Cultivating Gold: मेदिनीपुर के देलुआ इलाके में करीब 14 एकड़ जमीन पर प्रोफेसर दास ने ‘फॉरेस्ट पार्क’ नाम से एक सपनों का बगीचा तैयार किया है। इस बगीचे के 5 बीघे हिस्से में उन्होंने विशेष प्रकार के बेर (Kul) की खेती की है, जिसे लोग ‘एप्पल बेर’ या ‘भारत सुंदरी’ के नाम से जानते हैं। ये बेर देखने में छोटे सेब जैसे लगते हैं और बेहद स्वादिष्ट होते हैं।
कमाई का गणित: लागत कम, मुनाफा ज्यादा
प्रोफेसर प्रशांत दास ने व्यावसायिक खेती के लाभ को आंकड़ों के साथ साझा किया है:
कुल लागत: 5 बीघे में खेती के लिए लगभग 1 लाख 20 हजार रुपये खर्च हुए।
प्रति बीघा खर्च: करीब 24-25 हजार रुपये।
मुनाफा: प्रति बीघा 1 लाख रुपये तक की कमाई संभव है।
सफलता: केवल दिसंबर तक उन्होंने डेढ़ से दो लाख रुपये के बेर बेच दिए हैं और जनवरी में और भी अधिक बिक्री की उम्मीद है।
सर्दियों में भी आम की मिठास
इस बगीचे की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यहाँ कड़ाके की ठंड में भी ‘काटीमन आम’ फल रहे हैं। यह आम की ऐसी किस्म है जो साल में दो बार फल देती है। इसके अलावा, उन्होंने पिछले सीजन में दुनिया के सबसे महंगे आमों में शुमार मियाज़ाकी, रेड पालमर और रेड आइवरी का भी सफल उत्पादन किया था।
बेर और आम के साथ-साथ इस बगीचे में पपीता, अमरूद और रंग-बिरंगे फूलों की खेती भी की जा रही है। सबसे खास बात यह है कि यह पूरी खेती जैविक खाद (Organic Fertilizer) के जरिए की जा रही है।
युवाओं के लिए नई राह: ‘सृजनी एग्रो फाउंडेशन’
प्रोफेसर दास का उद्देश्य केवल खुद लाभ कमाना नहीं है। उन्होंने युवाओं को वैकल्पिक आय का जरिया दिखाने के लिए ‘सृजनी एग्रो फाउंडेशन’ की स्थापना की है। मेदिनीपुर सदर पंचायत समिति के सहयोग से वे ‘इंटीग्रेटेड एग्रीकल्चर’ प्रोजेक्ट पर काम कर रहे हैं।
“जंगलमहल की सूखी और लाल मिट्टी में भी जैविक तरीके से खेती करके लाखों रुपये कमाए जा सकते हैं। हम हर उस युवा की मदद करने को तैयार हैं जो इस क्षेत्र में आगे आना चाहता है।” — प्रोफेसर प्रशांत कुमार दास
प्रशासन का सहयोग
मेदिनीपुर सदर पंचायत समिति की सभापति उर्मिला साऊ ने इस पहल की सराहना करते हुए कहा कि इस प्रोजेक्ट से न केवल रोजगार के अवसर पैदा हुए हैं, बल्कि यह पूरे जंगलमहल के लिए एक रोल मॉडल बन गया है।
निष्कर्ष: प्रोफेसर प्रशांत कुमार दास ने यह साबित कर दिया है कि अगर तकनीक और दृढ़ इच्छाशक्ति का साथ हो, तो बंजर जमीन भी किसी की किस्मत बदल सकती है। यह पहल निश्चित रूप से बंगाल के कृषि परिदृश्य में एक बड़ा बदलाव लेकर आएगी।
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