NEET: जब इरादे मजबूत हों और दिल में कुछ कर गुजरने का जज्बा हो, तो गरीबी और सीमित संसाधन कभी सफलता की राह में रोड़ा नहीं बन सकते। इस बात को एक बार फिर सच कर दिखाया है बिहार के सहरसा के रहने वाले तीन सगे भाई-बहनों ने। ऑल इंडिया मेडिकल प्रवेश परीक्षा (NEET UG 2026) के नतीजों में रजनीश, प्रह्लाद और साक्षी—इन तीनों भाई-बहनों ने एक साथ सफलता हासिल कर पूरे इलाके का नाम रोशन कर दिया है।
तंगहाली में बीता बचपन, लेकिन नहीं टूटने दिया सपना
इन तीनों बच्चों के पिता रोहित आनंद सहरसा में ही एक छोटी सी किराना (मुदी) दुकान चलाते हैं। इसी दुकान की सीमित कमाई से उनके परिवार का गुजर-बसर होता है। घर के वित्तीय हालात ऐसे नहीं थे कि बच्चों को नीट की तैयारी के लिए कोटा या दिल्ली जैसे बड़े और महंगे कोचिंग हब भेजा जा सके।
माता-पिता (रोहित आनंद और पूनम देवी) ने बच्चों को शुरुआत में ही अपनी आर्थिक स्थिति के बारे में साफ बता दिया था। हालांकि, उन्होंने अपने बच्चों का हौसला कभी टूटने नहीं दिया। माता-पिता ने वादा किया कि वे अपनी क्षमता के अनुसार बच्चों की पढ़ाई में कभी कोई कमी नहीं आने देंगे।
कोटा-दिल्ली गए बिना स्थानीय स्तर पर की तैयारी
लाखों रुपये खर्च करके बड़े शहरों में पढ़ाई करने वाले छात्रों के बीच, इन तीनों भाई-बहनों ने साबित कर दिया कि लगन हो तो घर में रहकर भी मुकाम हासिल किया जा सकता है। उन्होंने सहरसा के ही एक स्थानीय कोचिंग संस्थान का सहारा लिया और पूरी निष्ठा के साथ सेल्फ स्टडी पर ध्यान दिया।
ग्रुप स्टडी और टाइम मैनेजमेंट बना सफलता का मंत्र
तीनों भाई-बहनों का मानना है कि उनकी इस सामूहिक सफलता के पीछे निरंतरता (Consistency), सही टाइम मैनेजमेंट और ग्रुप स्टडी की बड़ी भूमिका रही।
आपसी चर्चा: कठिन विषयों को वे आपस में मिलकर सुलझाते थे।
आत्मविश्वास: एक साथ पढ़ाई करने से उनके अंदर का डर दूर हुआ और आत्मविश्वास बढ़ा।
“माता-पिता का भरोसा ही हमारी सबसे बड़ी ताकत”
अपनी इस ऐतिहासिक सफलता का श्रेय रजनीश, प्रह्लाद और साक्षी ने अपने माता-पिता को दिया है। उनका कहना है कि तैयारी के दौरान जब भी वे हताश होते, उनके माता-पिता उन्हें यही समझाते थे कि “ईमानदारी से की गई मेहनत कभी बेकार नहीं जाती।” माता-पिता का यही अटूट विश्वास उनकी सबसे बड़ी ताकत बना और आज तीनों डॉक्टर बनने की दहलीज पर खड़े हैं।
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