Mango:मुर्शिदाबाद का एक छोटा सा गांव इन दिनों आम प्रेमियों और कौतूहल से भरे लोगों का पसंदीदा ठिकाना बना हुआ है। भगवानगोला-1 ब्लॉक के वर्षातिगोला गांव के रहने वाले वासिम राजा ने अपनी सिर्फ दो बीघा जमीन पर मानो पूरी दुनिया के बेहतरीन आमों का एक मेला सजा दिया है। उनके इस अनूठे बागान को देखकर रवींद्रनाथ टैगोर की वह प्रसिद्ध पंक्ति याद आती है— “बिबिधेर माझें मिलन महान” (विविधता में महान एकता)।
उनके इस छोटे से भूखंड पर जो दुर्लभ नजारा देखने को मिल रहा है, उसे शब्दों में बयां करना मुश्किल है। यहाँ जापान का विश्वप्रसिद्ध मियाज़ाकी, ऑस्ट्रेलिया का किंग ऑफ चाकापात, थाईलैंड का बनाना मैंगो और एप्पल मैंगो, चीन का चैंगमाई और बारी-4 जैसी इंटरनेशनल वैरायटी के आम पेड़ों पर लद चुके हैं। इसके अलावा मिस्र (Egypt) और बांग्लादेश की भी कई अनोखी प्रजातियों समेत कुल 18 विदेशी किस्मों के आम इस बागान की शोभा बढ़ा रहे हैं।
छत के गमले से शुरू हुआ दो बीघे का यह सफर
पेशा से ठेकेदार (Contractor) वासिम राजा के इस अनोखे सफर की कहानी बेहद दिलचस्प है। करीब 6 साल पहले वह बांग्लादेश में अपने एक रिश्तेदार के घर गए थे। वहाँ उन्होंने देखा कि उनके रिश्तेदार ने छत पर गमलों में ही दुनिया भर के कई दुर्लभ आम उगा रखे थे और उनमें बेहतरीन फल भी आए थे। हर आम का स्वाद और खुशबू एक-दूसरे से बिल्कुल जुदा थी। बस, यहीं से वासिम के मन में भी ऐसा ही कुछ करने का जुनून सवार हुआ।
बांग्लादेश से लौटते समय वह अपने साथ कुछ पौधों के ग्राफ्ट (चारे) लेकर आए और शुरुआत में उन्हें अपने घर के गमलों में लगाया। जब वहाँ कामयाबी मिली, तो उन्होंने अपने घर के पास खाली पड़ी ढाई बीघा जमीन में से दो बीघे पर इसका एक्सपेरिमेंट करने का फैसला किया।
एक अनूठा नजारा: आज वासिम के बागान में करीब 400 आम के पेड़ हैं। पेड़ों की डालियाँ आमों के बोझ से इतनी झुक गई हैं कि कई जगह वे जमीन को छू रही हैं।
धोखे और नुकसान के बाद भी नहीं हारी हिम्मत
इस मुकाम तक पहुँचना वासिम के लिए इतना आसान नहीं था। इस जुनून के चक्कर में उन्हें लाखों रुपये का नुकसान भी उठाना पड़ा और वह धोखाधड़ी का शिकार भी हुए।
धोखे का सामना: एक बार महंगे विदेशी पौधों के नाम पर उन्हें नकली या कम गुणवत्ता वाले पौधे बेच दिए गए। जब उन पेड़ों पर मनमुताबिक फल नहीं आए, तो वासिम ने भारी मन से लाखों रुपये के उन पेड़ों को कटवा दिया।
फिर से खड़े होना: हार मानने के बजाय उन्होंने अगले साल फिर से पैसे जुटाए और खुद प्रामाणिक जगहों (जैसे ऑस्ट्रेलिया और बांग्लादेश) से अच्छी गुणवत्ता वाले ओरिजिनल पौधे खरीदकर लाए। उनकी इस लगन का नतीजा आज सबके सामने है।
‘मैंगो फेस्टिवल’ के चैंपियन और उनका भविष्य का सपना
वासिम के इस अनोखे प्रयास को सरकारी स्तर पर भी सराहना मिली है। साल 2025 में भगवानगोला-1 ब्लॉक प्रशासन द्वारा आयोजित ‘आम उत्सव’ में वासिम राजा के बागान के आमों ने पहला स्थान (First Prize) हासिल किया था।
आमों के इस कमर्शियल दौर में भी वासिम की सोच बिल्कुल जुदा है।
मुफ्त में चखिए आम: वासिम अपने बागान के आमों को बेचते नहीं हैं। अगर कोई उनके बागान का आम खाने की इच्छा जताता है, तो वह उसे मुफ्त में खिलाते हैं।
बिज़नेस मॉडल (नर्सरी): वह चाहते हैं कि इन विदेशी और लजीज आमों का स्वाद हर आम इंसान तक पहुँचे। इसके लिए उन्होंने एक नर्सरी शुरू की है, जहाँ वह इन दुर्लभ आमों के पौधे तैयार कर लोगों को बेच रहे हैं। इन पौधों की कीमत प्रजाति के हिसाब से 1,000 रुपये से लेकर 3,000 रुपये तक है।
वासिम राजा का यह छोटा सा बागान आज न सिर्फ मुर्शिदाबाद बल्कि पूरे बंगाल के लिए गर्व का विषय बन चुका है, जहाँ कदम रखते ही महसूस होता है कि वाकई एक छोटी सी जगह पर ‘एक टुकड़ा दुनिया’ सिमट आई है।
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