India Heritage:हाल ही में भारत की सांस्कृतिक विरासत को वैश्विक स्तर पर एक और बड़ी सफलता मिली है। नीदरलैंड्स सरकार ने चोल राजवंश के दौर की बेहद दुर्लभ और ऐतिहासिक ‘अनैमंगलम ताम्रलिपि’ (Anaimangalam Copper Plates) भारत को वापस सौंप दी है। शनिवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नीदरलैंड्स यात्रा के दौरान इन बहुमूल्य ताम्रपत्रों को आधिकारिक तौर पर भारत के हवाले किया गया।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ‘लाइडेन प्लेट्स’ (Leiden Plates) के नाम से मशहूर ये ताम्रपत्र चोल राजवंश के इतिहास को समझने के लिए सबसे महत्वपूर्ण और जीवित दस्तावेज माने जाते हैं।
क्या हैं ‘लाइडेन प्लेट्स’ और इनका महत्व?
यह ऐतिहासिक दस्तावेज सिर्फ धातु के टुकड़े नहीं हैं, बल्कि ये भारत के गौरवशाली इतिहास का एक अहम हिस्सा हैं।
चोल काल का जीवंत प्रमाण: ये ताम्रपत्र महान चोल राजवंश के शासनकाल, उनकी प्रशासनिक व्यवस्था, धार्मिक उदारता और व्यापारिक संबंधों पर गहराई से रोशनी डालते हैं।
बौद्ध विहार को दान का उल्लेख: इन प्लेटों पर दर्ज लिपि में चोल राजाओं द्वारा अनैमंगलम गांव को एक बौद्ध विहार (चूडामणि विहार) के रखरखाव के लिए दान में दिए जाने का पूरा विवरण है।
सांस्कृतिक समन्वय: यह दस्तावेज इस बात का प्रतीक है कि चोल शासक न केवल शक्तिशाली थे, बल्कि वे अन्य धर्मों और संस्कृतियों का भी उतना ही सम्मान करते थे।
एक सदी से भी लंबा इंतजार और राजनयिक प्रयास
ये बेशकीमती ताम्रपत्र एक शताब्दी (100 साल) से भी अधिक समय से डच (ओलांदोज़) नियंत्रण में थे। इन्हें नीदरलैंड्स की प्रसिद्ध लाइडेन यूनिवर्सिटी (Leiden University) में बेहद सुरक्षित तरीके से सहेजकर रखा गया था।
भारत की ऐतिहासिक कलाकृतियों और दस्तावेजों को वापस लाने के प्रयासों के तहत, इसे वापस पाना एक बड़ी चुनौती थी। भारत सरकार, डच सरकार और लाइडेन यूनिवर्सिटी के बीच इसके लिए कई सालों तक सघन राजनयिक और कूटनीतिक बातचीत (Diplomatic Negotiations) चलती रही। आखिरकार, लंबे समय से चल रही यह बातचीत सफल रही और इन प्लेटों को ससम्मान भारत को लौटा दिया गया।
सांस्कृतिक कूटनीति की जीत
पिछले कुछ वर्षों में विदेशों में मौजूद भारत की प्राचीन मूर्तियों, कलाकृतियों और ऐतिहासिक दस्तावेजों को वापस लाने की मुहिम में तेजी आई है। नीदरलैंड्स द्वारा ‘लाइडेन प्लेट्स’ की यह वापसी दोनों देशों के बीच मजबूत होते द्विपक्षीय संबंधों और सांस्कृतिक कूटनीति की एक बड़ी कामयाबी है।
यह ऐतिहासिक दस्तावेज अब वापस भारत की धरती पर आ चुका है, जिससे देश के इतिहासकारों और शोधकर्ताओं को चोल साम्राज्य के बारे में और अधिक बारीक जानकारियां जुटाने में मदद मिलेगी।
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