट | फ्लाइट लेफ्टिनेंट गुंजन सक्सेना एवं फ्लाइट लेफ्टिनेंट विद्या राजन |
| मुख्य कार्य | घायल सैनिकों का रेस्क्यू, रसद/दवा आपूर्ति, दुश्मन पर नजर |
| तत्कालीन सेवा की प्रकृति | शॉर्ट सर्विस कमीशन (SSC) – कुल 7 वर्षों की सेवा |
चुनौतियाँ और बुनियादी ढाँचे की विषमता
1990 के दशक के उत्तरार्ध में जब महिला अधिकारियों ने वायु सेना में कदम रखा था, तब अग्रिम सैन्य ठिकानों और एयरबेस का ढाँचा पूरी तरह से पुरुष केंद्रित था। उधमपुर या अग्रिम चौकियों पर महिलाओं के लिए अलग से चेंजिंग रूम या समर्पित शौचालय तक की सुविधाएं उपलब्ध नहीं थीं। इन विपरीत और असुविधाजनक परिस्थितियों के बावजूद, गुंजन सक्सेना और उनकी समकालीन महिला अधिकारियों ने कभी कोई शिकायत नहीं की। उन्होंने साबित किया कि देश सेवा के जज्बे के आगे भौतिक असुविधाएं कोई मायने नहीं रखतीं।
उस समय महिला अधिकारियों की नियुक्ति ‘शॉर्ट सर्विस कमीशन’ (SSC) के तहत होती थी। इस वजह से 7 साल की निष्कलंक और वीरतापूर्ण सेवा के बाद वर्ष 2004 में गुंजन सक्सेना का चॉपर पायलट का सफर समाप्त हो गया।
वर्तमान जीवन: शांत गृहस्थी और बदलाव की बयार
आज ‘कारगिल कन्या’ गुंजन सक्सेना अपनी सैन्य सेवा से सेवानिवृत्त होकर एक शांत गृहस्थ जीवन व्यतीत कर रही हैं। वर्तमान में वह गुजरात के जामनगर में अपने परिवार के साथ रहती हैं। उनके पति भी भारतीय वायु सेना में वरिष्ठ पायलट रहे हैं। वह अपनी किशोरी बेटी और पति के साथ खुशहाल जीवन बिता रही हैं।
भले ही वह आज सैन्य वर्दी में न हों, लेकिन उनके द्वारा 1999 में बोया गया साहस का बीज आज एक विशाल वटवृक्ष बन चुका है।
उल्लेखनीय बदलाव:
गुंजन सक्सेना और विद्या राजन जैसी वीरांगनाओं के अभूतपूर्व योगदान का ही परिणाम था कि भारतीय सशस्त्र बलों में महिलाओं के लिए स्थायी कमीशन (Permanent Commission) और फाइटर स्ट्रीम के दरवाजे खुले। वर्ष 2016 में अवनी चतुर्वेदी, भावना कांत और मोहना सिंह जैसी महिला वैमानिकों ने इतिहास रचते हुए फाइटर स्ट्रीम में कमीशन प्राप्त किया और सुपरसोनिक लड़ाकू विमान ‘मिग-21 बिसन’ (MiG-21 Bison) के कॉकपिट पर कब्जा जमाया।
निष्कर्ष: नारी शक्ति का शाश्वत संदेश
26 जुलाई को जब पूरा देश कारगिल विजय दिवस के रूप में मनाता है और अमर शहीदों को नमन करता है, तब गुंजन सक्सेना की कहानी हमें यह याद दिलाती है कि भारत माता की रक्षा में देश की बेटियों का खून और पसीना भी उतना ही पावन है जितना बेटों का।
गुंजन सक्सेना ने यह साबित कर दिया कि शौर्य, निष्ठा और देशभक्ति का कोई जेंडर (Gender) नहीं होता। कारगिल के उतुंग शिखरों पर जब ‘चीता’ हेलीकॉप्टर की गड़गड़ाहट गूंजती थी, तो वह केवल एक मशीन की आवाज नहीं थी, बल्कि वह भारत की उस नारी शक्ति की हुंकार थी जो यह उद्घोष करती है—“नारी कभी अबला नहीं थी, न है, और न कभी रहेगी!”


