Real classroom demonstration: शांतिनिकेतन मेडिकल कॉलेज और अस्पताल में एक अनोखी और महत्वपूर्ण घटना घटी, जिसमें डॉ. कौशिक रॉय, जो फोरेंसिक मेडिसिन और टॉक्सिकोलॉजी के क्षेत्र में विशेषज्ञ माने जाते हैं, ने अपने ज्ञान और अनुभव से भरी एक वास्तविक कक्षा प्रदर्शन (रेयल टाइम डेमोंस्ट्रेशन) और व्याख्यान का आयोजन किया। इस सत्र का उद्देश्य विद्यार्थियों को फोरेंसिक विज्ञान के जटिल पहलुओं को सीधे और व्यावहारिक तरीके से समझाना था। यह आयोजन मेडिकल छात्रों और पेशेवरों के बीच बहुत चर्चित हुआ और इसने चिकित्सा शिक्षा के क्षेत्र में एक नया मानक स्थापित किया।
शैक्षिक दृष्टिकोण में एक नई दिशा
यह व्याख्यान शांतिनिकेतन मेडिकल कॉलेज के अत्याधुनिक सभागार में आयोजित किया गया, जिसमें फोरेंसिक मेडिसिन और टॉक्सिकोलॉजी के विषयों पर विस्तृत चर्चा की गई। फोरेंसिक मेडिसिन उस चिकित्सा विज्ञान को कहा जाता है, जो कानूनी मामलों में प्रयोग होता है, जबकि टॉक्सिकोलॉजी शरीर में रसायनिक पदार्थों के प्रभावों को समझने का विज्ञान है। इस प्रदर्शन का मुख्य उद्देश्य विद्यार्थियों को यह दिखाना था कि इन विषयों के सिद्धांतों को वास्तविक जीवन के मामलों में कैसे लागू किया जाता है, जैसे कि शव परीक्षण और विषाक्तता जांच।
डॉ. कौशिक रॉय, जिन्होंने इस आयोजन का नेतृत्व किया, ने बताया कि उनका मुख्य उद्देश्य विद्यार्थियों को केवल सैद्धांतिक ज्ञान देना नहीं था, बल्कि उन्हें प्रायोगिक अनुभव भी प्रदान करना था। “पारंपरिक पाठ्यपुस्तकें अत्यधिक महत्वपूर्ण हैं, लेकिन व्यावहारिक अनुभव का कोई विकल्प नहीं है,” डॉ. रॉय ने सत्र के दौरान कहा। “वास्तविक प्रदर्शन करके, छात्र इन जटिल विषयों को बेहतर तरीके से समझ सकते हैं।”
वास्तविक अनुभव पर आधारित शिक्षण
यह सत्र केवल सुनने के लिए नहीं था, बल्कि छात्रों को इस प्रदर्शन में सक्रिय रूप से भाग लेने का अवसर भी मिला। सत्र की शुरुआत में डॉ. रॉय ने कुछ केस स्टडीज प्रस्तुत की, जिनमें हाल के फोरेंसिक मामलों के आंकड़े और घटनाएँ शामिल थीं। इन केस स्टडीज में विषाक्तता की रिपोर्ट, शव परीक्षण की प्रक्रिया, और उन पदार्थों की पहचान करने के तरीके शामिल थे, जो जानलेवा हो सकते हैं।
इसका एक महत्वपूर्ण भाग शव परीक्षण का वास्तविक प्रदर्शन था, जिसमें डॉ. रॉय ने एक मॉक ऑटोप्सी (नकली शव परीक्षण) किया। इस प्रक्रिया को बारीकी से समझाते हुए, डॉ. रॉय ने छात्रों को यह दिखाया कि कैसे मौत के कारणों की पहचान की जाती है और विषाक्त पदार्थों के प्रभावों को देखा जाता है। छात्रों ने इस प्रक्रिया को बड़े ध्यान से देखा और हर कदम को समझने का प्रयास किया।
डॉ. रॉय ने इस अवसर पर छात्रों को यह भी समझाया कि हर केस एक पहेली होता है और फोरेंसिक विशेषज्ञ के रूप में हम उन पहेलियों को हल करने में मदद करते हैं। “लेकिन यह जिम्मेदारी के साथ आता है। हमें हर मामले को ईमानदारी और नैतिकता के साथ हल करना होता है,” उन्होंने जोर दिया।
फोरेंसिक मेडिसिन और टॉक्सिकोलॉजी के अंतर-संबंध को समझाना
फोरेंसिक मेडिसिन और टॉक्सिकोलॉजी केवल चिकित्सा विज्ञान के दो पहलू नहीं हैं, बल्कि ये दोनों कानून से भी गहरे जुड़े होते हैं। डॉ. रॉय ने समझाया कि इन क्षेत्रों में कार्य करने के लिए चिकित्सा विज्ञान और कानून दोनों का गहन ज्ञान होना चाहिए। उन्होंने यह भी बताया कि कैसे फोरेंसिक मेडिसिन, पैथोलॉजी, फार्माकोलॉजी और माइक्रोबायोलॉजी जैसे अन्य मेडिकल क्षेत्रों के साथ मिलकर काम करती है, ताकि सही निष्कर्ष पर पहुंचा जा सके।
फोरेंसिक विज्ञान में प्रौद्योगिकी की भूमिका पर भी चर्चा की गई। डॉ. रॉय ने बताया कि डीएनए विश्लेषण, डिजिटल फोरेंसिक्स, और एडवांस्ड टॉक्सिकोलॉजी टेस्टिंग जैसी नई तकनीकों के आने से फोरेंसिक जांच में कई सुधार हुए हैं। इन प्रौद्योगिकियों ने जटिल मामलों को हल करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
टॉक्सिकोलॉजी पर गहन चर्चा
इस सत्र में टॉक्सिकोलॉजी पर विशेष ध्यान दिया गया, जिसमें यह बताया गया कि कैसे विभिन्न पदार्थ—चाहे वह सामान्य घरेलू रसायन हों या फिर नशीले पदार्थ—मानव शरीर पर असर डालते हैं। डॉ. रॉय ने छात्रों को यह दिखाया कि कैसे विषाक्त पदार्थों की पहचान की जाती है और उनका शरीर पर प्रभाव निर्धारित किया जाता है।
उन्होंने प्रयोगशाला सेटिंग्स में टॉक्सिकोलॉजी परीक्षणों को प्रदर्शित किया। उदाहरण के तौर पर, उन्होंने कुछ अज्ञात पदार्थों के नमूने दिखाए और बताया कि कैसे फोरेंसिक टॉक्सिकोलॉजिस्ट गैस क्रोमैटोग्राफी और मास स्पेक्ट्रोमेट्री जैसी तकनीकों का उपयोग करके विषाक्त पदार्थों की पहचान करते हैं। “एक फोरेंसिक टॉक्सिकोलॉजिस्ट ठीक उसी तरह एक जासूस की तरह होता है। हमें साक्ष्यों का विश्लेषण करना होता है और उनके आधार पर निष्कर्ष पर पहुंचना होता है,” डॉ. रॉय ने कहा।
साथ ही, उन्होंने यह भी बताया कि विभिन्न प्रकार के जहर—तत्काल असर दिखाने वाले और दीर्घकालिक प्रभाव डालने वाले—कैसे शरीर को प्रभावित करते हैं और इनका इलाज कैसे किया जाता है।
चिकित्सा शिक्षा में प्रभाव
शांतिनिकेतन मेडिकल कॉलेज और अस्पताल में इस तरह के वास्तविक कक्षा प्रदर्शन ने शैक्षिक दृष्टिकोण में एक नया मोड़ डाला है। कॉलेज के प्रोफेसरों ने इस व्याख्यान के बाद यह महसूस किया कि इस तरह की व्यावहारिक शिक्षा चिकित्सा छात्रों के लिए बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह उन्हें केवल सैद्धांतिक ज्ञान नहीं, बल्कि वास्तविक जीवन में सामने आने वाली चुनौतियों का सामना करने के लिए तैयार करता है।
“चिकित्सा शिक्षा में बदलाव आ रहा है, और यह जरूरी है कि हमारे छात्र न केवल सैद्धांतिक ज्ञान से लैस हों, बल्कि उन्हें व्यावहारिक अनुभव भी मिले, ताकि वे भविष्य में किसी भी जटिल परिस्थिति का सामना कर सकें,” डॉ. राजेश कुमार, फोरेंसिक मेडिसिन विभाग के प्रमुख ने कहा। “डॉ. कौशिक रॉय का प्रदर्शन हमारे पाठ्यक्रम को और समृद्ध बनाने का एक बेहतरीन उदाहरण है।”
भविष्य में इस तरह के और कार्यक्रमों की योजना
इस कार्यक्रम की सफलता के बाद शांतिनिकेतन मेडिकल कॉलेज आने वाले समय में इसी प्रकार के और कार्यक्रमों की योजना बना रहा है, ताकि छात्रों को और अधिक प्रायोगिक अनुभव मिले। डॉ. रॉय ने यह भी कहा कि उनका उद्देश्य केवल भारत में ही नहीं, बल्कि दुनिया भर में ऐसे सत्रों का आयोजन करना है, ताकि हर विद्यार्थी को इस तरह की शिक्षा का लाभ मिल सके।
शांतिनिकेतन मेडिकल कॉलेज और अस्पताल में डॉ. कौशिक रॉय द्वारा आयोजित ‘फोरेंसिक मेडिसिन और टॉक्सिकोलॉजी’ पर यह वास्तविक कक्षा प्रदर्शन एक मील का पत्थर साबित हुआ है। इसने छात्रों को चिकित्सा विज्ञान के इन महत्वपूर्ण विषयों को गहराई से समझने का अवसर दिया। डॉ. रॉय की पहल ने न केवल शिक्षा को और भी प्रभावी बना दिया, बल्कि छात्रों को एक नई दिशा और प्रेरणा भी दी है।
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