भारत के शहरों की पहचान अगर किसी एक समस्या से की जाए, तो वह है— यातायात जाम। लाल बत्ती पर रुकी गाड़ियाँ, लगातार हॉर्न, बढ़ता प्रदूषण और दुर्घटनाओं का डर—यह दृश्य देश के लगभग हर बड़े शहर में आम है। लेकिन इसी भीड़ और अव्यवस्था के बीच राजस्थान का एक शहर ऐसा भी है, जिसने इस पूरी व्यवस्था को चुनौती दे दी है।
राजस्थान का कोटा शहर अब देश का पहला ऐसा शहर बन गया है, जो बिना किसी ट्रैफिक सिग्नल के संचालित हो रहा है। यह उपलब्धि किसी चमत्कार या अत्याधुनिक तकनीक का परिणाम नहीं, बल्कि स्मार्ट इंफ्रास्ट्रक्चर और दूरदर्शी शहरी योजना का नतीजा है।
कोटा ने यह साबित कर दिया है कि अगर सड़कें सही ढंग से डिज़ाइन की जाएँ, तो ट्रैफिक को रोकने की ज़रूरत ही नहीं पड़ती।
शिक्षा नगरी से स्मार्ट सिटी तक का सफर (India’s First Signal-Free City)
कोटा वर्षों से देश की “कोचिंग कैपिटल” के रूप में जाना जाता रहा है। हर साल लाखों छात्र प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए यहाँ आते हैं। बढ़ती आबादी, छात्रों की संख्या और वाहनों की तेज़ वृद्धि ने एक समय कोटा की सड़कों पर भी वही हाल कर दिया था, जो अन्य भारतीय शहरों का है।
- प्रमुख चौराहों पर लंबा जाम
- ट्रैफिक सिग्नल पर 10–15 मिनट की प्रतीक्षा
- बार-बार होने वाली सड़क दुर्घटनाएँ
- ईंधन और समय की भारी बर्बादी
इन समस्याओं से जूझते हुए कोटा प्रशासन ने एक साहसिक निर्णय लिया—
समस्या का इलाज सिग्नल बढ़ाना नहीं, बल्कि सिग्नल की ज़रूरत ही खत्म करना होगा।
Urban Improvement Trust (UIT): बदलाव की नींव
कोटा को सिग्नल-फ्री शहर बनाने की पूरी योजना का नेतृत्व किया अर्बन इम्प्रूवमेंट ट्रस्ट (UIT), कोटा ने। UIT ने पारंपरिक ट्रैफिक कंट्रोल मॉडल को खारिज करते हुए एक नई सोच अपनाई—
“यातायात को नियंत्रित मत करो, उसे स्वाभाविक रूप से बहने दो।”
इसी सोच के साथ शहर की सड़कों को दोबारा डिज़ाइन किया गया।
फ्लाईओवर और अंडरपास: रुकावटों के ऊपर और नीचे से रास्ता
कोटा की सिग्नल-फ्री व्यवस्था का सबसे मजबूत आधार है— फ्लाईओवर और अंडरपास का व्यापक नेटवर्क।
शहर के प्रमुख और व्यस्त चौराहों पर:
- फ्लाईओवर बनाए गए ताकि तेज़ गति वाले वाहन ऊपर से निकल सकें
- अंडरपास बनाए गए ताकि स्थानीय यातायात नीचे से चलता रहे
इसके फायदे:
- एक ही स्तर पर ट्रैफिक टकराता नहीं
- ट्रैफिक सिग्नल की ज़रूरत समाप्त
- दुर्घटनाओं की संभावना में भारी कमी
इन संरचनाओं को वैज्ञानिक ट्रैफिक सर्वे और भविष्य की जरूरतों को ध्यान में रखकर बनाया गया।
रिंग रोड: शहर के भीतर नहीं, शहर के चारों ओर सफर
कोटा की एक और बड़ी सफलता रही रिंग रोड नेटवर्क का विकास।
पहले:
- भारी वाहन और लंबी दूरी के ट्रक शहर के बीच से गुजरते थे
- इससे भीड़, प्रदूषण और दुर्घटनाएँ बढ़ती थीं
अब:
- रिंग रोड के ज़रिए बाहरी ट्रैफिक सीधे शहर को बायपास कर देता है
- शहर के अंदर की सड़कें केवल स्थानीय लोगों और छात्रों के लिए रहती हैं
परिणाम:
- कम भीड़
- कम शोर
- बेहतर जीवन गुणवत्ता
आधुनिक राउंडअबाउट: लाल बत्ती नहीं, सतत गति
जहाँ फ्लाईओवर या अंडरपास बनाना संभव नहीं था, वहाँ कोटा ने अपनाया आधुनिक राउंडअबाउट सिस्टम।
ये सामान्य गोल चक्कर नहीं हैं, बल्कि:
- स्पष्ट लेन मार्किंग
- नियंत्रित एंट्री और एग्ज़िट
- बेहतर दृश्यता और संकेतक
इन राउंडअबाउट्स में वाहन रुकते नहीं, केवल गति कम करके सहज रूप से आगे बढ़ते हैं।
डिज़ाइन-फर्स्ट अप्रोच: तकनीक नहीं, योजना सबसे पहले
कोटा की सबसे बड़ी खासियत है उसका डिज़ाइन-फर्स्ट दृष्टिकोण।
यहाँ:
- पहले सड़क की योजना बनी
- फिर ट्रैफिक का व्यवहार समझा गया
- उसके बाद निर्माण हुआ
ट्रैफिक सिग्नल को अंतिम विकल्प माना गया, प्राथमिक नहीं।
यह सोच भारतीय शहरी विकास में एक बड़ा बदलाव दर्शाती है।
🚗 क्या बदला? ज़मीन पर दिखने वाले नतीजे
⏱️ यात्रा समय में कमी
जहाँ पहले 30–40 मिनट लगते थे, वहाँ अब 15–20 मिनट में सफर पूरा हो रहा है।
⛽ ईंधन की बचत
कम रुकने और कम एक्सेलेरेशन के कारण पेट्रोल-डीज़ल की खपत घटी है।
🌱 प्रदूषण में कमी
वाहनों का कम धुआँ, बेहतर हवा और कम कार्बन उत्सर्जन।
🚑 दुर्घटनाओं में गिरावट
सिग्नल जंपिंग और अचानक ब्रेक से होने वाली दुर्घटनाएँ काफी कम हुई हैं।
💰 आर्थिक और सामाजिक लाभ
- लोगों का समय बचा → उत्पादकता बढ़ी
- परिवहन लागत कम हुई
- ड्राइविंग का तनाव घटा
- व्यापार और लॉजिस्टिक्स को गति मिली
शहर का समग्र जीवन स्तर बेहतर हुआ है।
🌆 अन्य शहरों के लिए सीख
दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु, कोलकाता जैसे महानगर आज गंभीर ट्रैफिक संकट से जूझ रहे हैं। कोटा ने दिखाया है कि—
“समाधान केवल स्मार्ट सिग्नल नहीं, स्मार्ट सड़कें हैं।”
हर शहर को कोटा जैसा नहीं बनाया जा सकता, लेकिन इसके सिद्धांत अपनाए जा सकते हैं।
⚠️ चुनौतियाँ भी कम नहीं
यह मॉडल:
- महँगा है
- ज़मीन अधिग्रहण की ज़रूरत होती है
- दीर्घकालिक योजना माँगता है
लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि इसके दीर्घकालिक लाभ लागत से कहीं अधिक हैं।
🔮 भविष्य की शहरी यातायात व्यवस्था
विशेषज्ञों के अनुसार आने वाले समय में शहर होंगे:
- कम सिग्नल आधारित
- अधिक संरचना आधारित
- मानव और पर्यावरण केंद्रित
कोटा इस भविष्य की एक झलक है।
निष्कर्ष: जब सड़कें खुद सोचने लगें
कोटा ने सिर्फ ट्रैफिक सिग्नल नहीं हटाए,
उसने पुरानी सोच को हटाया।
यह शहर बताता है कि अगर सड़कें सही बनाई जाएँ,
तो ट्रैफिक को रोका नहीं, चलाया जा सकता है।
भारत के शहरी विकास इतिहास में कोटा अब सिर्फ एक शहर नहीं,
बल्कि एक मॉडल बन चुका है।
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