Fish :हिमालय की वादियों और वहाँ की झीलों का सौंदर्य एक बार फिर अपने पुराने स्वरूप में लौट रहा है। करीब तीन दशकों के लंबे इंतजार के बाद, हिमालय की प्रसिद्ध झीलों में ‘सिल्वर ग्लो’ यानी स्नो ट्राउट (Snow Trout) मछली की वापसी हुई है। यह न केवल प्रकृति प्रेमियों के लिए सुखद खबर है, बल्कि हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) के लिए भी एक बड़ी जीत है।
क्या है ‘असेला’ और क्यों है यह खास?
स्थानीय भाषा में ‘असेला’ के नाम से मशहूर इस मछली को ‘हिमालय की मछली’ भी कहा जाता है। वैज्ञानिक रूप से इसे सन्ओ ट्राउट के नाम से जाना जाता है। इसकी कुछ खास विशेषताएँ इसे अन्य मछलियों से अलग बनाती हैं:
पारदर्शी और शुद्ध जल की पहचान: यह मछली केवल उसी जल में जीवित रहती है जहाँ ऑक्सीजन की मात्रा भरपूर हो और पानी पूरी तरह स्वच्छ हो।
हिमालय की विरासत: 30 साल पहले तक नैनीताल, भीमताल, सातताल और नौकुचियाताल जैसी झीलों में यह बहुतायत में पाई जाती थी।
पारिस्थितिकी संतुलन: यह मछली झीलों के जलीय वातावरण को संतुलित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
विलुप्ति की कगार से वापसी की कहानी
बढ़ते प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन के कारण 90 के दशक के बाद यह मछली इन झीलों से धीरे-धीरे गायब होने लगी थी। लेकिन कुमाऊं विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने इसे वापस लाने का संकल्प लिया। उनकी मेहनत अब रंग ला रही है।
संरक्षण की अनूठी तकनीक
शोधकर्ताओं ने इस मछली को बचाने के लिए एक विशेष रणनीति अपनाई:
जाल (Cages) का निर्माण: झील के पानी के भीतर ही विशेष प्रकार के पिंजरे या बाड़े बनाए गए।
वैज्ञानिक प्रजनन: इन बाड़ों में मछली के बीज (Fingerlings) को प्राकृतिक वातावरण और नियंत्रित तापमान में पाला गया।
नैनी झील में नई शुरुआत: हाल ही में लगभग 300 छोटी स्नो ट्राउट मछलियों को नैनी झील के मुख्य जल में छोड़ा गया है।
पारिस्थितिकी तंत्र पर प्रभाव
विशेषज्ञों का मानना है कि स्नो ट्राउट की वापसी से नैनीताल के जल निकाय के स्वास्थ्य में सुधार होगा। यह मछली झील की गंदगी और काई को नियंत्रित करने में मदद करती है, जिससे पानी की गुणवत्ता बनी रहती है। स्थानीय निवासियों और पर्यावरणविदों ने इस पहल की सराहना की है और इसे हिमालयी जैव विविधता के संरक्षण की दिशा में एक क्रांतिकारी कदम बताया है।
निष्कर्ष
हिमालय की झीलों में ‘असेला’ का फिर से तैरना इस बात का प्रमाण है कि यदि सही प्रयास किए जाएं, तो प्रकृति अपनी खोई हुई संपदा वापस पा सकती है। अब उम्मीद यही है कि आने वाले समय में नैनीताल और आसपास की सभी झीलें एक बार फिर इन सुनहरी मछलियों से लबालब नजर आएंगी।





