History unearthed: पश्चिम बंगाल के पूर्व वर्धमान जिले के रायना में इतिहास एक बार फिर जीवंत हो उठा है। यहाँ के पलासन गांव में एक पुराने तालाब के जीर्णोद्धार (संस्कार) के दौरान कश्ती पत्थर (Black Stone) से बनी भगवान विष्णु की एक अत्यंत दुर्लभ और प्राचीन मूर्ति मिली है। विशेषज्ञों के अनुसार, यह मूर्ति लगभग 1000 साल पुरानी है और इसका संबंध सेन राजवंश के काल से है।
कैसे मिली यह बहुमूल्य धरोहर?
घटना रायना के पलासन गांव के साईपाड़ा इलाके की है। यहाँ ‘बासापुकुर’ नाम का एक पुराना तालाब लंबे समय से कीचड़ और मलबे से भरा पड़ा था। हाल ही में तालाब के मालिक ने इसकी सफाई और खुदाई का काम शुरू करवाया। खुदाई के लिए मिट्टी निकालने वाली मशीन (Excavator) लगाई गई थी। खुदाई के दौरान अचानक मशीन के अगले हिस्से में एक विशाल पत्थर जैसी आकृति फंसी, जिसे बाहर निकालने पर ग्रामीणों की आंखें फटी की फटी रह गई। वह काले पत्थर की एक सुंदर नक्काशीदार विष्णु मूर्ति थी।
मूर्ति की विशेषताएं और ऐतिहासिक महत्व
विश्वविद्यालय के विशेषज्ञों और इतिहासकारों ने इस मूर्ति का सूक्ष्म परीक्षण किया है। विश्व भारती विश्वविद्यालय के संग्रहालय निदेशक और वर्धमान विश्वविद्यालय के पूर्व क्यूरेटर रंगनकांति जाना के अनुसार:
कालखंड: यह मूर्ति 11वीं-12वीं शताब्दी की है, जो बंगाल के सेन शासन काल की कला शैली को दर्शाती है।
कलाकृति: विष्णु भगवान के निचले दाहिने हाथ में पद्म (कमल) और ऊपरी दाहिने हाथ में चक्र है। वहीं, ऊपरी बाएं हाथ में गदा और निचले बाएं हाथ में शंख सुशोभित है।
सह-देवियां: मुख्य मूर्ति के दोनों ओर देवी लक्ष्मी और देवी सरस्वती की छोटी आकृतियां उकेरी गई हैं।
आकार: मूर्ति की ऊँचाई लगभग 33 इंच और चौड़ाई 13 इंच है।
विशेषज्ञों का मानना है कि प्राचीन काल में रायना का यह क्षेत्र विष्णु उपासना का एक प्रमुख केंद्र रहा होगा।
दुर्भाग्यवश मूर्ति हुई क्षतिग्रस्त
खुदाई के दौरान असावधानी और भारी मशीनरी के उपयोग के कारण इस अनमोल धरोहर को थोड़ा नुकसान पहुँचा है। बताया जा रहा है कि मशीन की चोट लगने से मूर्ति का बायां हिस्सा, नाक और बाईं आंख आंशिक रूप से क्षतिग्रस्त हो गई है।
प्रशासनिक कार्रवाई और वर्तमान स्थिति
मूर्ति मिलने के बाद गांव में उसे रखने को लेकर कुछ विवाद की स्थिति बनी, जिसके बाद रायना थाना पुलिस ने तुरंत हस्तक्षेप किया। पुलिस ने मूर्ति को अपने संरक्षण में लिया और बाद में इसे वर्धमान विश्वविद्यालय के संग्रहालय (Museum) को सौंप दिया गया।
संग्रहालय के कर्मी श्यामसुंदर बेरा ने बताया कि पिछले वर्ष भी रायना क्षेत्र से ऐसी ही दो मूर्तियां मिली थीं। पाल और सेन युग की धार्मिक और शिल्प परंपरा को समझने के लिए यह खोज शोधकर्ताओं के लिए एक मील का पत्थर साबित होगी।
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