Profitable Farming Idea:आज के समय में जब पारंपरिक खेती (जैसे धान और गेहूं) में लागत के मुकाबले मुनाफा कम होता जा रहा है, तब कुछ किसान अपनी सोच और हिम्मत के दम पर लीक से हटकर काम कर रहे हैं। ऐसा ही एक अनोखा और बेहद मुनाफे वाला कारनामा कर दिखाया है पश्चिम बंगाल के पूर्व मेदिनीपुर जिले के खलीडांगा गांव के एक युवा किसान सुब्रत मंडल ने। उन्होंने रेगिस्तान के बेहद महंगे और प्रीमियम माने जाने वाले ‘आजवा’ (Ajwa) और ‘मरियम’ (Maryam) खजूर की खेती बंगाल की मिट्टी में सफलतापूर्वक करके सबको हैरान कर दिया है।
ड्रैगन फ्रूट की बंपर सफलता के बाद, अब अरब के इन खजूरों ने बंगाल की कृषि अर्थव्यवस्था (Agricultural Economy) में मुनाफे का एक नया रास्ता खोल दिया है।
बंगाल के खजूर और अरब के खजूर में क्या अंतर है?
ग्रामीण इलाकों में खजूर के पेड़ देखना कोई नई बात नहीं है। सर्दियों की सुबह खजूर का रस इकट्ठा करना और उससे गुड़ (नोलन गुड़) बनाना बंगाल की संस्कृति का हिस्सा रहा है। लेकिन, हमारे यहां मिलने वाले स्थानीय खजूर और खाड़ी देशों (Middle East) से आने वाले आजवा, मरियम या मेजदूल जैसे खजूरों में जमीन-आसमान का अंतर है।
स्थानीय खजूर: इनका आकार छोटा होता है, इनमें गूदा कम होता है और इनका व्यावसायिक स्तर पर फलों के रूप में बड़ा बाजार नहीं है।
अरबी खजूर: ये आकार में बड़े, बेहद रसीले, कड़े मीठे और औषधीय गुणों से भरपूर होते हैं। बाजार में इनकी कीमत आसमान छूती है। अभी तक भारत अपनी जरूरत के अधिकांश प्रीमियम खजूरों के लिए सऊदी अरब, ओमान या यूएई जैसे देशों पर निर्भर रहा है।
बांग्लादेश के दौरे से आया यह अनोखा आइडिया
इस कहानी के नायक सुब्रत मंडल पहले एक छोटा-मोटा व्यवसाय करते थे, लेकिन बचपन से ही उन्हें खेती-किसानी का बड़ा शौक था। पारंपरिक खेती से अलग कुछ करने की चाह में उन्होंने सबसे पहले अपने खेतों में ड्रैगन फ्रूट (Dragon Fruit) उगाया, जिसमें उन्हें अच्छी सफलता मिली।
इसके बाद जब सुब्रत बांग्लादेश के दौरे पर गए, तो वहां उन्होंने देखा कि वहां की जलवायु और मिट्टी में अरब के खजूरों की शानदार पैदावार हो रही है। चूंकि पश्चिम बंगाल और बांग्लादेश का मौसम और मिट्टी काफी हद तक एक जैसी है, इसलिए सुब्रत ने वापस आकर अपने खेतों में परीक्षण (Experimental Farming) के तौर पर अरबी खजूर के पौधे लगा दिए। नतीजा यह हुआ कि आज उनके पेड़ फलों से लदे हैं और वे आने वाले साल में इसे बड़े पैमाने पर करने की तैयारी कर रहे हैं।
जलवायु परिवर्तन (Climate Change) के दौर में सबसे सुरक्षित खेती
आजकल मौसम का कोई भरोसा नहीं रहता—कभी सूखा पड़ता है तो कभी बेमौसम भारी बारिश होती है। ऐसे में खजूर की खेती किसानों के लिए एक ‘सुरक्षा कवच’ की तरह है:
कम पानी की जरूरत: खजूर के पेड़ प्राकृतिक रूप से मरुस्थलीय होते हैं, इसलिए इन्हें बहुत कम सिंचाई की आवश्यकता होती है।
उच्च तापमान सहन करने की क्षमता: बढ़ती गर्मी और लू का इन पौधों पर बुरा असर नहीं पड़ता, बल्कि फल पकने के लिए तेज धूप की जरूरत होती है।
लंबी उम्र और बंपर कमाई: खजूर का पेड़ एक बार स्थापित होने के बाद दशकों तक फल देता है। चूंकि बाजार में आजवा और मरियम खजूर की मांग हमेशा बनी रहती है और इनके दाम बहुत ऊंचे होते हैं, इसलिए इसमें लागत के मुकाबले कई गुना ज्यादा मुनाफा मिलता है।
कृषि विशेषज्ञों की राय: अगर हमारे देश के किसान स्थानीय स्तर पर ही इस उच्च गुणवत्ता वाले खजूर का उत्पादन करने लगेंगे, तो विदेशों से होने वाला आयात कम होगा। इससे न केवल देश का पैसा बचेगा, बल्कि आम उपभोक्ताओं को भी कम कीमत पर ताजे और प्रीमियम खजूर मिल सकेंगे।
तमलुक की मिट्टी में मरुस्थल का यह ‘सोना’ उगने से आसपास के दूसरे किसान भी बेहद उत्साहित हैं। सुब्रत मंडल की इस कामयाबी ने साबित कर दिया है कि अगर सही प्रबंधन, आधुनिक कृषि पद्धति और कुछ नया करने का साहस हो, तो बंजर लगने वाले आइडिया से भी करोड़ों का मुनाफा कमाया जा सकता है।





