Homeब्लॉगMukha: आस्था, संयम और कला का अद्भुत संगम!!!

Mukha: आस्था, संयम और कला का अद्भुत संगम!!!

Mukha:कोलकाता के गगनेंद्र शिल्प प्रदर्शनी केंद्र में इन दिनों एक अलग ही रौनक देखने को मिल रही है। कलाकार शर्मिला सेन की पहल पर आयोजित ‘आर्ट बियॉन्ड ट्रेडिशन’ प्रदर्शनी ने दर्शकों को बंगाल की जड़ों से रूबरू कराया है। इस प्रदर्शनी का मुख्य आकर्षण है—दिनाजपुर का पारंपरिक ‘मुख़ा’ (मुखौटा)। यह केवल लकड़ी का टुकड़ा नहीं, बल्कि सदियों पुरानी साधना और लोक-संस्कृति का जीवंत प्रमाण है।

कठोर नियम और अटूट श्रद्धा

दिनाजपुर में मुखौटों को स्थानीय भाषा में ‘मुख़ा’ कहा जाता है। वहां के कलाकारों के लिए इसे बनाना किसी कठिन तपस्या से कम नहीं है। मुख़ा बनाने की प्रक्रिया में स्वच्छता और शुद्धता का विशेष ध्यान रखा जाता है:

पवित्रता: कलाकार स्नान करने और साफ-सुथरे कपड़े पहनने के बाद ही काम शुरू करते हैं।

संयम: जब तक मुखौटा बनाने का काम चलता है, कलाकार सात्विक जीवन बिताते हैं। इस दौरान मांसाहार और मद्यपान पूरी तरह वर्जित रहता है।

समर्पण: उनके लिए यह काम केवल जीविकोपार्जन नहीं, बल्कि ईश्वर की सेवा के समान पवित्र है।

प्रकृति और कला का मेल

इन मुखौटों के निर्माण में पूरी तरह से प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग किया जाता है। आधुनिक रसायनों और कृत्रिम रंगों की यहाँ कोई जगह नहीं है।

विशेषता विवरण

लकड़ी के प्रकार छातिम, आम, गामारी, पाकड़ और नीम।

प्राकृतिक रंग सिंदूर, चूना, खड़िया मिट्टी और फूलों का अर्क।

कलाकार समुदाय मुख्य रूप से स्थानीय ‘देशीय पाली’ और ‘राजबंशी’ समुदाय।

इन लकड़ी के कुंदों पर कलाकार बड़ी कुशलता से आँख, नाक और मुँह उकेरते हैं, जिसमें पुराणों की कहानियों से लेकर लोक-विश्वासों तक की झलक मिलती है।

ग्लोबल टच: परंपरा से आधुनिकता तक

गगनेंद्र शिल्प प्रदर्शनी में केवल बंगाल ही नहीं, बल्कि वैश्विक कला का संगम भी देखने को मिलता है। यहाँ प्रदर्शनी में निम्नलिखित शैलियाँ आकर्षण का केंद्र हैं:

दिनाजपुर के मुख़ा: स्थानीय जनजातीय संस्कृति और बंगाल की लोक-कला का आधार।

दक्षिण भारतीय प्रभाव: ‘कथकली’ नृत्य के आधार पर तैयार किए गए विशेष मुखौटे।

अफ्रीकी कला: अफ्रीकी जनजातीय मुखौटों के डिजाइन और उनकी अनूठी बनावट।

“मेरा काम एक कारीगर की तरह है। मैं डिजाइन तैयार करती हूँ और कुशल कारीगर उसे हकीकत में बदलते हैं। आज यह कला लुप्त होने के कगार पर है क्योंकि कलाकारों को उचित लाभ नहीं मिल रहा। इसे बचाने के लिए युवाओं को इससे जोड़ना बेहद जरूरी है।” — शर्मिला सेन

निष्कर्ष

२० अप्रैल तक चलने वाली यह प्रदर्शनी हमें याद दिलाती है कि हमारी पारंपरिक कलाएं कितनी समृद्ध हैं। ‘मुख़ा’ जैसे शिल्पों को सहेजने का अर्थ है—अपनी जड़ों को सींचना। यदि आने वाली पीढ़ी इन कलाओं के प्रति जागरूक होगी, तभी इन बेनाम कलाकारों की मेहनत को सही पहचान और सम्मान मिल पाएगा।

और पढ़ें:Rongo, a Heavenly Hill Station: जहाँ पहाड़, जंगल और नदियाँ मिलती हैं!!!

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